कुश, नागकन्या और अतिथि — रघुवंश, चित्र

अध्याय ११

कुश, नागकन्या और अतिथि

जिस नगर को राम अकेला छोड़ गए थे, वह आधी रात को एक विधवा-सी स्त्री बनकर कुश के पास आया — और एक नाग-कन्या का विवाह एक खोए हुए गहने के बदले हुआ

कुश, नागकन्या और अतिथि — रघुवंश का अध्याय ११। स्रोत: रघुवंश, सर्ग १६ और १७ (कालिदास)। इसमें ६ दृश्य हैं — आधी रात में; उजड़ी अयोध्या; अयोध्या की ओर; सरयू की जलक्रीड़ा; नाग-कन्या कुमुद्वती; अतिथि — और अंत में १० सवाल।

आधी रात में

राम के बाद उनके वंश के आठों राजकुमार — कुश और लव समेत — अपने-अपने राज में बैठे, और ज्येष्ठ कुश को सबने सबसे बड़ा माना, क्योंकि भाइयों का प्रेम वंश की धरोहर थी। कालिदास कहते हैं कि वह कुल विष्णु के अंशों से निकला था, आठ शाखाओं में बँटा, पर किसी ने अपनी सीमा नहीं लाँघी, जैसे समुद्र तट नहीं लाँघता।

कुश कुशावती में राज करते थे। एक आधी रात, जब सेवक सोए थे और दीये धीमी लौ में जल रहे थे, कुश ने अपने शयन-कक्ष में एक स्त्री को खड़े देखा — ऐसी जिसे उसने कभी नहीं देखा था, परदेस गए पति वाली स्त्री के वेश में।द्वार बंद थे, फिर भी वह भीतर आ गई थी — जैसे कोई प्रतिबिंब बिना दरवाज़ा खोले दर्पण में उतर आता है।

उसने हाथ जोड़कर 'कल्याण हो' कहा। कुश आधा उठा। 'देवी, तुम बंद द्वार से भीतर आईं, पर योगिनी जैसी नहीं लगतीं। तुम पाले से मुरझाई कमलिनी जैसी दुखी हो। तुम कौन हो, किसकी पत्नी हो? याद रखना कि रघुओं का मन पराई स्त्री की ओर नहीं जाता।'

उसने कहा, 'राजन्, मैं उस नगरी की अधिष्ठात्री देवी हूँ, जिसके नागरिकों को तुम्हारे पिता अपने साथ स्वर्ग ले गए। मैं अलकापुरी से बढ़कर थी, महोत्सवों से जगमग। आज मेरी अट्टालिकाएँ टूटी पड़ी हैं, परकोटे ढह गए हैं।'

उजड़ी अयोध्या

'जिन राजमार्गों पर कभी अभिसारिकाएँ रात में चलती थीं, उन पर आज सियारिनें अपने मुँह से आग-सी चिंगारी फेंकती हुई घूमती हैं। जिन ताल के पानी में स्त्रियों के हाथों से मृदंग-सी ध्वनि उठती थी, वहाँ भैंसे सींग मारकर गरज रहे हैं। पालतू मोर पेड़ों पर पड़े हैं, उनके डंडे टूटे, पंख दावानल से झुलसे।

'जिन सीढ़ियों पर कभी स्त्रियाँ महावर लगे पाँव रखती थीं, उन पर आज बाघ हिरन को मारकर ख़ून से सने पंजे रखते हैं। दीवारों पर बने हाथी के चित्रों को शेरों के नाख़ून लगे हैं। साँपों की केंचुलियाँ खंभों पर बनी स्त्रियों की चोली बन गई हैं। सरयू के सूने घाट मुझे दुखाते हैं।

'इसलिए तुम इस नगर को छोड़ो और अपने कुल की राजधानी लौट आओ — जैसे तुम्हारे पिता ने मनुष्य का रूप छोड़कर अपने आदि रूप में विष्णु का स्वरूप धारण किया।'

