अध्याय ७

चौथा वर

सावित्री ने यम के ही दिए वरदान का सहारा लेकर तर्क दिया — पुत्रों का वर सत्यवान के बिना अधूरा है — और इसी तर्क से अपने पति का जीवन माँग लिया

तीसरा और चौथा वर

सावित्री ने कहा — "मेरे पिता के कोई पुत्र नहीं हैं। उन्हें सौ तेजस्वी पुत्र मिलें, ताकि उनका वंश आगे बढ़े — यही मेरा तीसरा वर है।" यम ने कहा — "तुम्हारे पिता को सौ श्रेष्ठ पुत्र मिलेंगे, जो उनके कुल को बढ़ाएँगे। अब तुम्हारी यह इच्छा भी पूरी हुई, राजकुमारी। लौट जाओ, तुम बहुत दूर आ चुकी हो।"

सावित्री रुकी नहीं — "अपने पति के साथ रहते हुए मुझे मार्ग की लंबाई का कोई भान नहीं होता। मेरा मन तो और भी आगे जाना चाहता है। सुनिए, फिर मैं कहती हूँ — आप विवस्वान के बलशाली पुत्र हैं, इसीलिए विद्वान आपको वैवस्वत कहते हैं। आप सब प्राणियों पर समान न्याय करते हैं, इसीलिए आपको धर्मराज कहा जाता है। मनुष्य स्वयं पर भी उतना भरोसा नहीं करता, जितना सत्पुरुषों पर करता है — इसीलिए सब सत्पुरुषों की निकटता चाहते हैं। हृदय की भलाई ही सबका विश्वास जीतती है।" यम ने कहा — "जो बातें तुमने कहीं, वे मैंने तुम्हारे सिवा किसी से नहीं सुनीं। तुम्हारी इस वाणी से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। सत्यवान के जीवन के सिवा, चौथा वर माँगो, और फिर अपने मार्ग जाओ।"

सावित्री ने कहा — "मुझे और सत्यवान को — हम दोनों से — सौ पुत्र मिलें, बलशाली और पराक्रमी, जो हमारे वंश को आगे बढ़ाएँ। यही मेरा चौथा वर है।" यम ने कहा — "तुम्हें बल और पराक्रम से युक्त सौ पुत्र मिलेंगे, जो तुम्हें अपार आनंद देंगे। अब और थकान मत उठाओ, लौट जाओ।"

चौथा वर, और एक तर्क

सावित्री रुकी नहीं — "सत्पुरुष सदा सनातन धर्म का पालन करते हैं। सत्पुरुषों का सत्पुरुषों के साथ संग कभी निष्फल नहीं जाता, न ही सत्पुरुषों से सत्पुरुषों को कोई भय होता है। सत्य के बल पर ही सूर्य गति करता है, तप के बल पर ही पृथ्वी टिकी है — भूत और भविष्य, दोनों सत्पुरुषों पर ही निर्भर हैं। इसीलिए सत्पुरुष कभी सत्पुरुषों के संग में उदास नहीं होते।" यम ने कहा — "तुम जितनी गहरी बातें कहती हो, उतना ही मेरा तुम्हारे प्रति आदर बढ़ता है। मुझसे कोई अनुपम वर माँगो।"

तब सावित्री ने कहा — "आपने मुझे जो वरदान दिए, वे मेरे पति के साथ के बिना पूरे नहीं हो सकते। इसलिए, अन्य वरों के साथ, मैं यह भी माँगती हूँ — मेरे पति सत्यवान को जीवन मिले! पति के बिना मैं मृत के समान हूँ। पति के बिना मुझे सुख नहीं चाहिए। पति के बिना मुझे स्वर्ग भी नहीं चाहिए। पति के बिना मुझे समृद्धि भी नहीं चाहिए। पति के बिना मैं जीने का मन ही नहीं बना सकती। आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान तो दिया, पर मेरे पति को ही ले जा रहे हैं! इसलिए मैं यह वर माँगती हूँ — 'सत्यवान को जीवन मिले' — ताकि आपकी बात सच हो सके।"

यह सुनकर विवस्वान के पुत्र, न्याय के देवता यम ने "ऐसा ही हो" कहकर अपना फंदा खोल दिया, और प्रसन्न हृदय से सावित्री से कहा — "हे पवित्र और सती स्त्री, मैंने तुम्हारे पति को मुक्त कर दिया। तुम इसे स्वस्थ लेकर लौट सकती हो। यह सफलता पाएगा, और तुम्हारे साथ चार सौ वर्षों तक जीवन बिताएगा। यह विधिपूर्वक यज्ञ करके इस लोक में बड़ी कीर्ति पाएगा। तुम्हारे गर्भ से इसे सौ पुत्र प्राप्त होंगे, जो सब राजा होंगे और तुम्हारे नाम से सदा प्रसिद्ध रहेंगे। तुम्हारे पिता को भी मालवी से सौ पुत्र मिलेंगे, जो मालव नाम से जाने जाएँगे।" यह वरदान देकर यम अपने लोक लौट गए।

