अध्याय ४

छाल के वस्त्र

एक राजकुमारी ने अपने सारे आभूषण उतारकर छाल के वस्त्र पहन लिए, और वन में तपस्वियों के बीच सेवा करने लगी — जानते हुए भी कि उसके पति की मृत्यु कब होनी है

वन में एक विवाह

अश्वपति ने बूढ़े ब्राह्मणों और पुरोहितों को बुलाकर एक शुभ दिन अपनी पुत्री के साथ द्युमत्सेन के आश्रम की ओर प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अंधे राजा द्युमत्सेन को एक शाल वृक्ष के नीचे कुशासन पर बैठा पाया। विधिपूर्वक अर्घ्य, आसन और गाय भेंट करने के बाद द्युमत्सेन ने पूछा — "आपके आगमन का क्या कारण है?"

अश्वपति ने अपनी इच्छा बताई — "यह मेरी पुत्री सावित्री है। हे धर्मज्ञ, अपनी परंपरा के अनुसार इसे अपनी पुत्रवधू के रूप में स्वीकार कीजिए।" द्युमत्सेन ने कहा — "राज्य खोकर हम वन में तपस्वी जीवन बिता रहे हैं। आपकी पुत्री, जो राजमहल में पली है, इस वन के कष्ट कैसे सहेगी?" अश्वपति ने उत्तर दिया — "मेरी पुत्री जानती है कि सुख और दुःख आते-जाते रहते हैं — ऐसे शब्द मेरे जैसे व्यक्ति के लिए उचित नहीं। मैं मित्रता से आपके चरणों में झुका हूँ, मेरी आशा को व्यर्थ मत कीजिए। आप मेरे समान ही योग्य हैं, जैसे मैं आपके योग्य हूँ।" द्युमत्सेन ने कहा — "मैं पहले भी यही चाहता था, पर राज्य खोने के बाद संकोच में था। आज वह इच्छा पूरी हो, आप मेरे स्वागत योग्य अतिथि हैं।"

वन में रहने वाले सभी ब्राह्मणों को बुलाकर विधिपूर्वक विवाह संपन्न हुआ। पुत्री को वस्त्र-आभूषण देकर अश्वपति प्रसन्न मन से अपने नगर लौट गए। पिता के जाते ही सावित्री ने अपने सारे आभूषण उतार दिए, और छाल तथा लाल रंग के वस्त्र पहन लिए।

सेवा और स्मरण

सावित्री ने अपनी सेवा, गुणों, कोमलता और आत्म-त्याग से सबको प्रसन्न कर दिया। सास की सेवा वस्त्र-आभूषण से करती, श्वसुर को देवता समान पूजती और वाणी पर संयम रखती। पति को मीठे वचनों, हर काम में कुशलता, स्वभाव की समता, और एकांत में प्रेम के संकेतों से प्रसन्न रखती। इस तरह उस तपोवन में रहते हुए वे सब कठोर तप का जीवन बिताने लगे। पर नारद के कहे शब्द दिन-रात दुःखी सावित्री के मन में बने रहते।

तीन रातों का व्रत

बहुत समय बीतने पर सत्यवान की मृत्यु के लिए निश्चित समय पास आ गया। नारद के शब्द सावित्री के मन में सदा जागते रहते थे, इसलिए उसने दिनों को गिनना शुरू कर दिया था। यह जानकर कि उसके पति की मृत्यु चौथे दिन होगी, उसने त्रिरात्र व्रत रखा — दिन-रात उपवास।

व्रत की बात सुनकर द्युमत्सेन अत्यंत दुःखी हुए। उन्होंने सावित्री को सांत्वना देते हुए कहा — "पुत्री, तुमने जो व्रत लिया है, वह बहुत कठिन है — तीन रातों तक लगातार उपवास रखना अत्यंत दुष्कर है।" सावित्री ने कहा — "पिताजी, चिंता मत कीजिए। मैं इसे निभा सकूँगी। मैंने यह कार्य दृढ़ संकल्प से लिया है, और संकल्प ही व्रत की सफलता का कारण होता है।" यह सुनकर द्युमत्सेन ने कहा — "मैं तुमसे व्रत तोड़ने को नहीं कह सकता। मेरे जैसे को तो कहना चाहिए — अपना व्रत पूरा करो।"

