रघु का जन्म — रघुवंश, चित्र

अध्याय २

रघु का जन्म

जिस बेटे का नाम 'जाने वाला' रखा गया — और जिसने इंद्र से लड़ाई करके भी घोड़ा नहीं छीना, पिता का यज्ञ छुड़ाया

रघु का जन्म — रघुवंश का अध्याय २। स्रोत: रघुवंश, सर्ग ३ (कालिदास)। इसमें ५ दृश्य हैं — जन्म; नाम; सौवाँ घोड़ा; इंद्र से युद्ध; परिवार की रीत — और अंत में १० सवाल।

जन्म

सुदक्षिणा के गर्भ के लक्षण सामने आने लगे। कालिदास कहते हैं कि वे पीली पड़ गईं, गहने कम पहनतीं, और देह इतनी दुबली हुई कि भोर के आकाश-सी लगती थीं जिसमें कुछ तारे बचे हों और चाँद फीका हो गया हो। राजा बार-बार पूछते थे कि कोई इच्छा हो तो बताओ — और वह कोई भी इच्छा हो, उनके लिए असंभव कुछ नहीं था।

गर्भ जैसे-जैसे बढ़ा, वह रानी को पृथ्वी जैसी लगने लगी जिसके भीतर निधि छिपी हो। नौ महीने पूरे हुए। जिस घड़ी बेटे का जन्म हुआ, पाँच ग्रह ऊँचे स्थान पर थे, दिशाएँ उजली हो गईं और यज्ञ की आग की लौ दाहिनी ओर झुकी। नवजात के तेज से प्रसूतिगृह के दीये ऐसे फीके पड़े जैसे चित्र में बने हों।

राजा ने सेवक को, जो बेटे की ख़बर लेकर आया, तीन चीज़ें छोड़कर सब कुछ दे दिया। तीन चीज़ें — चाँद-सा सफ़ेद छत्र और दो चँवर — जो राजा के चिह्न हैं। बेटे का पहला मुख देखते हुए उनकी आँखें कमल की तरह ठहरी रहीं।

नाम

नामकरण में पिता ने सोचा कि यह बालक पढ़ाई के आख़िरी छोर तक भी जाएगा और शत्रुओं के आख़िरी छोर तक भी। इस 'जाने' के अर्थ पर उन्होंने उसका नाम रखा — रघु।

रघु बड़ा हुआ। जैसे नया चाँद सूर्य की किरणों से दिन-दिन बढ़ता है, वैसे ही। उसने अक्षर सीखे, यज्ञोपवीत हुआ, चारों विद्याएँ सीखीं, और पिता से ही अस्त्र-विद्या — क्योंकि दिलीप धरती का एकमात्र राजा ही नहीं, एकमात्र धनुर्धर भी थे। विवाह हुआ, और फिर राजा ने बेटे को युवराज बना दिया। कालिदास कहते हैं कि राजलक्ष्मी, जो गुणों को चाहती थी, पुराने राजा से आधी उठकर नए 'युवराज' नाम वाले ठिकाने पर आ गई, जैसे सुंदरता का वास एक खिले कमल से दूसरे खिले कमल पर चला जाए।

सौवाँ घोड़ा

दिलीप ने निन्यानवे यज्ञ बिना बाधा पूरे कर लिए थे। अब सौवें के लिए घोड़ा छोड़ा गया, और उसकी रक्षा का भार रघु को सौंपा गया, साथ में दूसरे राजकुमार और धनुर्धर।

पर रखवालों की आँखों के सामने ही, अदृश्य होकर, इंद्र वह घोड़ा उठा ले गए।

सेना हक्की-बक्की रह गई। तभी वहीं वसिष्ठ की गाय नंदिनी आती दिखी। रघु ने नंदिनी के शरीर से बहा पवित्र जल अपनी आँखों पर लगाया, और उसकी दृष्टि इंद्रियों से परे की चीज़ें देखने लगी। उसने पूर्व में इंद्र को देखा — हरे घोड़ों वाला रथ, घोड़ा रस्सी से बँधा, और सारथी उसे बार-बार रोकता हुआ।

रघु की आवाज़ आकाश तक पहुँची। 'देवेंद्र, यज्ञ में सबसे पहला भाग आप ही का है। फिर मेरे पिता के यज्ञ में आप ही बाधा कैसे डाल रहे हैं? यज्ञ के शत्रुओं को तो आप रोकते हैं, आप ही रोकेंगे तो धर्म कैसे चलेगा?'