जागा हुआ सत्यवान

यम के जाने के बाद सावित्री उस स्थान पर लौटी जहाँ उसके पति का राख-सा पड़ा शरीर था। पास जाकर उसने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया और स्वयं भूमि पर बैठ गई। तभी सत्यवान को होश आया। बार-बार प्रेम से सावित्री को निहारते हुए, मानो किसी परदेस से लौटा हो, उन्होंने कहा — "अरे, मैं बहुत देर तक सोया रह गया! तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं? और वह साँवला पुरुष जो मुझे खींचे ले जा रहा था, वह कहाँ है?"

सावित्री ने कहा — "तुम मेरी गोद में बहुत देर सोए रहे। वह पूज्य यम अपने लोक लौट चुके हैं। अब तुम स्वस्थ हो, नींद तुम्हें छोड़ चुकी है — यदि उठ सको, तो उठो, देखो, रात गहरी हो चुकी है।"

टिप्पणी: यह प्रसंग गांगुली के अनुवाद में स्पष्ट है — सावित्री को कुल पाँच वरदान मिलते हैं, जिन्हें वह स्वयं आगे अध्याय ८ में गिनाती है: श्वसुर की दृष्टि और बल, श्वसुर का राज्य, पिता के लिए सौ पुत्र, स्वयं के लिए सौ पुत्र, और सत्यवान का जीवन (चार सौ वर्षों की आयु सहित)। सत्यवान का जीवन पाँचवाँ वरदान गिना जाता है, यह मूल पाठ में स्पष्ट है। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: महाभारत, वनपर्व — पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, चौथा वर

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

सावित्री का तीसरा वर क्या था?

  • सत्यवान का जीवन
  • स्वयं सावित्री और सत्यवान को सौ पुत्र मिलें
  • उसके पिता अश्वपति को सौ पुत्र मिलें
  • द्युमत्सेन की दृष्टि वापस मिले
पूरी कथा पढ़िए — तीसरा वर — पिता के लिए पुत्र

सावित्री ने कहा कि उसके पिता अश्वपति के कोई पुत्र नहीं हैं।

उसने उनके लिए सौ तेजस्वी पुत्रों का वर माँगा।

यम ने यह वर भी स्वीकार कर लिया।

किसने कहा?

"आप विवस्वान के बलशाली पुत्र हैं, इसीलिए विद्वान आपको वैवस्वत कहते हैं। आप सब प्राणियों पर समान न्याय करते हैं, इसीलिए आपको धर्मराज कहा जाता है।" — यह किसने कहा?

  • सावित्री ने यम से
  • यम ने सावित्री से
  • नारद ने यम से
  • द्युमत्सेन ने यम से
पूरी कथा पढ़िए — यम की प्रशंसा

सावित्री ने यम के नामों और उनके अर्थ पर बात की।

यम प्रसन्न हुए और चौथा वर माँगने को कहा।

सावित्री ने स्वयं और सत्यवान के लिए सौ पुत्र माँगे।

तथ्य

सावित्री का चौथा वर क्या था?

  • सत्यवान की आयु चार सौ वर्ष हो
  • अश्वपति को सौ पुत्र मिलें
  • द्युमत्सेन का राज्य वापस मिले
  • स्वयं सावित्री और सत्यवान को
पूरी कथा पढ़िए — चौथा वर — अपने लिए पुत्र

सावित्री ने स्वयं और सत्यवान के लिए सौ पुत्रों का वर माँगा।

उसने कहा कि ये पुत्र बलशाली और पराक्रमी हों, वंश को आगे बढ़ाने वाले।

यम ने यह वर भी दे दिया, फिर उसे लौट जाने को कहा।

क्या हुआ?

चौथे वर के बाद सावित्री ने यम के सामने क्या तर्क रखा?

  • कि यम ने उसे धोखा दिया है
  • कि दिए गए वरदान
  • कि उसने अभी तक कोई वर नहीं माँगा
  • कि उसके श्वसुर अब भी अंधे हैं
पूरी कथा पढ़िए — एक तर्क, एक माँग

सावित्री ने कहा कि सत्यवान के बिना दिए गए वरदान पूरे नहीं हो सकते।

उसने साफ़ माँगा — "सत्यवान को जीवन मिले।"

यम ने प्रसन्न होकर "ऐसा ही हो" कहा और सत्यवान को मुक्त कर दिया।

किसने कहा?