कुश ने कहा, 'ऐसा ही होगा।' और वह स्त्री उसी क्षण दिखनी बंद हो गई। सुबह राजा ने ब्राह्मणों को यह बात बताई। वे बोले, 'आपको तो राजधानी ने ख़ुद पति चुना है।'

कुश ने कुशावती वेदज्ञ ब्राह्मणों को सौंप दी, और रानियों के साथ एक शुभ दिन अयोध्या की ओर चल पड़े।

अयोध्या की ओर

कुश की सेना चली तो ऐसा लगा कि वह चलती-फिरती राजधानी है: ध्वजाओं की पंक्ति उसके बग़ीचे थी, बड़े हाथी उसकी खेलती पहाड़ियाँ, रथ उसके महल। धरती पर जो भार था, वह धूल बनकर आकाश में विष्णु के दूसरे पग की तरह चढ़ गया।

हाथियों के मद और घोड़ों की टाप ने रास्ते की धूल को कीचड़ और कीचड़ को धूल बना दिया। विंध्य के पहाड़ों को सेना ने पार किया तो गुफाएँ नर्मदा की गर्जना की तरह गूँज उठीं। गंगा को उन्होंने हाथियों के पुल से पार किया।

कुश ने सरयू के किनारे पहुँचकर देखा कि रघुओं के यज्ञों के सैकड़ों यूप सजे खड़े थे। राजधानी की हवा बग़ीचों से आकर उसकी थकी सेना का स्वागत कर रही थी।

वास्तु-पूजन के बाद कुश ने नगर में प्रवेश किया, जैसे प्रेमी प्रिया के हृदय में। मंडियाँ सजीं, घुड़सालों में घोड़े, हाथीसालों में हाथी। कालिदास कहते हैं कि वह नगरी सब अंगों पर गहने पहने स्त्री जैसी लग रही थी। मैथिली का वह बेटा अपने पुरखों के उस घर में बैठकर न इंद्र से ईर्ष्या करता था, न कुबेर से।

सरयू की जलक्रीड़ा

फिर गर्मी आई। कुश के मन में सरयू में रानियों के साथ जलक्रीड़ा की इच्छा जागी। किनारे पर तंबू लगे, और मछुआरों ने जाल डालकर मगरमच्छ हटाए।

नाव में बैठे कुश ने चँवर थामे हुई किरात-स्त्री से कहा, 'देखो, मेरी रानियों के लेप धुलने से सरयू का जल शाम की लाली-सा रंगीन हो गया है। उनकी आँखों का काजल लहरों ने बहा दिया, पर नशे की लाली से उनकी आँखें फिर सँवरी हैं।'

वह स्वयं नाव से जल में उतरा और रानियों के साथ ऐसे खेला जैसे जंगली हाथी हथिनियों के साथ। रानियों ने सोने की पिचकारियों से रंग डाला।

उसी जलक्रीड़ा में वह बाजूबंद कुश की भुजा से फिसलकर पानी में गिर गया, और उन्हें पता भी नहीं चला। यह वही आभूषण था जिसे राम ने अगस्त्य से पाया था और राज्य के साथ कुश को दिया था। इसे विजयलक्ष्मी को वश में रखने वाला माना जाता था।

तंबू में लौटकर जब उसने अपनी भुजा ख़ाली देखी, तो वह दुखी हुआ। लालच से नहीं — वह गहना पिता का और विजयलक्ष्मी का वशीकरण था। गोताख़ोर मछुआरे बुलाए गए। खोजने पर न मिला। उन्होंने कहा, 'महाराज, ज़रूर कुमुद नाम का नाग, जो सरयू के गहरे कुंड में रहता है, उसे लालच से ले गया।'

नाग-कन्या कुमुद्वती

कुश की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। उसने धनुष खींचकर गरुड़ अस्त्र चढ़ाया और सर्प का नाश करने बढ़ा। कुंड का जल लहरों की बाँहें पटककर खदबदाने लगा, जैसे फँदे में पड़ा जंगली हाथी सूँड़ फटकारता है।