इंद्र ने जवाब दिया: 'क्षत्रिय-पुत्र, तुम्हारी बात सच है। पर जिनकी संपत्ति यश है, उन्हें अपना यश बचाना पड़ता है। तुम्हारे पिता सौ यज्ञ करके मेरे ही बराबर का नाम पाना चाहते हैं। जैसे हरि अकेले पुरुषोत्तम हैं और शिव अकेले महेश्वर, वैसे ही 'शतक्रतु' मैं ही हूँ। सगर के पुत्रों की तरह अपनी राह मत बिगाड़ो — कपिल का रूप धरकर मैं यह घोड़ा लाया हूँ।'

इंद्र से युद्ध

रघु हँसा। 'तो हथियार उठाइए, देवेंद्र। रघु को जीते बिना आपको घोड़ा नहीं मिलेगा।' और उसने ऊपर मुँह करके धनुष पर तीर चढ़ाया, खड़ा हुआ जैसे शिव आलीढ़ मुद्रा में हों।

इंद्र को क्रोध आ गया। उसने वज्र-से भी अमोघ तीर छोड़ा जो रघु की चौड़ी छाती में धँसा, और रघु ने भी स्कंद-सी शक्ति से अपना नाम लिखा तीर इंद्र की उस भुजा में गाड़ दिया जिसकी उँगलियाँ ऐरावत को थपथपा-थपथपाकर खुरदरी हो चुकी थीं। फिर एक और तीर से उसने इंद्र की वज्र वाली ध्वजा गिरा दी। देवता क्रोध में थे, सिद्ध ऊपर से और सैनिक नीचे से चुप देख रहे थे।

तब रघु ने अर्धचंद्र तीर से इंद्र की धनुष की डोरी काट दी। इंद्र ने धनुष फेंककर वज्र उठाया। वह वज्र सीधा रघु की छाती पर लगा और वह गिर पड़ा — सैनिकों के आँसू भी साथ गिरे। पर क्षण-भर में उसने वह पीड़ा झटक दी और उठ खड़ा हुआ, और सैनिकों की जयकार उसके साथ उठी।

इंद्र उसके पराक्रम से प्रसन्न हो गए। 'मेरा वज्र पर्वतों पर भी नहीं रुकता, और तुमने उसे झेल लिया। मैं प्रसन्न हूँ — घोड़े के सिवा जो चाहो माँगो।'

रघु ने उसी विनय से कहा। 'देवेंद्र, यदि घोड़ा नहीं लौटेगा, तो आप ऐसा करें कि मेरे पिता को सौ यज्ञों का पूरा फल मिल जाए, मानो यज्ञ विधि से पूरा हुआ हो। और अपने दूत से यह सब मेरे पिता तक पहुँचवा दें, जो यज्ञशाला में बैठे हैं।'

इंद्र ने 'ऐसा ही होगा' कहा और चले गए। रघु मन-ही-मन कुछ अधूरे संतोष के साथ पिता की सभा में लौटा। पिता पहले ही इंद्र के दूत से सब सुन चुके थे। उन्होंने बेटे के उस शरीर को हाथ से छुआ जिस पर वज्र का घाव था — और उनका हाथ आनंद से सुन्न था।

परिवार की रीत

कालिदास के शब्दों में, दिलीप ने इस तरह निन्यानवे यज्ञ पूरे किए, मानो स्वर्ग पहुँचने की सीढ़ी बनाई हो।

फिर उन्होंने वही किया जो इक्ष्वाकु-वंश के राजा बुढ़ापे में करते आए थे। मन विषयों से हटा लिया, सफ़ेद छत्र बेटे के सिर पर रख दिया, और रानी के साथ जंगल में, तपस्वियों के बीच, किसी पेड़ की छाया में रहने चल दिए।

टिप्पणी: यह अध्याय सर्ग ३ पर है (श्लोक १–७०)। मल्लिनाथ की टीका से कुछ शब्द-अर्थ लिए गए हैं, पर घटनाएँ मूल के अनुसार हैं।

स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), रघु का जन्म

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

बेटे का नाम 'रघु' क्यों रखा गया — कालिदास के अनुसार?

