
अध्याय ९
सीता का त्याग
जिस राजा ने सीता को आग से शुद्ध पाया था, उसी ने एक दूत के मुँह से नगर की बात सुनकर उन्हें वन में भेज दिया — और सीता ने जाते हुए जो संदेश भेजा, उसमें एक शिकायत नहीं थी
सीता का त्याग — रघुवंश का अध्याय ९। स्रोत: रघुवंश, सर्ग १४ (कालिदास)। इसमें ५ दृश्य हैं — राज्याभिषेक; गर्भ और अफ़वाह; राम का निश्चय; गंगा के किनारे; सीता का संदेश — और अंत में १० सवाल।
राज्याभिषेक
पुष्पक अयोध्या के पास रुका। सरयू किनारे के बग़ीचे में राम ने अपनी माताओं को देखा। पति के बिना बूढ़ी, दोनों रानियाँ बेटों को आँसुओं से देखती थीं और ठीक से पहचान भी नहीं पाईं — बस बेटे का स्पर्श पहचान लिया। सीता ने आगे आकर कहा, 'मैं सीता हूँ, अभागी, जिसने पति को संकट दिया,' और दोनों सासों के चरण छुए।
माताओं ने कहा, 'उठो बेटी। तुम्हारे ही गुणों से तुम्हारे पति ने यह विपत्ति पार की।'
वृद्ध मंत्री तीर्थों का जल सोने के घड़ों में भरकर लाए और राम का अभिषेक किया। लेकिन मानो यह अभिषेक माताओं की आँखों से निकले खुशी के आँसुओं के साथ पहले ही शुरू हो चुका था। उनके साथ राक्षसों और वानरों के सरदार भी नदियों, समुद्रों और झीलों का जल लाए, जैसे विंध्य पर्वत पर बादल का जल गिरे।
राम रथ पर चढ़कर राजधानी में निकले। लक्ष्मण चँवर डुला रहा था, भरत छत्र थामे था। कालिदास कहते हैं कि वह चारों समुद्रों के एक साथ उठ आने जैसे लगे। अगरु के धुएँ का स्तंभ महल से उठा और हवा में फैला, जैसे वनवास से लौटे राम ने ख़ुद नगर के बाल खोल दिए हों।
फिर राम ने कैकेयी के पास जाकर हाथ जोड़कर कहा, 'माँ, पिता ने सत्य से डिगकर स्वर्ग का फल खोया नहीं — यह आपके ही सत्कर्म का फल था।' इस तरह उसकी लज्जा हर ली।
गर्भ और अफ़वाह
कुछ समय बाद सीता का मुख पीला पड़ गया — शरद के काँस जैसा, आँखें पहले से ज़्यादा चमकदार, और बिना कहे ही उनके गर्भवती होने का पता चल गया। राम ने उन्हें गोद में लेकर एकांत में पूछा कि उनकी क्या इच्छा है।
सीता ने कहा कि मैं गंगा के किनारे फिर से उन तपोवनों में जाना चाहती हूँ, जहाँ कुश उगे हैं, नीवार धान हिरन चरते हैं, और ऋषि-कन्याएँ मेरी सखियाँ बनीं। राम ने वचन दिया।
राम अपने महल की सबसे ऊँची अटारी पर चढ़े, अयोध्या को देखने। बाज़ार भरे थे, सरयू में नावें चल रही थीं, बग़ीचों में नागरिक घूम रहे थे। उन्होंने अपने गुप्तचर भद्र से पूछा कि नगर में उनके बारे में क्या बात होती है।
भद्र ने झिझकते हुए कहा, 'महाराज, प्रजा आपके हर कर्म की प्रशंसा करती है — केवल एक को छोड़कर: कि आपने उस रानी को फिर से स्वीकार किया, जो राक्षस के घर में रही थी।'
कालिदास कहते हैं कि यह सुनते ही राम का हृदय ऐसे टूटा जैसे गरम लोहे पर हथौड़ा पड़ा हो।
राम का निश्चय
राम के सामने दो रास्ते थे: इस बात को अनसुना करें, या निर्दोष पत्नी को छोड़ें। उनका मन झूले की तरह इधर-उधर डोला। उन्होंने तय किया कि अपवाद को किसी और तरह नहीं मिटाया जा सकता। जिनकी निधि यश है, उनके लिए यश देह से भारी है, फिर पत्नी की क्या गिनती।
उन्होंने तीनों भाइयों को बुलाया। उनका रंग उड़ा हुआ था। उन्होंने कहा, 'देखो, मेरे कारण सूर्यवंश पर कैसा कलंक आया है, जैसे दर्पण पर साँस की भाप। मैं यह पहला और अकेला अपयश सह नहीं सकता, जैसे नया हाथी बाँधने का खूँटा नहीं सहता। इसे मिटाने के लिए मैं जनक की बेटी को छोड़ दूँगा, चाहे वह गर्भवती हो — जैसे पिता की आज्ञा से मैंने पृथ्वी छोड़ी थी।
'मैं जानता हूँ कि वह निर्दोष है। पर लोकनिंदा बड़ी है — पृथ्वी की छाया को भी लोग चाँद का कलंक कहते हैं। और मेरा रावण को मारना भी इसी अपमान के बदले के लिए था। क्या साँप को कोई कुचल दे और वह काटे नहीं?
