अध्याय ८

लौटना

उसी रात द्युमत्सेन को उनकी दृष्टि वापस मिल गई, और अगली सुबह ख़बर आई कि उनका खोया राज्य भी वापस मिल चुका है — सावित्री का हर वरदान सच निकला

एक रात की खोज

इसी बीच, आश्रम में द्युमत्सेन को अचानक अपनी दृष्टि वापस मिल गई, और वे फिर से सब कुछ देख पाने लगे। अपनी पत्नी शैव्या के साथ वे अपने पुत्र को ढूँढते हुए आसपास के सभी आश्रमों में गए, गहरे कष्ट में। पूरी रात वह बूढ़ा दंपती वन, नदियों और झरनों में खोजते रहे, हर आहट पर सिर उठाकर सोचते — "वह देखो, सत्यवान सावित्री के साथ आ रहा है!" काँटों और कुश की पत्तियों से उनके पैर लहूलुहान हो गए, फटे और घायल। आख़िर आश्रम के ब्राह्मणों ने उन्हें ढूँढकर वापस आश्रम लाया, सांत्वना देते हुए।

वहाँ बुज़ुर्ग तपस्वियों से घिरे द्युमत्सेन और शैव्या को पुराने राजाओं की कथाएँ सुनाकर सांत्वना दी गई। फिर भी पुत्र की याद में वे बार-बार विलाप कर उठते — "हाय पुत्र, हाय सती पुत्रवधू, तुम कहाँ हो?" तब सुवर्चा नाम के एक सत्यवादी ब्राह्मण ने कहा — "सावित्री के तप, संयम और आचरण को देखते हुए, इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्यवान जीवित है।" गौतम ऋषि ने कहा — "मैंने वेदों का अध्ययन किया है, ब्रह्मचर्य का पालन किया है, और इसी तप के बल पर मैं दूसरों के कर्मों को जान सकता हूँ — निश्चय मानो, सत्यवान जीवित है।" अन्य ऋषियों ने भी एक-एक कर यही कहा — सावित्री के शुभ लक्षण, उसके तप और उसके स्वयं व्रत पूरा करके गए होने के तथ्य से, इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्यवान जीवित लौटेगा।

वापसी

इसी सांत्वना के बीच, रात में ही सावित्री अपने पति सत्यवान के साथ प्रसन्न हृदय से आश्रम पहुँची। ब्राह्मणों ने कहा — "तुम्हारे पुत्र का यूँ लौटना, और तुम्हारी दृष्टि का वापस मिलना — यह एक साथ आया तिहरा सौभाग्य है, राजन्! अब से तुम्हारी समृद्धि तेज़ी से बढ़ेगी।" ब्राह्मणों ने अग्नि जलाकर द्युमत्सेन के सामने बैठकर उत्सुकता से पूछा — "तुम इतनी देर से, इस रात में, क्यों लौटे? क्या रुकावट आई थी?"

सत्यवान ने कहा — "पिता की अनुमति से मैं सावित्री के साथ वन गया था। वहाँ लकड़ी काटते हुए मुझे सिर में तेज़ दर्द हुआ, और मैं गहरी नींद में सो गया — इतना ही मुझे याद है। मैं इतनी देर पहले कभी नहीं सोया।" गौतम ऋषि ने कहा — "तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारे पिता को अचानक दृष्टि कैसे वापस मिली। सावित्री ही इसे बता सकती है, क्योंकि वह इसका कारण जानती होगी। सावित्री, कृपया सच बताओ।" सावित्री ने कहा — "जैसा आप सोचते हैं, वैसा ही है। मुझसे कोई रहस्य नहीं। सुनिए सच — नारद ने मेरे पति की मृत्यु की भविष्यवाणी की थी। आज वही दिन था। सोए हुए पति को यम स्वयं अपने दूतों सहित बाँधकर ले जाने लगे। मैंने सत्य वचनों से उनकी स्तुति की, और उन्होंने मुझे पाँच वरदान दिए। श्वसुर के लिए दृष्टि और राज्य, दोनों वापस मिले। मेरे पिता को सौ पुत्रों का वर मिला। मुझे स्वयं सौ पुत्रों का वर मिला। और मेरे पति सत्यवान को चार सौ वर्षों की आयु मिली। इसी व्रत के लिए मैंने वह सब निभाया — और यह विपत्ति सौभाग्य में बदल गई।" ऋषियों ने कहा — "हे सती स्त्री, तुमने ही इस राजा के डूबते हुए वंश को अंधकार से बचाया है।"