तभी उस कुंड से नागराज कुमुद उठा, अपने आगे एक कन्या को रखकर — जैसे समुद्र-मंथन से लक्ष्मी के साथ पारिजात निकला हो — और हाथ में वह गहना था।

कुश ने सर्पों के शत्रु गरुड़ का अस्त्र रोक लिया, क्योंकि सज्जन विनम्र के प्रति क्रोध नहीं रखते।

कुमुद ने सिर झुकाकर कहा, 'मैं जानता हूँ आप विष्णु के ही दूसरे रूप के पुत्र हैं। आप जैसों की शांति भंग करने का साहस मैं कैसे करता? यह मेरी छोटी बहन कुमुद्वती थी, जिसकी गेंद ऊपर उछली थी, और वह आपका यह गहना आसमान से गिरता हुआ देखकर कौतूहल से उठा लाई।'

'यह गहना फिर आपकी उस भुजा को पहनिए जो धरती के फाटक की अर्गला है। और राजन्, मेरी इस छोटी बहन को भी स्वीकार कीजिए, जो अपनी भूल की भरपाई जीवन-भर आपकी सेवा से करना चाहती है।'

कुश ने कहा, 'तुम मेरे योग्य संबंधी हो।' और अग्नि के सामने कुमुद्वती का हाथ पकड़ा। आकाश से दुंदुभियाँ बजीं और बादलों ने फूल बरसाए।

कुमुद को सीता के पुत्र का, त्रिलोक के स्वामी के बेटे का कुटुंबी होने का सुख मिला, और उसका गरुड़ का भय जाता रहा।

अतिथि

कुमुद्वती के बेटे का नाम अतिथि पड़ा। कुश उसे वह सब सिखाकर, पहले कुल की विद्याएँ, फिर राजाओं की कन्याओं के हाथ सौंपकर, अपने को दो गुना हुआ मानने लगे।

उसके बाद इंद्र की सहायता के लिए जाते हुए, कुश ने दुर्जय नामक दैत्य को मारा, और ख़ुद भी उसके हाथ से मारे गए। कुमुद्वती उनके पीछे गईं, जैसे चाँद के पीछे चाँदनी। इंद्र के आधे सिंहासन पर कुश बैठे, और शची की सखी बनकर कुमुद्वती पारिजात के फूलों में हिस्सेदार हुईं।

बूढ़े मंत्रियों ने राजा की अंतिम आज्ञा याद करके अतिथि का राज्याभिषेक किया। नया मंडप बना, चार खंभों वाला, ऊँची वेदी के साथ। तीर्थों के जल सोने के घड़ों में आए। बड़े-बूढ़ों ने दूर्वा के अंकुर और जौ की बालियाँ लेकर आरती उतारी। अथर्ववेद के विजयदायी मंत्र पढ़े गए।

कालिदास कहते हैं कि अभिषेक की धार उसके सिर पर ऐसे गिरी जैसे शिव के सिर पर गंगा। बंदी स्तुति करते, और वह घन-गर्जन से हर्षित चातक जैसा लगता। अभिषेक के बाद उसने स्नातकों को इतना धन दिया कि उनके यज्ञ पूरे हो सकें। बंदियों को छोड़ा, मृत्युदंड रोके, बैल जूए से, गायें दुहने से मुक्त हुईं, और पिंजरों के तोते-मैना उड़ा दिए गए।

फिर वह हाथी पर बैठकर नगर में निकला। कालिदास आगे उसके गुण गिनाते हैं: उसकी बात कभी झूठी नहीं हुई, जो दिया वह वापस नहीं लिया, और जवानी, रूप और धन तीनों के होते हुए भी उसके मन में घमंड नहीं आया।

टिप्पणी: यह अध्याय सर्ग १६ और १७ (श्लोक १६.१–८८, १७.१–८१) पर है। सर्ग १६ के श्लोक ३५–७१ (जलक्रीड़ा, ग्रीष्म-वर्णन) का केवल संकेत रखा गया है; पूरा वर्णन विस्तृत और अलंकृत है। सर्ग १७ का बड़ा भाग राजनीति-शास्त्र के गुणों की सूची है, और उसका केवल सार लिया गया है।

स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), कुश, नागकन्या और अतिथि

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

आधी रात को कुश के पास आने वाली स्त्री कौन थी?

