वनवास, लंका और पुष्पक — रघुवंश, चित्र

अध्याय ८

वनवास, लंका और पुष्पक

जिस राम की पूरी कथा कालिदास ने एक सौ चार श्लोकों में समेट दी — और फिर पुष्पक विमान पर उड़ते हुए हर जगह सीता को दिखाई वह राह, जो उन्होंने पैदल तय की थी

वनवास, लंका और पुष्पक — रघुवंश का अध्याय ८। स्रोत: रघुवंश, सर्ग १२ और १३ (कालिदास)। इसमें ५ दृश्य हैं — बुढ़ापे के सफ़ेद बाल; चित्रकूट से पंचवटी; शूर्पणखा से रावण तक; रावण का अंत; पुष्पक पर — और अंत में १० सवाल।

बुढ़ापे के सफ़ेद बाल

दशरथ ने सारे सुख भोग लिए थे, और अब वह उस दीये जैसे थे जिसका तेल बाती तक पहुँचकर भोर में बुझने को हो। कालिदास कहते हैं कि सफ़ेद बाल जैसे कान के पास आकर कैकेयी के डर से राजा से कहते थे, 'राम को राज दे दो।'

राम के राज्याभिषेक की ख़बर से नगर में सब ख़ुश हुए, जैसे बग़ीचे को नहर का पानी। पर कैकेयी ने राजा के आँसुओं के बीच तैयारियाँ रुकवा दीं। उसने वे दो वर माँगे जो राजा ने उसे कभी दिए थे। एक से राम चौदह बरस के लिए वन गए, दूसरे से भरत को राज — जो उसके अपने वैधव्य का कारण बना।

राम ने पहले पिता का दिया पृथ्वी का राज आँसू भरी आँखों से लिया था, और अब पिता का वन का आदेश प्रसन्न होकर लिया। लोगों ने देखा कि रेशम के जोड़े में और वल्कल के जोड़े में, दोनों में राम के चेहरे का रंग एक-सा था। सीता और लक्ष्मण के साथ वह वन में चले गए।

दशरथ को अपना पुराना शाप याद आया। उन्होंने देह छोड़ना ही प्रायश्चित समझा।

चित्रकूट से पंचवटी

भरत को ननिहाल से बुलाया गया। पिता की मृत्यु का समाचार पाकर वह माँ से ही नहीं, राज से भी विमुख हो गया। वह सेना लेकर राम को खोजने निकला — और राम के बैठे हुए पेड़ देखकर रोता गया, जिन्हें आश्रम-वासियों ने उसे दिखाया।

चित्रकूट में उसने राम से पिता का जाना कहा और राज लेने की प्रार्थना की। राम पिता का वचन तोड़ नहीं सकते थे। तब भरत ने उनसे उनकी खड़ाऊँ माँगी और उन्हें राज्य की देवता माना। वह नगर में नहीं गया, नंदिग्राम में रहकर राज धरोहर की तरह चलाता रहा।

राम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में रहे। एक दिन राम सीता की गोद में सिर रखकर सोए थे, तब इंद्र के बेटे — एक कौवे — ने सीता की छाती पर चोंच मारी। राम ने तिनके का अस्त्र चलाया, जिससे वह एक आँख गँवाकर भागा।

फिर वह दक्षिण की ओर चले। अगस्त्य ने सीता को लेप दिया, जिसकी सुगंध से भौंरे उन्हें छोड़कर वन की राह भूल गए।

शूर्पणखा से रावण तक

पंचवटी में रावण की बहन शूर्पणखा राम पर मोहित होकर आई। राम ने कहा, 'मेरी पत्नी है; मेरे छोटे भाई के पास जाओ।' लक्ष्मण ने भी मना कर दिया। वह फिर राम के पास गई, तब सीता हँस पड़ीं। शूर्पणखा क्रोध में असली राक्षसी रूप में आ गई, और लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए। वह खर और दूषण के पास पहुँची।

राम ने अकेले उस पूरी राक्षस-सेना को तीरों से नष्ट किया। शूर्पणखा ने ही रावण को ख़बर दी। रावण ने मारीच को स्वर्ण-मृग बनाकर भेजा, और राम-लक्ष्मण को दूर करके सीता को उठा ले गया। जटायु ने थोड़ी देर उसे रोका, और पंख कटने पर राम को पता देकर प्राण छोड़े। राम-लक्ष्मण ने उसका वैसे ही संस्कार किया जैसे पिता का।