व्रत रखते-रखते सावित्री काठ की गुड़िया-सी दुबली हो गई। जानते हुए कि उसका पति अगले दिन मरने वाला है, उसने वह रात अत्यंत पीड़ा में बिताई।

टिप्पणी: यह प्रसंग गांगुली के अनुवाद में स्पष्ट है — द्युमत्सेन और अश्वपति की बातचीत, विवाह, सावित्री का आभूषण-त्याग, और त्रिरात्र व्रत, सब मूल पाठ में ज्यों-का-त्यों है। सावित्री ने दिनों की गिनती करके स्वयं जाना कि मृत्यु चौथे दिन होगी — यह भी मूल पाठ की ही बात है। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: महाभारत, वनपर्व — पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, छाल के वस्त्र

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

द्युमत्सेन के आश्रम पहुँचकर अश्वपति ने अंधे राजा को कहाँ बैठा पाया?

  • एक महल में
  • नदी किनारे
  • एक शाल वृक्ष के नीचे कुशासन पर
  • किसी गुफा में
पूरी कथा पढ़िए — वन में एक भेंट

अश्वपति ब्राह्मणों और पुरोहितों के साथ द्युमत्सेन के आश्रम पहुँचे।

वहाँ उन्होंने अंधे राजा को एक शाल वृक्ष के नीचे कुशासन पर बैठा पाया।

विधिपूर्वक स्वागत के बाद उन्होंने अपनी इच्छा बताई।

किसने कहा?

"राज्य खोकर हम वन में तपस्वी जीवन बिता रहे हैं। आपकी पुत्री यह कष्ट कैसे सहेगी?" — यह किसने कहा?

  • द्युमत्सेन ने अश्वपति से
  • अश्वपति ने द्युमत्सेन से
  • सत्यवान ने सावित्री से
  • शैव्या ने अश्वपति से
पूरी कथा पढ़िए — एक संकोच

द्युमत्सेन ने वन के कष्टों का हवाला देकर संकोच जताया।

अश्वपति ने कहा कि सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं, यह बात उन जैसे को शोभा नहीं देती।

द्युमत्सेन ने अपनी पुरानी इच्छा याद करते हुए विवाह स्वीकार कर लिया।

क्या हुआ?

विवाह के बाद, पिता के जाते ही सावित्री ने क्या किया?

  • उसने द्युमत्सेन को अपना राज्य वापस दिलाने की योजना बनाई
  • वह अपने पिता के साथ ही लौट गई
  • उसने तुरंत व्रत रखना शुरू कर दिया
  • अपने सारे आभूषण उतार दिए, और छाल तथा लाल वस्त्र पहन लिए
पूरी कथा पढ़िए — राजसी वस्त्रों का त्याग

विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ, और अश्वपति प्रसन्न मन से लौट गए।

पिता के जाते ही सावित्री ने अपने सारे आभूषण उतार दिए।

उसने छाल और लाल रंग के वस्त्र पहन लिए, वन-जीवन के अनुरूप।

ऐसा क्यों?

सावित्री दिन-रात दुःखी क्यों रहती थी, भले ही वह सबकी सेवा करती और सबको प्रसन्न रखती?

  • क्योंकि वन-जीवन बहुत कठिन था
  • क्योंकि नारद के कहे शब्द
  • क्योंकि सास-श्वसुर उससे नाराज़ रहते थे
  • क्योंकि उसे अपने पिता की याद आती थी
पूरी कथा पढ़िए — एक छिपा दुःख

सावित्री अपनी सेवा और गुणों से सबको प्रसन्न रखती थी।

पर भीतर ही भीतर नारद के कहे शब्द उसे दिन-रात कचोटते रहते।

यही दुःख आगे उसे दिनों की गिनती करने पर मजबूर करता है।

क्या हुआ?

सावित्री ने सत्यवान की मृत्यु के समय को जानकर क्या किया?

