सावित्री-सत्यवान
सावित्री-सत्यवान — ८ अध्याय, ८० सवाल। महाभारत, वनपर्व — पतिव्रता-माहात्म्य पर्व।
यह कथा महाभारत के वनपर्व में आती है — पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, गांगुली के अनुवाद में खंड २९१ से २९७ तक। ऋषि मार्कंडेय इसे युधिष्ठिर को सुनाते हैं, जयद्रथ द्वारा द्रौपदी के अपहरण के प्रयास के बाद। यह कथा पूरे गांगुली अनुवाद को सीधे पढ़कर लिखी गई है, किसी सारांश या पुनर्कथन से नहीं। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।
- यह कथा किसलिए — द्रौपदी के अपहरण के प्रयास के बाद युधिष्ठिर सबसे ज़्यादा उसी के लिए चिंतित थे — मार्कंडेय ने एक ऐसी स्त्री की कथा सुनाई, जिसने स्वयं यम से अपने पति को वापस माँग लिया
- अठारह बरस की आहुति — अठारह साल तक हर दिन दस हज़ार आहुतियाँ देने वाले एक राजा से देवी सावित्री ने कहा — पुत्र नहीं, एक तेजस्वी पुत्री तुम्हें मिलेगी
- जिसे उसने चुना — एक राजकुमारी ख़ुद अपना पति चुनने वन-वन घूमी, और लौटकर बताया कि उसने एक अंधे, राज्यहीन राजा के पुत्र को चुना है — जिसकी आयु एक साल ही शेष है
- छाल के वस्त्र — एक राजकुमारी ने अपने सारे आभूषण उतारकर छाल के वस्त्र पहन लिए, और वन में तपस्वियों के बीच सेवा करने लगी — जानते हुए भी कि उसके पति की मृत्यु कब होनी है
- वह दिन — लकड़ी काटते-काटते सिर दर्द से बेहाल पति का सिर सावित्री ने अपनी गोद में रख लिया, और उसी क्षण साक्षात यम अपने फंदे के साथ प्रकट हो गए
- साथ चलने वाला मित्र — यम ने सावित्री को लौट जाने को कहा — उसने उत्तर दिया कि सात क़दम साथ चलने से ही मित्रता बन जाती है, और अपने तर्क से यम को दो वरदान देने पर मजबूर कर दिया
- चौथा वर — सावित्री ने यम के ही दिए वरदान का सहारा लेकर तर्क दिया — पुत्रों का वर सत्यवान के बिना अधूरा है — और इसी तर्क से अपने पति का जीवन माँग लिया
- लौटना — उसी रात द्युमत्सेन को उनकी दृष्टि वापस मिल गई, और अगली सुबह ख़बर आई कि उनका खोया राज्य भी वापस मिल चुका है — सावित्री का हर वरदान सच निकला