कबंध के शाप से मुक्त होने के बाद उन्हें सुग्रीव का पता मिला। राम ने बाली को मारकर सुग्रीव को राज दिया। वानर चारों दिशाओं में सीता की खोज में गए। हनुमान ने सागर लाँघा, लंका में सीता को देखा — राक्षसियों से घिरी, जैसे विष-लताओं से घिरी संजीवनी बूटी। उन्होंने राम की अँगूठी उन्हें दी।

फिर युद्ध हुआ। मेघनाद के नागपाश ने राम-लक्ष्मण को बाँधा, गरुड़ आने पर छूटे। रावण की शक्ति से लक्ष्मण घायल हुए, हनुमान ने औषधि लाकर उन्हें जिलाया। कुंभकर्ण पर्वत की तरह गिरा।

रावण का अंत

फिर रावण स्वयं आया, और इंद्र ने मातलि के हाथ अपना रथ भेजा। राम पैदल थे, रावण रथ पर। राम उस रथ पर चढ़े, जिसकी पताका गंगा की लहरों की हवा से हिल रही थी।

रावण के दस सिर, बीस भुजाएँ। राम ने उसे ऐसे आदर से देखा जैसे योग्य शत्रु को देखा जाता है — जिसने लोकपालों को जीता, जिसने अपने ही सिर शिव को चढ़ाए, जिसने कैलास उठाया था। रावण ने राम की दाहिनी भुजा में तीर मारा, जो सीता के मिलन की बात फड़ककर पहले ही कह चुकी थी।

कई प्रहारों के बाद राम ने ब्रह्मास्त्र चलाया। वह तीर रावण की छाती में घुसा, धरती में उतर गया, जैसे नागों को प्रिय समाचार सुनाने गया हो। फिर बाण दस गुना हुआ और उसने रावण के दसों सिर काट दिए। देवताओं ने फूल बरसाए, पर उन्हें डर था कि कटे सिर फिर न जुड़ जाएँ।

मातलि लौट गया। राम ने सीता को अग्नि से शुद्ध पाया, विभीषण को राक्षसों का राज दिया, और पुष्पक विमान पर बैठकर सुग्रीव, लक्ष्मण और विभीषण के साथ अयोध्या की ओर चला।

पुष्पक पर

आकाश में उड़ते हुए राम ने सीता से कहा, 'देखो, वैदेही, यह सागर, जिसे मैंने मलय पर्वत तक पुल बाँधकर बाँटा था, मानो तारे और आकाशगंगा के साथ साफ़ शरद का आकाश हो। हमारे पुरखों ने इसे खोदा था, सगर के घोड़े को खोजते हुए।' और फिर वह हर चीज़ दिखाने लगा।

'सागर के सीप शंख, फुफकारते साँप, ये तटों की सुपारी की पंक्तियाँ। तुम्हारे गाल केतकी के पराग से सज गए हैं। वह देखो नीचे जनस्थान — जहाँ तपस्वी फिर से आश्रम बना रहे हैं। और यह वह जगह है जहाँ मुझे तुम्हारी वह पायल मिली थी जो विरह में चुप हो गई थी। इन लताओं ने मुझे तुम्हारे ले जाए जाने की राह झुक-झुककर दिखाई थी। हिरनियों ने दक्षिण की ओर नज़र करके मुझे बता दिया था।

'वह माल्यवान पर्वत है, जहाँ मैंने तुम्हारे बिना वर्षा काटी। और वह पंपा, जहाँ तुम्हें आलिंगन में लेने की इच्छा से मैंने अशोक की डाल थामी थी, और लक्ष्मण ने रोक दिया। वह पंचवटी, जहाँ तुम्हारी गोद में सिर रखकर मैं सोया था। और वह महर्षि अगस्त्य का आश्रम, जिन्होंने नहुष को स्वर्ग से गिराया था। वह अत्रि का तपोवन। वह चित्रकूट, जहाँ मैंने तमाल का फूल तुम्हारे कान में लगाया था।'

फिर गंगा-यमुना का संगम, सरयू — माँ की तरह, जो अपनी लहरों की शीतल हवा से गले लगाने आ रही है। और सामने भरत — वल्कल पहने, पैदल, हाथ में पूजा की सामग्री लिए, वसिष्ठ को आगे रखे हुए, बूढ़े मंत्रियों के साथ।

