अध्याय ३

जिसे उसने चुना

एक राजकुमारी ख़ुद अपना पति चुनने वन-वन घूमी, और लौटकर बताया कि उसने एक अंधे, राज्यहीन राजा के पुत्र को चुना है — जिसकी आयु एक साल ही शेष है

सोने के रथ पर

अश्वपति ने सावित्री से कहा — "पुत्री, तुम्हें ब्याहने का समय आ गया है, पर कोई तुम्हें माँगने नहीं आता। इसलिए तुम स्वयं अपने योग्य पति ढूँढो। जिसे तुम चाहो, मुझे बता देना — मैं विचारपूर्वक तुम्हारा विवाह करूँगा। सुनो, विद्वानों से मैंने यह भी सुना है — जो पिता पुत्री का विवाह नहीं करता, जो पति ऋतुकाल में पत्नी के पास नहीं जाता, और जो पुत्र पिता की मृत्यु के बाद माँ की रक्षा नहीं करता, वे सब निंदा के भागी होते हैं। इसलिए तुम स्वयं पति ढूँढो, ताकि हम देवताओं की निंदा के पात्र न बनें।"

पिता के वचन मानकर सावित्री सोने के रथ पर बैठी, और वृद्ध मंत्रियों के साथ तीर्थों और आश्रमों में घूमने निकल पड़ी।

जो उसने चुना

कुछ समय बाद, जब अश्वपति सभा में नारद के साथ बैठे थे, सावित्री लौट आई। पिता और नारद दोनों के चरण छूकर उसने प्रणाम किया। नारद ने पूछा — "यह कहाँ गई थी, और अब कहाँ से लौटी है? और आप इसका विवाह क्यों नहीं करते, जबकि यह युवावस्था को पहुँच चुकी है?" अश्वपति ने कहा — "यह इसी काम से गई थी, और अभी लौटी है। इससे ही सुनिए, इसने किसे चुना है।"

पिता की आज्ञा से सावित्री ने बताया — "शाल्व देश में द्युमत्सेन नामक एक धर्मात्मा क्षत्रिय राजा थे। समय के साथ वे अंधे हो गए। उनके एक ही पुत्र था। एक पुराने शत्रु ने राजा की इस विपत्ति का लाभ उठाकर उनका राज्य छीन लिया। तब राजा अपनी पत्नी और गोद के बच्चे के साथ वन में चले गए, और वहीं कठोर तप करने लगे। वही पुत्र, नगर में जन्मा, आश्रम में बड़ा हुआ — मैंने अपने हृदय में उसी युवक को अपना पति चुन लिया है।"

नारद की भविष्यवाणी

यह सुनकर नारद बोल उठे — "हाय, राजन्, सावित्री ने बिना जाने एक बड़ी भूल कर दी है! इस युवक का नाम सत्यवान है — उसके पिता सत्यवादी हैं, उसकी माँ भी सत्यवादी है, इसीलिए ब्राह्मणों ने उसका नाम सत्यवान रखा। बचपन में उसे घोड़ों से बहुत लगाव था, वह मिट्टी के घोड़े बनाता और घोड़ों के चित्र बनाता — इसीलिए उसे चित्राश्व भी कहा जाता है।"

अश्वपति ने पूछा — "क्या सत्यवान तेजस्वी, बुद्धिमान, क्षमाशील और साहसी है?" नारद ने कहा — "तेज में सूर्य समान, बुद्धि में बृहस्पति समान, साहस में इंद्र समान, क्षमा में पृथ्वी समान। दान में रंतिदेव समान, सत्य में शिबि समान, उदारता में ययाति समान, और सौंदर्य में चंद्रमा और अश्विनी कुमारों समान।" अश्वपति ने फिर पूछा — "तो उसमें कोई दोष है क्या?" नारद ने कहा — "एक ही दोष है, जो उसके सारे गुणों को ढक देता है — आज से ठीक एक वर्ष के भीतर, सत्यवान अपना शरीर त्याग देगा।"

