अध्याय २

अठारह बरस की आहुति

अठारह साल तक हर दिन दस हज़ार आहुतियाँ देने वाले एक राजा से देवी सावित्री ने कहा — पुत्र नहीं, एक तेजस्वी पुत्री तुम्हें मिलेगी

अठारह साल का व्रत

संतान पाने की इच्छा से अश्वपति ने कठोर व्रत लिए — ब्रह्मचर्य का पालन, संयमित भोजन, इंद्रियों पर नियंत्रण। हर दिन वे अग्नि में दस हज़ार आहुतियाँ देते और देवी सावित्री का मंत्र जपते, और दिन के छठे घंटे के आसपास केवल एक बार संयमित भोजन करते। यह व्रत उन्होंने पूरे अठारह साल तक निभाया।

अठारह साल पूरे होने पर देवी सावित्री प्रसन्न हुईं। अग्निहोत्र की अग्नि से साक्षात रूप में प्रकट होकर उन्होंने राजा से कहा — "मैं तुम्हारे ब्रह्मचर्य, तुम्हारी पवित्रता, तुम्हारे संयम और तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। वर माँगो, अश्वपति — पर धर्म की उपेक्षा कभी मत करना।"

अश्वपति ने कहा — "यही धर्म पाने की इच्छा से मैंने यह व्रत किया है। हे देवी, मुझे मेरे कुल के योग्य अनेक पुत्र मिलें — ब्राह्मणों ने कहा है कि संतान में ही सबसे बड़ा पुण्य है।"

पुत्री, पुत्र नहीं

देवी सावित्री ने उत्तर दिया — "राजन्, मैं तुम्हारी यह इच्छा पहले ही ब्रह्मा जी को बता चुकी हूँ। उन्हीं की कृपा से शीघ्र ही तुम्हें एक तेजस्वी पुत्री मिलेगी। इस पर कोई प्रश्न मत करना — यह स्वयं ब्रह्मा की आज्ञा से मैं तुम्हें प्रसन्न होकर बता रही हूँ।"

अश्वपति ने "ऐसा ही हो" कहकर देवी की बात स्वीकार कर ली, और देवी अंतर्धान हो गईं। राजा अपने नगर लौट आए और धर्मपूर्वक राज्य चलाते रहे।

कुछ समय बाद उनकी पटरानी मालवी गर्भवती हुईं, और यथासमय एक कमल-जैसी आँखों वाली पुत्री का जन्म हुआ। यह वरदान देवी सावित्री की ही कृपा से मिला था, इसलिए राजा और ब्राह्मणों ने उस पुत्री का नाम सावित्री रखा।

जिसे कोई माँगने का साहस न कर सका

राजकुमारी सावित्री देवी श्री के समान तेजस्विनी होकर बड़ी हुई। जब वह युवावस्था को पहुँची, तो उसका रूप देखकर लोग कहते — "हमने मानो साक्षात देवी को देख लिया है।"

पर उसके तेज और सौंदर्य से अभिभूत होकर कोई भी राजकुमार उससे विवाह का साहस नहीं जुटा पाया।

एक पर्व के दिन, स्नान और उपवास के बाद, सावित्री ने कुलदेवता की पूजा करवाई और ब्राह्मणों से यज्ञाग्नि में आहुति दिलवाई। देवता को चढ़ाए फूल लेकर वह अपने पिता के पास गई, और उनके चरण छूकर वे फूल भेंट किए। पुत्री को युवावस्था में पहुँचा और फिर भी अविवाहित देखकर अश्वपति उदास हो उठे।

टिप्पणी: यह प्रसंग गांगुली के अनुवाद में स्पष्ट है — दस हज़ार आहुतियाँ प्रतिदिन, अठारह साल का व्रत, और पुत्र के बदले पुत्री का वरदान, यह सब मूल पाठ में ज्यों-का-त्यों है। राजा का प्रश्न न करना — देवी सावित्री ने स्पष्ट कहा कि यह ब्रह्मा की आज्ञा से हुआ है और इस पर सवाल नहीं उठाना — यह भी मूल पाठ की ही बात है। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: महाभारत, वनपर्व — पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, अठारह बरस की आहुति

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

संतान पाने के लिए अश्वपति ने क्या किया?

  • उन्होंने सौ यज्ञ करवाए
  • उन्होंने किसी ऋषि से आशीर्वाद माँगा
  • अठारह साल तक हर दिन दस हज़ार आहुतियाँ देकर देवी सावित्री का व्रत किया
  • उन्होंने अपना राज्य त्याग दिया
पूरी कथा पढ़िए — अठारह साल का व्रत

अश्वपति ने ब्रह्मचर्य और संयम के साथ कठोर व्रत लिया।

हर दिन दस हज़ार आहुतियाँ देकर देवी सावित्री का मंत्र जपते थे।

यह व्रत उन्होंने पूरे अठारह साल तक निभाया।

किसने कहा?

"मैं तुम्हारे ब्रह्मचर्य, तुम्हारी पवित्रता, तुम्हारे संयम और तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। वर माँगो।" — यह किसने कहा?

  • देवी सावित्री ने अश्वपति से
  • अग्नि देव ने अश्वपति से
  • ब्रह्मा जी ने अश्वपति से
  • नारद ने अश्वपति से
पूरी कथा पढ़िए — अठारह साल बाद प्रसन्नता

अठारह साल पूरे होने पर देवी सावित्री अग्नि से प्रकट हुईं।

उन्होंने राजा के व्रत से प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा।

पर धर्म की उपेक्षा न करने की चेतावनी भी दी।

क्या हुआ?