  • यह जानकर कि चौथे दिन मृत्यु होगी, उसने त्रिरात्र व्रत
  • उसने द्युमत्सेन को सारी बात बता दी
  • उसने सत्यवान को वन जाने से रोक दिया
  • उसने कोई विशेष यज्ञ करवाया
पूरी कथा पढ़िए — तीन रातों का व्रत

नारद के शब्दों को याद कर सावित्री दिनों की गिनती करती रही।

जब उसे पता चला कि मृत्यु चौथे दिन होगी, उसने त्रिरात्र व्रत रखा।

यह व्रत तीन रातों तक लगातार उपवास का था।

किसने कहा?

"पुत्री, तुमने जो व्रत लिया है, वह बहुत कठिन है — तीन रातों तक लगातार उपवास रखना अत्यंत दुष्कर है।" — यह किसने कहा?

  • सत्यवान ने सावित्री से
  • नारद ने सावित्री से
  • अश्वपति ने सावित्री से
  • द्युमत्सेन ने सावित्री से
पूरी कथा पढ़िए — एक पिता की चिंता

द्युमत्सेन ने व्रत की बात सुनकर गहरी चिंता जताई।

सावित्री ने कहा कि दृढ़ संकल्प से वह इसे निभा सकेगी।

द्युमत्सेन ने आख़िर उसे व्रत पूरा करने का ही आशीर्वाद दिया।

क्या हुआ?

व्रत के दौरान सावित्री की अवस्था कैसी हो गई?

  • वह और अधिक तेजस्वी दिखने लगी
  • वह काठ की गुड़िया-सी दुबली हो गई
  • उसे बुख़ार हो गया
  • वह बेहोश हो गई
पूरी कथा पढ़िए — उपवास का असर

सावित्री ने तीन रातों तक लगातार उपवास रखा।

इससे वह काठ की गुड़िया-सी दुबली हो गई।

जानते हुए कि अगला दिन ही वह दिन है, उसने वह रात पीड़ा में बिताई।

ऐसा क्यों?

द्युमत्सेन ने सावित्री को विवाह के लिए स्वीकार करने में पहले संकोच क्यों किया था?

  • क्योंकि सावित्री का रूप उन्हें पसंद नहीं आया
  • क्योंकि नारद ने विवाह से मना किया था
  • क्योंकि राज्य खोने के बाद उन्हें लगा कि वे इस विवाह के योग्य नहीं रहे
  • क्योंकि सत्यवान अभी तैयार नहीं था
पूरी कथा पढ़िए — राज्य खोने का संकोच

द्युमत्सेन पहले भी अश्वपति से इस रिश्ते की इच्छा रखते थे।

पर राज्य खोने के बाद संकोच में वे आगे नहीं बढ़े थे।

अश्वपति के स्वयं आने पर उन्होंने खुशी-खुशी विवाह स्वीकार किया।

तथ्य

सावित्री ने अपने सास-श्वसुर की सेवा कैसे की — याद कीजिए?

  • उसने उनके लिए एक नया आश्रम बनवाया
  • उसने उन्हें राज्य वापस दिलाने का वचन दिया
  • उसने उन्हें नगर लौटने के लिए मनाया
  • सास को वस्त्र-आभूषण देकर प्रसन्न रखा, श्वसुर को देवता समान पूजा, और वाणी पर संयम रखा
पूरी कथा पढ़िए — सेवा से जीता मन

सावित्री ने अपनी सेवा, गुणों और आत्म-त्याग से सबको प्रसन्न किया।

सास को वस्त्र-आभूषण से, श्वसुर को देवता समान सेवा से प्रसन्न रखा।

पति को मीठे वचनों और कुशलता से प्रसन्न रखा।

पहेली

मैं वह व्रत हूँ जो एक रानी ने तीन रातों तक लगातार उपवास करके निभाया, यह जानते हुए कि चौथे दिन उसके पति की मृत्यु होगी। मैं क्या हूँ?

  • त्रिरात्र व्रत
  • एकादशी व्रत
  • करवा चौथ
  • नवरात्रि व्रत
पूरी कथा पढ़िए — चौथे दिन से पहले

नारद के शब्दों को गिनते हुए सावित्री ने चौथा दिन जान लिया था।

उसने त्रिरात्र व्रत रखा — तीन रातों का लगातार उपवास।

अगली सुबह वही दिन था जिसकी उसे प्रतीक्षा थी।