
अध्याय ३
रघु और कौत्स
दिग्विजय से लौटे राजा ने यज्ञ में सब कुछ दे दिया — और जब एक ब्रह्मचारी माँगने आया, तो मिट्टी के बर्तन में अर्घ्य देकर कुबेर से सोना माँग लिया
रघु और कौत्स — रघुवंश का अध्याय ३। स्रोत: रघुवंश, सर्ग ४ और सर्ग ५ (श्लोक १–३५) (कालिदास)। इसमें ४ दृश्य हैं — शरद में निकला राजा; चारों दिशाओं की ओर; मिट्टी का बर्तन; कुबेर के ख़ज़ाने से — और अंत में १० सवाल।
शरद में निकला राजा
रघु ने राज संभाला तो उन शत्रुओं के मन में, जो दिलीप के सामने दबे थे, आग जल उठी। लेकिन रघु ने पिता का सिंहासन सँभालते ही शत्रुओं को भी अपने वश में कर लिया।
प्रजा उनसे वैसे ही आशा से देखती थी जैसे इंद्र की पताका को। राजनीति जानने वालों ने उन्हें दो रास्ते बताए — सीधा और टेढ़ा। रघु ने पहला ही चुना। कालिदास कहते हैं कि जैसे चंद्र अपनी शीतलता से और सूर्य अपने ताप से अपना नाम पाता है, वैसे ही रघु 'राजा' कहलाए, क्योंकि उन्होंने प्रजा को रंजन किया।
फिर शरद आई। रास्ते सूख गए, नदियाँ उथली हुईं, और कालिदास के शब्दों में शरद ने ख़ुद उन्हें दिग्विजय का न्योता दिया — उनके अपने तेज के उकसाने से भी पहले। घोड़ों की पूजा हुई, यज्ञ की अग्नि ने दाहिनी लौ से जीत का आशीर्वाद दिया, और रघु सेना लेकर निकल पड़े।
चारों दिशाओं की ओर
वह पहले पूर्व की ओर चले। वहाँ के सुह्म राजा नरकट की तरह झुककर बच गए, और बंग के जो राजा नावों से भिड़े, उन्हें उखाड़ दिया गया। फिर कपिशा नदी हाथियों के पुल से पार हुई, और कलिंग के राजा से, जो महेंद्र पर्वत का स्वामी था, उनका युद्ध हुआ। रघु ने उसे जीता, पर कालिदास कहते हैं कि उन्होंने उसका धन लिया, राज्य नहीं।
फिर वह दक्षिण गए — कावेरी, मलय पर्वत की इलायची और मिर्च, और पांड्य राजा, जिन्होंने ताम्रपर्णी के संगम के मोती उन्हें भेंट किए। पश्चिम में केरल की स्त्रियों के केशों पर उनकी सेना की धूल जमी, और कालिदास यह भी कहते हैं कि रघु के लिए समुद्र ने पश्चिमी राजाओं के बहाने कर ही चुका दिया — जैसे राम को उसने राह दी थी। फिर वे ज़मीन के रास्ते फ़ारस वालों से लड़े।
उत्तर की ओर सिंधु के किनारे उनके घोड़ों ने साँस ली। हूणों की स्त्रियों के गालों में लालिमा आई — यानी उनके पतियों की हार। कंबोज के राजा अखरोट के पेड़ों के साथ झुक गए, जिनसे उनके हाथी बँधे थे। फिर हिमालय, किरात, किन्नर — और ब्रह्मपुत्र पार करके प्राग्ज्योतिष के राजा।
लौटकर रघु ने विश्वजित यज्ञ किया, जिसमें अपना सब कुछ दक्षिणा में दे दिया जाता है। कालिदास कहते हैं कि अच्छे लोग बादलों की तरह होते हैं: लेते ही बाँटने के लिए हैं। हारे हुए राजाओं का उन्होंने मान किया, और उन्हें उनके नगर लौटा दिया।
मिट्टी का बर्तन
यज्ञ के बाद रघु के पास कुछ नहीं बचा था। वह दिन था जब वरतंतु का शिष्य कौत्स उनके पास आया। उसने पढ़ाई पूरी की थी, और गुरु को दक्षिणा देनी थी।
सोने के बर्तन सब जा चुके थे। रघु मिट्टी के बर्तन में पूजा की सामग्री लेकर अतिथि का स्वागत करने आए। कौत्स ने यह देखा तो समझ गया कि राजा के पास अब राजा होने के नाम के सिवा कुछ नहीं बचा। राजा ने पूछा, 'आपके गुरु कुशल हैं? उनका तप तो इंद्र का आसन डोलाता है। आपके आश्रम के पेड़, पानी, हिरन — सब ठीक हैं? और आप किस प्रयोजन से आए हैं?'