"पति के बिना मुझे सुख नहीं चाहिए। पति के बिना मुझे स्वर्ग भी नहीं चाहिए। पति के बिना मैं जीने का मन ही नहीं बना सकती।" — यह किसने कहा?

  • सावित्री ने यम से
  • शैव्या ने द्युमत्सेन से
  • सावित्री ने सत्यवान से
  • मालवी ने अश्वपति से
पूरी कथा पढ़िए — अंतिम, सबसे गहरी माँग

सावित्री ने अपने चारों वरों को याद दिलाया।

फिर कहा कि इन सबके बिना, पति के बिना, वह जीना नहीं चाहती।

यही उसकी सबसे गहरी और अंतिम माँग थी।

क्या हुआ?

सावित्री की अंतिम माँग पर यम ने क्या किया?

  • उन्होंने माँग ठुकरा दी
  • उन्होंने सावित्री को दंड दिया
  • उन्होंने सत्यवान को आधा जीवन ही लौटाया
  • "ऐसा ही हो" कहकर फंदा खोल दिया, और सत्यवान को स्वस्थ जीवन तथा चार सौ वर्षों की आयु का वरदान दिया
पूरी कथा पढ़िए — फंदा खुलता है

सावित्री के तर्क और अंतिम माँग को सुनकर यम प्रसन्न हुए।

उन्होंने सत्यवान को मुक्त कर दिया, स्वस्थ और सफलता से युक्त।

साथ ही चार सौ वर्षों के जीवन का वरदान भी दिया।

क्या हुआ?

यम के जाने के बाद सावित्री ने क्या किया?

  • वह तुरंत आश्रम की ओर दौड़ पड़ी
  • वह अपने पति के शरीर के पास लौटी, उसका सिर अपनी गोद में रखा और भूमि पर बैठ गई
  • उसने वहीं एक यज्ञ किया
  • वह बेहोश हो गई
पूरी कथा पढ़िए — पति के पास लौटना

यम अपने वरदान देकर अपने लोक लौट गए।

सावित्री उस स्थान पर लौटी जहाँ सत्यवान का शरीर पड़ा था।

उसका सिर अपनी गोद में रखकर वह भूमि पर बैठ गई।

किसने कहा?

"अरे, मैं बहुत देर तक सोया रह गया! तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं? और वह साँवला पुरुष जो मुझे खींचे ले जा रहा था, वह कहाँ है?" — यह किसने कहा?

  • यम ने सत्यवान से
  • सावित्री ने सत्यवान से
  • सत्यवान ने होश में आकर सावित्री से
  • द्युमत्सेन ने सत्यवान से
पूरी कथा पढ़िए — नींद से जागना

यम के जाने के कुछ समय बाद सत्यवान को होश आया।

उन्हें कुछ भी याद नहीं था, सिवाय उस साँवले पुरुष की छवि के।

सावित्री ने शांति से कहा कि वह पूज्य यम अपने लोक लौट चुके हैं।

तथ्य

यम ने सत्यवान को कितने वर्षों के जीवन का वरदान दिया?

  • सौ वर्ष
  • दो सौ वर्ष
  • अनंत जीवन
  • चार सौ वर्ष
पूरी कथा पढ़िए — जीवन की अवधि

यम ने सत्यवान को केवल जीवन ही नहीं, एक लंबी आयु भी दी।

उन्होंने कहा कि सत्यवान सावित्री के साथ चार सौ वर्षों तक जीवन बिताएगा।

साथ ही यज्ञों से कीर्ति पाने का वरदान भी दिया।

पहेली

मैं वह फंदा हूँ जिसे यम ने "ऐसा ही हो" कहकर खोल दिया, जब सावित्री ने सत्यवान का जीवन माँगा और अपने सौ पुत्रों वाले वर का तर्क सामने रखा। मैं क्या हूँ?

  • यम का फंदा, जिसमें सत्यवान की जीवन-सत्ता बँधी थी
  • सावित्री का व्रत
  • द्युमत्सेन की आँखों की पट्टी
  • विवाह की गाँठ
पूरी कथा पढ़िए — एक तर्क, एक खुलता फंदा

यम ने सावित्री को चार वरदान दे दिए थे, सत्यवान के जीवन को छोड़कर।

सावित्री ने दिखाया कि ये वरदान सत्यवान के बिना अधूरे हैं।

यम को अपना ही वचन निभाने के लिए फंदा खोलना पड़ा।