'वह देखो, भरत मुझे लेने आ रहा है।'

टिप्पणी: सर्ग १२ और १३ पर आधारित। सर्ग ११, १२ का सारा ओसीआर शोर-भरा है, इसलिए इस अध्याय के कुछ ब्योरे (कैकेयी के वर, कौवे का प्रसंग, शूर्पणखा) अपेक्षाकृत संक्षेप में हैं। रघुवंश की रामकथा वाल्मीकि से कहीं-कहीं भिन्न है (जैसे सीता का स्पष्ट अग्नि-परीक्षा श्लोक १०४), और जहाँ भिन्न है, वहाँ कालिदास का पाठ ही दिया गया है।

स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), वनवास, लंका और पुष्पक

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

रघुवंश में कैकेयी ने दो वरों से क्या माँगा?

  • राम को राजा बनाना और भरत को वनवास
  • दशरथ का राज-त्याग और राम को वन
  • राम को चौदह बरस का वनवास और भरत के लिए राज
  • लक्ष्मण को वनवास और भरत को राज
पूरी कथा पढ़िए — दो वर

कालिदास ने एक श्लोक में पूरी बात कह दी: एक से वन, दूसरे से राज।

वे कहते हैं कि इससे उसे केवल विधवा होना मिला।

यही सूत्र आगे भरत के नंदिग्राम में रहने का कारण बना।

क्या हुआ?

भरत ने राम से क्या लिया?

  • उनकी खड़ाऊँ, जिन्हें उन्होंने राज्य के देवता की तरह रखा
  • उनका धनुष
  • उनकी अँगूठी
  • उनका मुकुट
पूरी कथा पढ़िए — खड़ाऊँ

भरत ने कहा कि मेरे अकेले राज करने से ज़्यादा उचित है कि वह खड़ाऊँ आपकी तरफ़ से राज करें।

इसीलिए वह नगर में नहीं, नंदिग्राम में रहा।

उसने राज को एक धरोहर की तरह चलाया।

ऐसा क्यों?

हनुमान ने सीता को राम की अँगूठी क्यों दी?

  • राम ने उसे मदद के लिए भेजा था
  • हनुमान को रावण ने कहा था
  • अँगूठी युद्ध में लगती थी
  • राम का भेजा हुआ पहचान-चिह्न, ताकि सीता जानें कि वह सचमुच राम के दूत हैं
पूरी कथा पढ़िए — पहचान-चिह्न

रघुवंश में कहा गया है कि अँगूठी पति की ओर से पहचान की निशानी थी।

सीता के आँसुओं ने उसका स्वागत किया।

यह कालिदास की एक कोमल उपमा है।

कौन हूँ मैं?

मैं इंद्र का सारथी हूँ। राम को इंद्र का रथ देकर मैं उनके पास आया था। मैं कौन हूँ?

  • मारुति
  • मातलि
  • सुमंत्र
  • दारुक
पूरी कथा पढ़िए — स्वर्ग का रथ

रावण रथ पर था और राम पैदल।

इंद्र ने मातलि के हाथ अपना रथ भेजा।

उस पर राम ने रावण का अंत किया।

सही क्रम

घटनाओं को सही क्रम में रखें।

  • वनवास → भरत की खड़ाऊँ → सीता का हरण → रावण का अंत → पुष्पक पर वापसी
  • सीता का हरण → वनवास → भरत की खड़ाऊँ → रावण का अंत → पुष्पक पर वापसी
  • वनवास → रावण का अंत → सीता का हरण → भरत की खड़ाऊँ → पुष्पक पर वापसी
  • भरत की खड़ाऊँ → वनवास → पुष्पक पर वापसी → सीता का हरण → रावण का अंत
पूरी कथा पढ़िए — बारह से तेरह

सर्ग १२ में पूरी रामकथा लगभग एक सौ श्लोकों में है।

सर्ग १३ में लौटते समय की राह है।

इसीलिए सर्ग १३ को 'पुष्पक-यात्रा' का नाम दिया जाता है।

किसने कहा?

'देखो वैदेही, यह सागर जिसे मैंने पुल बाँधकर बाँटा' — यह वाक्य किसका है?