  • सरयू नदी की देवी
  • राजलक्ष्मी, जो दिलीप के पास आई थी
  • अयोध्या नगरी की अधिष्ठात्री देवी
  • कुश की माँ सीता
पूरी कथा पढ़िए — नगरी का मुख

अयोध्या की देवी वैधव्य-सी वेशभूषा में आई थी।

उसका कहना था कि राम के साथ नागरिक स्वर्ग गए और नगर अनाथ हो गया।

कालिदास ने नगर को मनुष्य रूप में ऐसे ही रचा।

क्या हुआ?

देवी ने कुश से क्या माँगा?

  • कि वे कुशावती छोड़कर अयोध्या लौट आएँ
  • कि वे सरयू में स्नान करें
  • कि वे राज्य अतिथि को सौंप दें
  • कि वे वन चले जाएँ
पूरी कथा पढ़िए — लौट आओ

देवी ने उजड़ी अयोध्या की पूरी दशा गिनाई।

फिर कुश से कहा कि पिता के आदि रूप में लौटने की तरह वे भी अपनी राजधानी लौटें।

कुश ने मान लिया और सुबह ब्राह्मणों से अपना स्वप्न-सा अनुभव कहा।

ऐसा क्यों?

कुश ने गहना खोने पर इतना शोक क्यों किया?

  • क्योंकि वह बहुत महँगा था
  • क्योंकि रानी ने दिया था
  • क्योंकि उसमें कुबेर का धन था
  • क्योंकि वह राम से मिला विजय-कारक आभूषण था, जिसे पिता ने भी पहना था, और वह उसके लोभ से नहीं, उसकी परंपरा से जुड़ा था
पूरी कथा पढ़िए — गहने की क़ीमत

कालिदास कहते हैं कि कुश फूलों और गहनों को समान मानते थे।

पर यह आभूषण विजय का आकर्षण था और पिता से मिला था।

इसलिए वह उसे खोकर विचलित हुए।

कौन हूँ मैं?

मैं नाग-कन्या हूँ, मेरी गेंद ऊपर उछली और मैंने एक चमकता गहना आसमान से गिरते देखा। मैं कौन हूँ?

  • उर्मिला
  • कुमुद्वती
  • मांडवी
  • इंदुमती
पूरी कथा पढ़िए — नाग की बहन

कुमुद्वती का भाई नागराज कुमुद था।

उसने गहना उठाया, पर कुश के सामने भाई ने उसे लौटाया।

फिर उसका विवाह कुश से कर दिया गया।

सही क्रम

घटनाओं को सही क्रम में रखें।

  • आधी रात की देवी → अयोध्या वापसी → जलक्रीड़ा और गहना खोना → कुमुद्वती से विवाह → अतिथि का अभिषेक
  • जलक्रीड़ा और गहना खोना → आधी रात की देवी → कुमुद्वती से विवाह → अयोध्या वापसी → अतिथि का अभिषेक
  • अतिथि का अभिषेक → आधी रात की देवी → अयोध्या वापसी → जलक्रीड़ा और गहना खोना → कुमुद्वती से विवाह
  • आधी रात की देवी → कुमुद्वती से विवाह → अयोध्या वापसी → अतिथि का अभिषेक → जलक्रीड़ा और गहना खोना
पूरी कथा पढ़िए — क्रम की बात

देवी के कहने पर कुश अयोध्या लौटे।

वहाँ सरयू में जलक्रीड़ा के दौरान गहना खोया।

फिर कुमुद्वती से विवाह हुआ, और उसके बेटे अतिथि को बाद में राज मिला।

किसने कहा?

'आप जैसे योग्य संबंधी' — कुश ने यह किससे कहा?