यह सुनकर अश्वपति ने कहा — "सावित्री, जाओ और कोई और वर चुन लो — यह एक दोष उसके सारे गुणों को ढक देता है।" सावित्री ने उत्तर दिया — "मृत्यु एक बार ही आती है; कन्यादान भी एक ही बार होता है; और 'मैं देता हूँ' यह वचन भी एक ही बार कहा जाता है — ये तीनों बातें एक ही बार होती हैं। आयु छोटी हो या बड़ी, गुणी हो या निर्गुण, मैंने एक बार अपना पति चुन लिया है। मैं दुबारा नहीं चुनूँगी।" नारद ने कहा — "राजन्, सावित्री का हृदय डिगने वाला नहीं है। सत्यवान में जो गुण हैं, वे किसी और में नहीं। मैं इस विवाह को अपनी स्वीकृति देता हूँ।" अश्वपति ने कहा — "जो आपने कहा, वही होगा, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं।" नारद आकाश में उठकर स्वर्ग लौट गए, और राजा विवाह की तैयारी में जुट गए।

टिप्पणी: यह प्रसंग गांगुली के अनुवाद में विस्तार से है — नारद द्वारा सत्यवान के गुणों की तुलना सूर्य, बृहस्पति, इंद्र, पृथ्वी, रंतिदेव, शिबि, ययाति और अश्विनी कुमारों से की गई है, यह मूल पाठ में ज्यों-का-त्यों है। सावित्री का प्रसिद्ध वाक्य — "मृत्यु एक बार ही आती है; कन्यादान भी एक ही बार होता है" — भी मूल पाठ का ही है। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: महाभारत, वनपर्व — पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, जिसे उसने चुना

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

अश्वपति ने सावित्री से क्या कहा?

  • कि वह किसी और राज्य में शरण ले
  • कि वह विवाह न करे
  • कि वह स्वयं अपने योग्य पति ढूँढे
  • कि वह किसी ऋषि से विवाह करे
पूरी कथा पढ़िए — स्वयं पति चुनने का आदेश

सावित्री युवावस्था को पहुँच चुकी थी, पर कोई उसे माँगने नहीं आता था।

अश्वपति ने उससे स्वयं अपने योग्य पति ढूँढने को कहा।

सावित्री सोने के रथ पर बैठकर तीर्थों और आश्रमों में निकल पड़ी।

किसने कहा?

"यह कहाँ गई थी, और अब कहाँ से लौटी है? और आप इसका विवाह क्यों नहीं करते?" — यह किसने कहा?

  • नारद ने अश्वपति से
  • अश्वपति ने सावित्री से
  • द्युमत्सेन ने अश्वपति से
  • सत्यवान ने सावित्री से
पूरी कथा पढ़िए — सभा में एक प्रश्न

सावित्री जब लौटी, तब अश्वपति सभा में नारद के साथ बैठे थे।

नारद ने पूछा कि वह कहाँ गई थी और उसका विवाह अब तक क्यों नहीं हुआ।

अश्वपति ने सावित्री को ही अपनी कथा सुनाने को कहा।

क्या हुआ?

सावित्री ने किसे अपना पति चुना?

  • शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन को
  • नारद के किसी शिष्य को
  • किसी ब्राह्मण को
  • अंधे और राज्यहीन राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को
पूरी कथा पढ़िए — वन में पला युवक

सावित्री ने बताया कि शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन अंधे हो गए थे।

एक पुराने शत्रु ने उनका राज्य छीन लिया, और वे वन में चले गए।

उन्हीं के पुत्र सत्यवान को सावित्री ने अपने हृदय से चुन लिया था।

किसने कहा?

"तेज में सूर्य समान, बुद्धि में बृहस्पति समान, साहस में इंद्र समान, क्षमा में पृथ्वी समान।" — यह किसने कहा?

  • अश्वपति ने सावित्री से
  • नारद ने अश्वपति से
  • सावित्री ने नारद से
  • द्युमत्सेन ने नारद से
पूरी कथा पढ़िए — सत्यवान के गुण

अश्वपति ने नारद से सत्यवान के गुणों के बारे में पूछा।

नारद ने उसकी तुलना सूर्य, बृहस्पति, इंद्र, पृथ्वी, रंतिदेव, शिबि, ययाति और चंद्रमा से की।

फिर अश्वपति ने पूछा कि क्या उसमें कोई दोष भी है।

तथ्य

नारद ने सत्यवान का कौन-सा दोष बताया?