  • क्योंकि वह रघु नाम के पूर्वज के नाम पर था
  • क्योंकि वह सूर्य जैसे तेज वाला था
  • इस धातु का अर्थ 'जाना' है, और वह विद्या और शत्रु दोनों के छोर तक जाएगा
  • क्योंकि वह रात के पहर में जन्मा था
पूरी कथा पढ़िए — नाम का अर्थ

कालिदास कहते हैं कि राजा ने 'जाना' अर्थ वाली धातु को ध्यान में रखकर नाम दिया।

आगे चलकर यह वंश उसी के नाम से 'रघुवंश' कहलाया।

मल्लिनाथ की टीका भी यही व्युत्पत्ति मानती है।

क्या हुआ?

दिलीप ने बेटे के जन्म की ख़बर लाने वाले को क्या नहीं दिया?

  • चाँद-सा सफ़ेद छत्र और दो चँवर
  • अपना राजमुकुट
  • अपनी तलवार
  • अपना रथ
पूरी कथा पढ़िए — तीन चिह्न

राजा ने तीन चीज़ें रोक लीं: एक छत्र और दो चँवर।

बाक़ी सब कुछ उसने उस सेवक को दे डाला जो बेटे की ख़बर लाया था।

छत्र और चँवर राजा के चिह्न माने जाते हैं।

ऐसा क्यों?

इंद्र ने दिलीप के सौवें यज्ञ का घोड़ा क्यों चुराया?

  • क्योंकि दिलीप ने उनका अपमान किया था
  • क्योंकि सुरभि ने उन्हें भेजा था
  • क्योंकि कपिल ने उन्हें कहा था
  • क्योंकि सौ यज्ञ करने वाला 'शतक्रतु' कहलाता है, और वह नाम केवल उनका था
पूरी कथा पढ़िए — एक नाम की चिंता

इंद्र ने कहा कि जैसे विष्णु का नाम पुरुषोत्तम और शिव का महेश्वर किसी दूसरे को नहीं मिलता, वैसे शतक्रतु भी एक ही है।

इसी बहाने कालिदास सगर के पुत्रों की उस पुरानी कथा की ओर इशारा करते हैं।

इंद्र ने ख़ुद को कपिल मुनि जैसा बताकर घोड़ा रखा।

कौन हूँ मैं?

मैं वसिष्ठ की गाय हूँ। मेरे शरीर के जल से रघु की आँखें वह देखने लगीं जो आम आँखें नहीं देख पातीं। मैं कौन हूँ?

  • सुरभि
  • नंदिनी
  • कामधेनु
  • अरुंधती
पूरी कथा पढ़िए — दो बार आई गाय

पहली बार नंदिनी दिलीप की परीक्षा में आई थीं।

दूसरी बार वही गाय अचानक रघु की सेना के पास पहुँचीं, जब घोड़ा चोरी हो चुका था।

कालिदास इसे संयोग बताते हैं — 'दैवयोग से'।

सही क्रम

इस अध्याय की घटनाओं को सही क्रम में रखें।

  • रघु का जन्म → युवराज-पद → घोड़े की चोरी → इंद्र से युद्ध → दिलीप का वन-गमन
  • घोड़े की चोरी → रघु का जन्म → इंद्र से युद्ध → युवराज-पद → दिलीप का वन-गमन
  • युवराज-पद → रघु का जन्म → दिलीप का वन-गमन → घोड़े की चोरी → इंद्र से युद्ध
  • इंद्र से युद्ध → रघु का जन्म → घोड़े की चोरी → दिलीप का वन-गमन → युवराज-पद
पूरी कथा पढ़िए — तीन पड़ाव

पहले जन्म और शिक्षा, फिर युवराज-पद।

उसके बाद घोड़े की चोरी और युद्ध, जो रघु की पहली बड़ी परीक्षा है।

अंत में दिलीप वही करते हैं जो उनके वंश की रीत थी।

किसने कहा?

'घोड़े के सिवा जो चाहो माँगो' — किसने किससे कहा?

