
अध्याय १०
लव-कुश और राम का प्रस्थान
दो बेटे जो अपने पिता के सामने उनकी ही कथा गाते हैं — और वह राजा जो फिर सरयू में उतर गया, सारे नगर को अपने पीछे लिए
लव-कुश और राम का प्रस्थान — रघुवंश का अध्याय १०। स्रोत: रघुवंश, सर्ग १५ (कालिदास)। इसमें ५ दृश्य हैं — सीता को छोड़ राम अकेले; ब्राह्मण का बेटा; अश्वमेध और लव-कुश; धरती का आँचल; प्रस्थान — और अंत में १० सवाल।
सीता को छोड़ राम अकेले
सीता को छोड़कर राम ने समुद्र की करधनी वाली पृथ्वी अकेले भोगी। यमुना के किनारे के ऋषि लवण राक्षस से परेशान होकर राम की शरण में आए, जिसे शिव का त्रिशूल मिला था और जो उसके हाथ में रहते हुए अजेय था।
राम ने उन्हें अभय दिया और शत्रुघ्न को भेजा। शत्रुघ्न बिना किसी बाधा के आगे बढ़ते गए। रास्ते में वह वाल्मीकि के आश्रम में रुके, और उसी रात सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकि ने उनके जन्म की विधि की और नाम रखे — कुश और लव, क्योंकि उनकी देह का मल कुश और लव (गाय की पूँछ का बाल) से पोंछा गया था।
शत्रुघ्न ने पुत्रों का समाचार सुनकर सुबह हाथ जोड़कर ऋषि से विदा ली और मधुपुरी की ओर चले।
लवण जंगल से भक्ष्य लिए लौट रहा था — काला, चर्बी की गंध वाला, जैसे चलती चिता। उसने त्रिशूल घर पर छोड़ रखा था। शत्रुघ्न ने उसी क्षण उस पर हमला कर दिया। विष्णु के बाण से लवण पृथ्वी पर गिरा, ऋषियों ने जय-जयकार किया, और आसमान से फूल गिरे। उसी जगह यमुना के किनारे शत्रुघ्न ने मथुरा नगरी बसाई।
ब्राह्मण का बेटा
शत्रुघ्न अयोध्या लौटे तो रास्ते में वाल्मीकि के आश्रम में फिर रुके। रात को उन्होंने दूर से कुमारों के गाने की ध्वनि सुनी। सुबह उन्हें राम से मिलना था।
अयोध्या में एक ब्राह्मण अपने मरे बेटे को लेकर राम के द्वार पर आया और रोते हुए कहने लगा, 'हे पृथ्वी, तेरी यह कैसी दशा है! दशरथ के हाथ से छूटकर राम के हाथ आई तू, पर पहले से भी अधिक कष्ट में।'
राम लज्जित हुए। इक्ष्वाकु वंश के राज्य में पहले कभी असमय मृत्यु नहीं आई थी। उन्होंने कहा, 'ज़रा रुकिए' और कुबेर के पुष्पक का स्मरण किया।
पुष्पक पर चढ़कर, हथियार लिए राम निकले, और आकाशवाणी हुई — 'राजन्, तुम्हारे राज्य में कहीं धर्म के विरुद्ध कुछ हो रहा है। उसे खोजो और रोको, तब तुम्हारा कार्य पूरा होगा।' राम ने दिशाओं में ढूँढ़ा। एक जगह उन्होंने एक तपस्वी को पेड़ की डाल से सिर के बल लटके देखा — आँखें लाल, तप में लीन।
राम ने पूछा, 'तुम कौन हो?' उसने अपना नाम बताया — शंबूक — और कहा कि वह शूद्र है और देवपद पाने के लिए तप कर रहा है।
कालिदास आगे सीधा कहते हैं: राम ने उसे दंड के योग्य समझा — क्योंकि वह जिस तप का अधिकारी नहीं था, उसे करके प्रजा पर विपत्ति ला रहा था — और अपना हथियार उठाकर उसका सिर काट दिया। कटे हुए कमल जैसे उस सिर पर आग से झुलसे हुए तंतु थे। शंबूक ने, कवि के अनुसार, वह लोक पाया जो पुण्यात्माओं को मिलता है, अपनी कठिन तपस्या से नहीं, पर इसलिए कि उसे राजा के हाथ से दंड मिला। और ब्राह्मण का बेटा जी उठा।
राम फिर अगस्त्य से मिलते हुए लौटे। अगस्त्य ने उन्हें एक आभूषण दिया — जो देवों का दिया हुआ था, और समुद्र से अगस्त्य ने समुद्र को पीकर उसकी फिरौती में पाया था।
अश्वमेध और लव-कुश
फिर राम ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ा। राक्षस, वानर और मनुष्य सब आए, जैसे बादल पके खेतों पर बरसें। अयोध्या में ऋषि इतने आ गए कि चारों दिशाओं के द्वारों वाला नगर ऐसा लगा जैसे ब्रह्मा के चार चेहरे हों। यज्ञ में सीता की जगह राम ने सोने की सीता रखी — क्योंकि उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया था।