  • आज से एक वर्ष के भीतर उसकी मृत्यु हो जाएगी
  • वह क्रोधी स्वभाव का है
  • वह जुए का शौक़ीन है
  • वह अंधा हो जाएगा
पूरी कथा पढ़िए — एक ही दोष

अश्वपति ने पूछा कि सत्यवान में कोई दोष है या नहीं।

नारद ने कहा कि एक ही दोष है, जो उसके सारे गुणों को ढक देता है।

आज से ठीक एक वर्ष के भीतर सत्यवान अपना शरीर त्याग देगा।

किसने कहा?

"मृत्यु एक बार ही आती है; कन्यादान भी एक ही बार होता है। मैंने एक बार अपना पति चुन लिया है। मैं दुबारा नहीं चुनूँगी।" — यह किसने कहा?

  • नारद ने अश्वपति से
  • अश्वपति ने सावित्री से
  • द्युमत्सेन ने सावित्री से
  • सावित्री ने अपने पिता से
पूरी कथा पढ़िए — एक अटल निश्चय

अश्वपति ने सावित्री से कोई और वर चुनने को कहा।

सावित्री ने उत्तर दिया कि मृत्यु और कन्यादान, दोनों एक ही बार होते हैं।

उसने साफ़ कहा कि वह दुबारा नहीं चुनेगी।

क्या हुआ?

सावित्री के निश्चय पर नारद की क्या प्रतिक्रिया थी?

  • उन्होंने सावित्री को डाँटा
  • उन्होंने कहा कि सावित्री का हृदय डिगने वाला नहीं है, और विवाह को अपनी स्वीकृति दी
  • उन्होंने अश्वपति से विवाह रोकने को कहा
  • उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया
पूरी कथा पढ़िए — स्वीकृति की मुहर

नारद ने कहा कि सावित्री के हृदय को कोई डिगा नहीं सकता।

उन्होंने कहा कि सत्यवान में जो गुण हैं, वे किसी और में नहीं।

अश्वपति ने नारद की बात मानकर विवाह की तैयारी शुरू कर दी।

ऐसा क्यों?

अश्वपति ने सावित्री को स्वयं पति चुनने की छूट क्यों दी?

  • क्योंकि उन्हें विवाह की जल्दी नहीं थी
  • क्योंकि सावित्री ने विवाह से इनकार किया था
  • क्योंकि उसके तेज से भयभीत होकर कोई राजकुमार उसे माँगने नहीं आता था, और वे विद्वानों के अनुसार विवाह न करने की निंदा से भी बचना चाहते थे
  • क्योंकि किसी ऋषि ने ऐसा आदेश दिया
पूरी कथा पढ़िए — निंदा से बचने की इच्छा

सावित्री के तेज से भयभीत होकर कोई उसे माँगने नहीं आता था।

अश्वपति ने कहा कि पुत्री का विवाह न करने वाला पिता निंदा का भागी होता है।

इसीलिए उन्होंने सावित्री को स्वयं पति चुनने को कहा।

तथ्य

सत्यवान को बचपन में किस विद्या से लगाव था, और उसका दूसरा नाम क्या था?

  • संगीत से; उसे गायक कहा जाता था
  • युद्ध-विद्या से; उसे वीराश्व कहा जाता था
  • ज्योतिष से; उसे ज्ञानाश्व कहा जाता था
  • घोड़ों से
पूरी कथा पढ़िए — बचपन का शौक़

सत्यवान को बचपन में घोड़ों से गहरा लगाव था।

वह मिट्टी के घोड़े बनाता और घोड़ों के चित्र बनाता।

इसी कारण उसे चित्राश्व नाम से भी जाना जाता था।

पहेली

मैं वह ऋषि हूँ जिसने एक राजकुमार के सारे गुण गिनाए, फिर एक ही दोष बताया — कि उसकी आयु केवल एक वर्ष शेष है। मैं कौन हूँ?

  • नारद
  • मार्कंडेय
  • वसिष्ठ
  • अगस्त्य
पूरी कथा पढ़िए — गुण और एक दोष

नारद ने सत्यवान के गुणों की लंबी सूची दी।

फिर बताया कि उसकी आयु केवल एक वर्ष शेष है।

सावित्री के अटल निश्चय के बाद, नारद ने ही इस विवाह को अपनी स्वीकृति दी।