  • लक्ष्मण का, राम से
  • विभीषण का, सीता से
  • हनुमान का, सुग्रीव से
  • राम का, पुष्पक पर सीता से
पूरी कथा पढ़िए — आकाश से दिखता भारत

यह सर्ग १३ का आरंभ है।

सीता और राम पुष्पक पर बैठे थे, जो मन की इच्छा से चलता था।

कालिदास ने हर पड़ाव का एक-एक श्लोक या दो रखा।

तथ्य

पुष्पक विमान कहाँ से आया था, और राम ने उसे आख़िर में क्या किया?

  • इंद्र ने दिया था, और राम ने उसे रख लिया
  • रावण से जीता हुआ था, और अयोध्या पहुँचकर उसे कुबेर को लौटा दिया
  • विभीषण ने दिया था, और उसे वापस कर दिया
  • मय दानव ने बनाया था
पूरी कथा पढ़िए — कुबेर का विमान

पुष्पक मूल रूप से कुबेर का विमान माना जाता है, जिसे रावण ने छीना था।

रघुवंश के सर्ग १४ में राम उसे कुबेर के पास लौटा देते हैं।

यह वाल्मीकि की परंपरा से मेल खाता है।

व्याख्या

कालिदास ने रामकथा को एक सर्ग में समेटा और उसके तुरंत बाद एक पूरा सर्ग वापसी की राह को दिया। इसे हम कैसे पढ़ें? (यह हमारा पाठ है।)

  • कि कवि को युद्ध का वर्णन नहीं आता था
  • कि वाल्मीकि की कथा अधूरी थी
  • कि कवि के लिए कथा से बड़ी चीज़ वह भावना है जो हर जगह को राम और सीता की यादों से भर देती है
  • कि कवि ने शीघ्रता में लिखा
पूरी कथा पढ़िए — स्मृति की यात्रा

सर्ग १३ में राम सीता को हर स्थान उसके अपने अनुभव से जोड़कर दिखाते हैं।

यह भूगोल का वर्णन भी है और विरह की याद भी।

यह पाठ हमारा है, श्लोकों का सीधा कथन नहीं।

क्या हुआ?

भरत ने पुष्पक से उतरते राम का स्वागत कैसे किया?

  • हाथी पर चढ़कर, सेना के साथ
  • द्वार पर खड़े होकर, बिना बोले
  • रथ पर, मुकुट पहने
  • पैदल, वल्कल पहने, पूजा की सामग्री लिए आए और गले लगाया
पूरी कथा पढ़िए — भरत का वेश

भरत वल्कल पहने थे और मंत्रियों के साथ पैदल चले।

उसके साथ वसिष्ठ और बूढ़े मंत्री थे, और हाथ में अर्घ्य की सामग्री थी।

राम ने उसे पहचानकर देखा और बाँहों में भर लिया।

पहेली

मैं नदी हूँ। राम मुझे माँ-सी कहते हैं, क्योंकि मैं उन्हें अपनी लहरों की ठंडी हवा से गले लगाने आती हूँ। मैं कौन हूँ?

  • सरयू
  • गंगा
  • गोदावरी
  • मंदाकिनी
पूरी कथा पढ़िए — घर की नदी

सरयू अयोध्या की नदी है।

राम ने इसे उस दिन माँ की तरह देखा जिसने पुत्र का वियोग सहा हो।

आगे सर्ग १५ में अपने प्रस्थान के समय वे इसी में उतरेंगे।

वनवास, लंका और पुष्पक के बारे में सवाल

वनवास, लंका और पुष्पक (रघुवंश) में क्या होता है?

जिस राम की पूरी कथा कालिदास ने एक सौ चार श्लोकों में समेट दी — और फिर पुष्पक विमान पर उड़ते हुए हर जगह सीता को दिखाई वह राह, जो उन्होंने पैदल तय की थी। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: बुढ़ापे के सफ़ेद बाल; चित्रकूट से पंचवटी; शूर्पणखा से रावण तक; रावण का अंत; पुष्पक पर।

रघुवंश में वनवास, लंका और पुष्पक के बाद क्या आता है?

आगे सीता का त्याग: जिस राजा ने सीता को आग से शुद्ध पाया था, उसी ने एक दूत के मुँह से नगर की बात सुनकर उन्हें वन में भेज दिया — और सीता ने जाते हुए जो संदेश भेजा, उसमें एक शिकायत नहीं थी।

वनवास, लंका और पुष्पक का स्रोत क्या है?

रघुवंश, सर्ग १२ और १३ (कालिदास)।