उसी समय लव और कुश वाल्मीकि की रचना — रामायण — गुरु के निर्देश से गाते हुए इधर-उधर घूमते थे। रामकथा थी, कवि वाल्मीकि की रचना, और किन्नरों जैसी आवाज़ — श्रोता कैसे न मोहित होते? राम ने उनकी सुंदरता और मधुर स्वर के बारे में सुना। उन्हें देखा तो उनका रूप अपना-सा लगा।
कुमारों ने राम की कथा राम के ही सामने गाई, और राम ने सुना। वाल्मीकि ने राम से कहा कि ये आपके ही पुत्र हैं, सीता से जन्मे। फिर उन्होंने सीता को सभा में बुलाया।
धरती का आँचल
सीता आईं — गेरुए वस्त्र में, आँखें अपने पैरों पर, शरीर शांत। सारा जन-समूह आँखें झुकाकर खड़ा रहा, जैसे फल से भरी धान की बालें। वाल्मीकि ने उनसे कहा, 'बेटी, पति के सामने लोगों के संदेह मिटाओ।'
सीता ने जल से आचमन किया, और बोलीं, 'अगर मैंने मन, वचन या कर्म से पति का अतिक्रमण न किया हो, तो हे सब कुछ सहने वाली पृथ्वी, मुझे अपने भीतर जगह दे।'
उसी क्षण धरती फटी, बिजली-सी रोशनी निकली, और समुद्र की करधनी पहने पृथ्वी देवी प्रकट हुईं, साँपों के फनों पर रखे सिंहासन पर बैठी। उन्होंने सीता को अपनी गोद में बिठा लिया और पाताल में चली गईं। राम चिल्लाते रहे, 'नहीं, नहीं।' राम ने पृथ्वी पर क्रोध करके धनुष उठा लिया। तब गुरु वाल्मीकि ने उन्हें नियति की प्रबलता समझाकर शांत किया।
यज्ञ पूरा हुआ। राम ने ऋषियों और मित्रों को विदा किया, और सीता का सारा स्नेह उनके दो पुत्रों पर उड़ेल दिया।
प्रस्थान
भरत सिंधु देश को जीतने गया, राम से भेजा हुआ, और गंधर्वों को उसने ऐसा हराया कि उन्हें हथियार छोड़कर केवल वीणाएँ पकड़नी पड़ीं। उसके दो पुत्रों को तक्षशिला और पुष्कलावती का राज मिला।
फिर एक दिन स्वयं काल मुनि का वेश धरकर राम से एकांत में बात करने आया और शर्त रखी गई कि बीच में जो आएगा, वह त्याग दिया जाएगा। लक्ष्मण द्वार पर थे। ऋषि दुर्वासा का शाप सामने आया तो लक्ष्मण ने भाई की शर्त तोड़ दी। राम ने अपने वचन के अनुसार लक्ष्मण का त्याग किया — और लक्ष्मण सरयू के किनारे योग से देह छोड़कर स्वर्ग चले गए।
कालिदास कहते हैं कि राम अपने ही चौथाई भाग के पहले चले जाने से तीन पैरों वाले धर्म की तरह रह गए। उन्होंने कुश को कुशावती और लव को शरावती का राजा बनाया, और भाइयों के साथ, आगे-आगे पवित्र अग्नि रखे, उत्तर की ओर निकल पड़े। अयोध्या के लोग प्रेम से पीछे-पीछे चले। वानर और राक्षस भी उनका इरादा जानकर पीछे आए। कदंब की कलियों जैसे बड़े आँसू उनके रास्ते पर गिरे।
सरयू में उतरते हुए राम के लिए एक स्वर्गीय रथ प्रतीक्षा कर रहा था। भक्तों पर कृपा करके उन्होंने सरयू को स्वर्ग की सीढ़ी बना दिया। जैसे गायों का झुंड पार करता है, वैसे वहाँ भीड़ उतरी, इसीलिए वह स्थान गोप्रतार कहलाया — तीर्थ।
सुग्रीव जैसे देवताओं के अंश अपने मूल में लौटे, और राम ने उन नागरिकों के लिए, जो देवता हो गए थे, एक अलग स्वर्ग बनाया।
और फिर, देवताओं का काम पूरा करके — रावण का सिर काटकर, लंका विभीषण को और उत्तर के पर्वत हनुमान को देकर — राम ने अपना रूप विष्णु में लौटा लिया।
टिप्पणी: यह अध्याय सर्ग १५ पर है। सर्ग १५ का शंबूक-प्रसंग (श्लोक ४९–५३) रघुवंश में भी है और वाल्मीकि के उत्तरकांड में भी; कवि जो कहता है, उसी के अनुसार लिखा गया है, पर उसे आदर्श या निर्णय के रूप में नहीं रखा गया। सर्ग १५ के कुछ श्लोकों का ओसीआर स्रोत में साफ़ नहीं था; ऐसे स्थानों में केवल घटना रखी गई है।
स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), लव-कुश और राम का प्रस्थान