अश्वपति ने देवी से क्या माँगा?

  • अमर जीवन
  • एक विशाल राज्य
  • शत्रुओं पर विजय
  • अपने कुल के योग्य अनेक पुत्र
पूरी कथा पढ़िए — एक पिता की इच्छा

अश्वपति ने देवी सावित्री से कुल के योग्य पुत्रों का वर माँगा।

उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों के अनुसार संतान में ही सबसे बड़ा पुण्य है।

देवी ने इसका उत्तर आगे दिया।

किसने कहा?

"शीघ्र ही तुम्हें एक तेजस्वी पुत्री मिलेगी। इस पर कोई प्रश्न मत करना।" — यह किसने कहा?

  • अश्वपति ने देवी सावित्री से
  • देवी सावित्री ने अश्वपति से
  • नारद ने अश्वपति से
  • ब्रह्मा जी ने देवी सावित्री से
पूरी कथा पढ़िए — पुत्री, पुत्र नहीं

देवी सावित्री ने कहा कि यह इच्छा उन्होंने पहले ही ब्रह्मा जी को बता दी थी।

ब्रह्मा की ही कृपा से एक तेजस्वी पुत्री जन्म लेगी।

अश्वपति ने "ऐसा ही हो" कहकर स्वीकार कर लिया।

ऐसा क्यों?

राजकुमारी का नाम सावित्री क्यों रखा गया?

  • क्योंकि यह वरदान देवी सावित्री की आहुतियों की कृपा से मिला था
  • क्योंकि वह देवी सावित्री जैसी दिखती थी
  • क्योंकि वह सावन के महीने में जन्मी थी
  • क्योंकि उसकी माँ का नाम सावित्री था
पूरी कथा पढ़िए — एक नाम, एक कृपा

राजकुमारी का जन्म देवी सावित्री की आहुतियों की कृपा से हुआ था।

इसी कारण राजा और ब्राह्मणों ने उसका नाम सावित्री रखा।

वह कमल-जैसी आँखों वाली थी।

क्या हुआ?

युवावस्था में पहुँचकर सावित्री के साथ क्या हुआ?

  • उसका शीघ्र विवाह तय हो गया
  • वह राज्य छोड़कर चली गई
  • वह किसी आश्रम में तपस्या करने चली गई
  • उसके तेज और सौंदर्य से अभिभूत होकर कोई राजकुमार उससे विवाह का साहस नहीं जुटा पाया
पूरी कथा पढ़िए — जिसे माँगने का साहस न हुआ

सावित्री देवी श्री के समान तेजस्विनी होकर बड़ी हुई।

लोग उसे देखकर साक्षात देवी समझते।

पर उसके तेज से भयभीत होकर कोई विवाह का साहस नहीं जुटा पाया।

क्या हुआ?

एक पर्व के दिन सावित्री ने क्या किया?

  • उसने स्वयंवर की घोषणा करवाई
  • स्नान-उपवास के बाद कुलदेवता की पूजा करवाई, और फूल लेकर पिता के पास गई
  • उसने वन में जाकर तपस्या शुरू की
  • उसने अपने पिता से विवाह न करने की इच्छा जताई
पूरी कथा पढ़िए — एक पर्व का दिन

सावित्री ने स्नान-उपवास के बाद कुलदेवता की पूजा करवाई।

देवता को चढ़ाए फूल लेकर वह अपने पिता के पास गई।

पिता के चरण छूकर उसने वे फूल भेंट किए।

ऐसा क्यों?

पुत्री को देखकर अश्वपति उदास क्यों हुए?

  • क्योंकि वह बीमार दिख रही थी
  • क्योंकि उसने पिता से कुछ माँगा था
  • क्योंकि वह युवावस्था को पहुँच चुकी थी, फिर भी कोई उसे माँगने नहीं आया
  • क्योंकि वह विवाह से इनकार कर रही थी
पूरी कथा पढ़िए — एक पिता की चिंता

सावित्री युवावस्था को पहुँच चुकी थी।

फिर भी उसके तेज से भयभीत होकर कोई उसे माँगने नहीं आया।

यही देखकर अश्वपति उदास हो उठे।

तथ्य

सावित्री की माँ का नाम क्या था?

  • शैव्या
  • दमयंती
  • गांधारी
  • मालवी
पूरी कथा पढ़िए — माता और पुत्री

अश्वपति की पटरानी का नाम मालवी था।

उन्हीं से सावित्री का जन्म हुआ।

आगे की कथा में मालवी को भी सौ पुत्रों का वरदान मिलता है।

पहेली

मैं वह देवी हूँ जिसकी आहुतियाँ एक राजा ने अठारह साल तक दीं, और जिसकी कृपा से उसे एक पुत्री मिली — उसी पुत्री का नाम भी मेरे नाम पर रखा गया। मैं कौन हूँ?

  • देवी सावित्री
  • देवी लक्ष्मी
  • देवी सरस्वती
  • देवी दुर्गा
पूरी कथा पढ़िए — आहुति और नाम

अश्वपति ने अठारह साल तक देवी सावित्री की आहुतियाँ दीं।

प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक पुत्री का वरदान दिया।

उसी देवी के नाम पर राजकुमारी का नाम सावित्री रखा गया।