कौत्स बोला, 'राजन्, सब कुशल है। आप जैसे राजा के रहते प्रजा को क्या कष्ट? पर मैं समय पर नहीं आया। आपने तो सब कुछ याचकों को दे दिया है — जैसे नीवार धान को वनवासी ले जाएँ और केवल डंठल बचे।' वह लौटने को उठा।
रघु ने उसे रोका। 'आप क्या चाहते हैं, कितना?' कौत्स ने कहा, 'गुरु ने मुझसे दक्षिणा नहीं माँगी थी। मैं ही हठ करता रहा। तब उन्होंने झुँझलाकर कहा, जितनी विद्याएँ पढ़ी हैं, उतने करोड़ सोने के सिक्के लाओ — चौदह करोड़।' रघु ने कहा, 'एक याचक गुरु-दक्षिणा के लिए रघु के घर आया और दूसरे के पास चला गया — यह नया अपयश मेरे नाम पर न लगे। आप दो-तीन दिन मेरी अग्निशाला में चौथी अग्नि की तरह ठहरिए। मैं प्रबंध करता हूँ।'
कुबेर के ख़ज़ाने से
रघु ने सोचा कि पृथ्वी तो ख़ाली है। इसलिए कुबेर से ही वसूल करूँगा। वसिष्ठ के अभिषेक से उनके रथ को वह शक्ति मिली थी कि समुद्र पर, आकाश में, पहाड़ों पर कहीं न रुकता। रात को हथियारों से भरे रथ में वह सो गए, और कुबेर को एक अधीन सामंत मानकर चढ़ाई की तैयारी की।
भोर होते ही ख़ज़ांची हाँफते हुए आए। आकाश से ख़ज़ाने में सोने की वर्षा हुई थी। कुबेर लड़ने के पहले ही भेंट कर चुका था।
रघु ने वह सारा सोना कौत्स को देना चाहा। कौत्स ने सिर्फ़ चौदह करोड़ लिए, एक सिक्का भी ज़्यादा नहीं। रघु कहते रहे कि सब आपका है, कौत्स कहता रहा कि मुझे उतना ही चाहिए जितना गुरु ने माँगा। अयोध्या के लोग देखकर चकित थे — एक वह जिसने ज़रूरत से ज़्यादा नहीं लिया और दूसरा वह जिसने माँगे से ज़्यादा दिया।
सैकड़ों ऊँटों और खच्चरों पर ख़ज़ाना लद गया। जाते हुए कौत्स ने रघु के सिर पर हाथ रखकर कहा, 'जिस राजा से आकाश भी दुहा जाए, उसके लिए धरती का देना कोई आश्चर्य नहीं। आपको और कुछ आशीर्वाद क्या दूँ? बस एक — आपको अपने जैसा पुत्र मिले, जैसे आपके पिता को आप मिले।'
उसी आशीर्वाद के बाद रघु के घर पुत्र जन्मा। ब्रह्म-मुहूर्त में हुआ, इसलिए ब्रह्मा के नाम पर उसका नाम रखा गया — अज।
टिप्पणी: इस अध्याय में सर्ग ४ (दिग्विजय) और सर्ग ५ के श्लोक १–३५ (कौत्स की कथा) हैं। कालिदास ने भौगोलिक नाम (सुह्म, बंग, कलिंग, पांड्य, कांबोज, प्राग्ज्योतिष) ऐसे दिए हैं जिनका आज की जगहों से हर बार ठीक मेल नहीं बिठाया जा सकता; इसलिए यहाँ केवल दिशाएँ और जाने-पहचाने नाम रखे गए हैं।
स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), रघु और कौत्स