  • दिलीप ने रघु से
  • वसिष्ठ ने रघु से
  • रघु ने इंद्र से
  • इंद्र ने रघु से
पूरी कथा पढ़िए — वर

इंद्र रघु की वीरता से प्रसन्न हो गए थे।

रघु ने घोड़ा नहीं, पिता के यज्ञ का फल माँगा।

इंद्र ने वचन दिया, और दूत से यज्ञशाला में यह संदेश भी भिजवाया।

तथ्य

दिलीप कितने यज्ञ बिना बाधा के पूरे कर चुके थे?

  • सौ
  • निन्यानवे
  • पचास
  • इक्कीस
पूरी कथा पढ़िए — सौ में एक कम

निन्यानवे यज्ञ पूरे हो चुके थे और सौवें के लिए घोड़ा छोड़ा गया था।

आगे सर्ग ६ में कालिदास यह भी कहते हैं कि दिलीप ने इंद्र की ईर्ष्या से बचने के लिए सौ से एक कम ही यज्ञ किए थे।

यानी सौ का आँकड़ा इस कथा में दो बार दोहराया जाता है।

व्याख्या

रघु ने इंद्र से घोड़ा नहीं, पिता के यज्ञ का फल माँगा। इसे हम कैसे पढ़ें? (यह हमारा पाठ है।)

  • वह इंद्र से डर गया था
  • वह घोड़ा लौटाने पर राज़ी नहीं था
  • जीत से ज़्यादा उसे यह चिंता थी कि पिता का काम अधूरा न दिखे
  • उसे यज्ञ में कोई रुचि नहीं थी
पूरी कथा पढ़िए — जो माँगा

रघु घोड़ा माँग सकता था, पर माँगा कि पिता को यज्ञ का फल पूरा मिले।

यह एक पढ़त है — श्लोक में केवल उसकी माँग है, मन की बात नहीं।

इसी से इंद्र ने उसे कहे हुए शब्द से बड़ा माना।

क्या हुआ?

इंद्र के वज्र से घायल होकर रघु ने क्या किया?

  • युद्ध छोड़कर लौट गया
  • मूर्छित पड़ा रहा, और इंद्र घोड़ा ले गया
  • नंदिनी की गोद में गिर पड़ा
  • पीड़ा को क्षण-भर में झटककर उठ खड़ा हुआ और सैनिक जयकार करने लगे
पूरी कथा पढ़िए — गिरकर उठना

वज्र रघु की छाती पर लगा और वह ज़मीन पर गिरा, सैनिकों के आँसू साथ गिरे।

थोड़ी ही देर में वह उठ खड़ा हुआ।

इसी साहस से इंद्र प्रसन्न हुए, और वर देने को तैयार हो गए।

पहेली

मैं इंद्र के दूत की बात सुनकर बेटे की छाती पर वज्र का घाव छूता हूँ और मेरा हाथ आनंद से सुन्न है। मैं कौन हूँ?

  • दिलीप
  • वसिष्ठ
  • रघु
  • अज
पूरी कथा पढ़िए — पिता का हाथ

दिलीप ने पहले ही इंद्र के दूत से सारी बात सुन ली थी।

लौटे बेटे को उन्होंने सीने से लगाया, और हाथ से उसका घाव छुआ।

कालिदास कहते हैं कि वह हाथ आनंद के मारे सुन्न था।

रघु का जन्म के बारे में सवाल

रघु का जन्म (रघुवंश) में क्या होता है?

जिस बेटे का नाम 'जाने वाला' रखा गया — और जिसने इंद्र से लड़ाई करके भी घोड़ा नहीं छीना, पिता का यज्ञ छुड़ाया। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: जन्म; नाम; सौवाँ घोड़ा; इंद्र से युद्ध; परिवार की रीत।

रघुवंश में रघु का जन्म के बाद क्या आता है?

आगे रघु और कौत्स: दिग्विजय से लौटे राजा ने यज्ञ में सब कुछ दे दिया — और जब एक ब्रह्मचारी माँगने आया, तो मिट्टी के बर्तन में अर्घ्य देकर कुबेर से सोना माँग लिया।

रघु का जन्म का स्रोत क्या है?

रघुवंश, सर्ग ३ (कालिदास)।