  • देवी से
  • अतिथि से
  • मंत्रियों से
  • नागराज कुमुद से
पूरी कथा पढ़िए — संबंध

कुमुद ने कहा कि मैं आपको विष्णु का रूप जानता हूँ।

कुश ने उसे संबंधी मानकर बहन का हाथ थामा।

इसी से नाग और सूर्यवंश के बीच नया संबंध बना।

तथ्य

कुश के बाद किसका अभिषेक हुआ?

  • निषध
  • अतिथि
  • लव
  • रघु
पूरी कथा पढ़िए — नया राजा

कुश के मरने के बाद मंत्रियों ने अतिथि का राज्याभिषेक किया।

कालिदास ने इसे विस्तार से वर्णित किया है।

इसके बाद सर्ग १८ में उसका वंश चलता है।

व्याख्या

कुश के पास अयोध्या का स्त्री रूप में आना कवि की किस दृष्टि को दिखाता है? (यह हमारा पाठ है।)

  • कि कवि भूत-प्रेतों में विश्वास करता था
  • कि अयोध्या सदा के लिए नष्ट हो गई
  • कि नगर केवल इमारतें नहीं, एक जीवित उपस्थिति है, जो राजा के बिना मुरझाती है
  • कि कुश पिता को भूल गए थे
पूरी कथा पढ़िए — नगर एक देवी

कालिदास के यहाँ नगर की अपनी आवाज़ है।

वह विधवा की तरह रोती है, और राजा को पति की तरह चुनती है।

यही उपमा सर्ग १६ का केंद्र है।

क्या हुआ?

कुमुद ने कुश से बहन का विवाह कर क्या पाया?

  • नागलोक का राज
  • सरयू का स्वामित्व
  • अमरता
  • गरुड़ का भय जाता रहा, क्योंकि अब उसका संबंध सूर्यवंश से हो गया था
पूरी कथा पढ़िए — साँप और गरुड़

गरुड़ विनता के पुत्र हैं और साँपों के पुराने शत्रु माने जाते हैं; कुमुद का भय अपने पिता की मृत्यु से जुड़ा था।

कुश के साथ संबंध से कुमुद को गरुड़ से सुरक्षा मिली।

कुश को भी साँपों का भय नहीं रहा, कालिदास कहते हैं।

पहेली

मैं एक दिन गहना खो देता हूँ और उसे पाने के लिए सरयू के कुंड पर गरुड़ अस्त्र चढ़ा देता हूँ। फिर जब पता चलता है कि साँप विनम्र है, तो अस्त्र रोक लेता हूँ। मैं कौन हूँ?

  • कुश
  • अतिथि
  • लव
  • निषध
पूरी कथा पढ़िए — क्रोध और विवेक

कुश का क्रोध तुरंत आया और तुरंत लौटा भी।

कालिदास कहते हैं कि सज्जन विनम्र पर क्रोध नहीं रखते।

यही बात उसके पिता राम के चरित्र से भी मेल खाती है।

कुश, नागकन्या और अतिथि के बारे में सवाल

कुश, नागकन्या और अतिथि (रघुवंश) में क्या होता है?

जिस नगर को राम अकेला छोड़ गए थे, वह आधी रात को एक विधवा-सी स्त्री बनकर कुश के पास आया — और एक नाग-कन्या का विवाह एक खोए हुए गहने के बदले हुआ। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: आधी रात में; उजड़ी अयोध्या; अयोध्या की ओर; सरयू की जलक्रीड़ा; नाग-कन्या कुमुद्वती; अतिथि।

रघुवंश में कुश, नागकन्या और अतिथि के बाद क्या आता है?

आगे अंतिम राजा: एक वंश जो राम के बाद भी कई पीढ़ियाँ चला — और जिसके अंतिम राजा की जगह पर कालिदास कथा रोक देते हैं, गर्भवती रानी के सिंहासन पर बैठने से।

कुश, नागकन्या और अतिथि का स्रोत क्या है?

रघुवंश, सर्ग १६ और १७ (कालिदास)।