'तुम लोग अपनी करुणा से मुझे रोकना मत।' भाइयों में से किसी की हिम्मत उत्तर देने की न हुई।
तब राम ने अपने आज्ञाकारी लक्ष्मण को बुलाकर कहा, 'तुम्हारी भाभी ने तपोवन जाने की इच्छा की है। उसे रथ में उसी बहाने वाल्मीकि के आश्रम के पास छोड़ आओ।'
गंगा के किनारे
लक्ष्मण ने परशुराम की कथा सुनी थी, जिन्होंने पिता की आज्ञा से माँ को मारा था; इसलिए बड़े भाई की आज्ञा पर प्रश्न नहीं किया। सारथी सुमंत्र ने तेज़ घोड़े जोते, और लक्ष्मण सीता को रथ में बिठाकर चल पड़े।
सीता प्रसन्न थीं — पति ने उनकी इच्छा रखी। रास्ते में उनकी दाहिनी आँख फड़की, और उन्हें किसी अनहोनी का आभास हुआ। उन्होंने मन-ही-मन प्रार्थना की कि राजा और देवर कुशल रहें।
गंगा आ गई। लक्ष्मण ने नाव पर उन्हें उस पार पहुँचाया। वहाँ, रेत पर, उन्होंने हाथ जोड़कर काँपते गले से राम की आज्ञा सुनाई।
सीता बेल की तरह धरती पर गिर पड़ीं। उनके गहने बिखर गए। धरती ने भी पहले उन्हें स्थान नहीं दिया, मानो पूछती हो कि इक्ष्वाकु-वंश का वह पति बिना कारण कैसे त्याग सकता है।
होश आने पर वह भीतर तक टूट गईं, पर उन्होंने पति को कोसा नहीं। उन्होंने बार-बार ख़ुद को दोष दिया — कि मैं ही अभागी हूँ, जो शाश्वत दुख के लिए बनी हूँ।
सीता का संदेश
लक्ष्मण ने उन्हें सहारा दिया, वाल्मीकि के आश्रम का रास्ता बताया, और पाँव पर गिरकर क्षमा माँगी — 'देवी, मैं पराधीन हूँ, मुझे आदेश का निष्ठुर पालन करना पड़ा।'
सीता ने उन्हें उठाया। 'सुमित्रा के बेटे, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। चिरंजीव रहो। तुम बड़े भाई के अधीन हो, जैसे विष्णु इंद्र के।' और फिर उन्होंने संदेश दिया:
'सब सासों को प्रणाम कहना, और उनसे कहना कि अपने बेटे के बीज के लिए, जो मेरे गर्भ में है, मंगल-कामना करें। और राजा से मेरी ओर से कहना: मेरी अग्नि-शुद्धि आपके सामने हुई थी, फिर भी आपने लोगों की बात पर मुझे छोड़ दिया। क्या यह आपकी विद्या या आपके वंश के योग्य है?
'या शायद आपकी निंदा करना ठीक नहीं — यह मेरे अपने पिछले जन्म के कर्म का फल है, जो वज्र बनकर गिरा। पहले आपने लक्ष्मी को ठुकराकर वन चुना था, अब वह आपके पास आ गई तो उसे मेरे साथ घर में रहना सह्य नहीं हुआ।
'मैं प्रसव के बाद सूर्य की ओर देखकर तप करूँगी, ताकि अगले जन्म में आप ही फिर मेरे पति हों, और वियोग न हो। और राजा का कर्तव्य है वर्णों और आश्रमों की रक्षा, मनु ने ऐसा कहा है। इसलिए आपके द्वारा त्यागी जाने पर भी मैं तपस्विनियों की तरह आपकी रक्षा की पात्र हूँ।'
लक्ष्मण 'ऐसा ही कहूँगा' कहकर नज़र से ओझल हो गए, और सीता फूट-फूटकर रो पड़ीं, जैसे डरी हुई मादा बाज़। मोरों ने नाचना छोड़ दिया, पेड़ों ने फूल गिरा दिए, हिरनियों के मुँह से घास गिर पड़ी। जंगल भी उनके साथ रोया।
उसी समय वाल्मीकि कुश लेने वन में निकले थे। ये वही ऋषि थे जिनके मुख से कभी क्रौंच पक्षी के वध का शोक पहले श्लोक के रूप में फूटा था। उन्होंने सीता को देखा। 'पुत्री, मैं ध्यान से जानता हूँ कि तुम्हारा पति तुम्हें झूठी निंदा से छोड़ गया है। शोक मत करो। मेरे आश्रम में आओ, जहाँ तपस्विनियाँ तुम्हारी देखभाल करेंगी। तुम्हारे पिता मेरे मित्र थे। तुम बिना भय के संतान को जन्म दो।'
सीता ने उनके पाँव छुए। उन्हें वाल्मीकि के आश्रम में एक कुटिया मिली, जहाँ इंगुदी तेल का दीया जलता था और मृग-छाला का बिस्तर था। वहाँ वह वल्कल पहनकर, पवित्र स्नान और अतिथि-सत्कार करके, पति के वंश के बीज को पालती रहीं।
उधर लक्ष्मण लौटे। राम को सब बताया। राम ऐसे फूट-फूटकर रोए जैसे पौष में ओस गिराने वाला चाँद। कालिदास कहते हैं: उन्होंने सीता को घर से निकाला था, हृदय से नहीं।
टिप्पणी: यह अध्याय सर्ग १४ (श्लोक १–८६) पर है। सीता के संदेश (श्लोक ६०–६७) का सार कालिदास का है; शब्द यहाँ भावार्थ में हैं। यह प्रसंग वाल्मीकि के उत्तरकांड का भी है; वहाँ सीता की प्रतिक्रिया और संदेश भिन्न रूप में आते हैं।
स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), सीता का त्याग