राज्य लौट आया

अगली सुबह, प्रातः कर्म के बाद, शाल्व देश से बहुत-से लोग आश्रम पहुँचे। उन्होंने बताया कि द्युमत्सेन के शत्रु को, जिसने पहले उनका राज्य छीना था, उसी के अपने मंत्री ने मार डाला था। शत्रु की सेना तितर-बितर हो गई थी, और प्रजा एकमत होकर कह रही थी — "चाहे दृष्टिहीन हों या न हों, वे ही हमारे राजा रहेंगे!" लोगों ने कहा — "यह रथ और चतुरंगिणी सेना आपके लिए ही आई है। नगर में आपकी घोषणा हो चुकी है, कृपया लौटकर अपने पूर्वजों का सिंहासन ग्रहण कीजिए।"

द्युमत्सेन, अब सदृष्टि और सशक्त, आश्रम के ऋषियों का आशीर्वाद लेकर अपने नगर की ओर चल पड़े। शैव्या और सावित्री, दोनों पालकी में, सेना के साथ चलीं। पुरोहितों ने विधिपूर्वक द्युमत्सेन को सिंहासन पर बिठाया, और सत्यवान को युवराज घोषित किया। कुछ समय बाद सावित्री ने सौ पराक्रमी पुत्रों को जन्म दिया, जो शाल्व वंश की कीर्ति बढ़ाने वाले बने। उधर अश्वपति को भी मालवी से सौ पुत्र मिले, जो मालव के नाम से जाने गए।

मार्कंडेय ने कथा समाप्त करते हुए कहा — "हे युधिष्ठिर, जिस तरह सावित्री ने स्वयं को, अपने माता-पिता को, अपने सास-श्वसुर को और अपने पति के कुल को इस दुर्भाग्य से उबारा, उसी तरह द्रौपदी भी, अपने उत्तम चरित्र से, तुम सबको उबारेगी।"

वैशंपायन आगे कहते हैं कि मार्कंडेय की यह बात सुनकर युधिष्ठिर की चिंता दूर हुई, और वे काम्यक वन में ही रहने लगे। कथा के अंत में एक फलश्रुति भी दी गई है — जो व्यक्ति सावित्री की इस कथा को श्रद्धा से सुनता है, वह सुख और सफलता प्राप्त करता है, और दुःख से बचा रहता है।

टिप्पणी: यह प्रसंग गांगुली के अनुवाद में विस्तार से है — द्युमत्सेन की दृष्टि की वापसी, रातभर की खोज, ऋषियों द्वारा दी गई सांत्वना (सुवर्चा, गौतम और अन्य ऋषियों के अलग-अलग तर्क), और अगली सुबह राज्य वापस मिलने की ख़बर — यह सब मूल पाठ में ज्यों-का-त्यों है। "बरगद वृक्ष" इस मूल एपिसोड में कहीं नहीं आता — वह बाद की वट सावित्री व्रत-परंपरा का हिस्सा है, जो आज भी जीवित है। एक सूक्ष्म पाठीय अंतर भी ध्यान देने योग्य है — घटना के प्रत्यक्ष वर्णन में यम स्वयं आते हैं, और सावित्री उनसे पूछती है कि दूतों के बजाय वे स्वयं क्यों आए; पर बाद में ऋषियों को घटना सुनाते समय सावित्री कहती है कि यम अपने दूतों के साथ आए थे। दोनों कथन गांगुली के अनुवाद में ज्यों-के-त्यों मौजूद हैं, दोनों यहाँ रखे गए हैं। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: महाभारत, वनपर्व — पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, लौटना

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

यम से वरदान पाने के तुरंत बाद, आश्रम में द्युमत्सेन के साथ क्या हुआ?

  • उन्हें सत्यवान की मृत्यु का समाचार मिला
  • वे बेहोश हो गए
  • उन्हें अचानक अपनी दृष्टि वापस मिल गई
  • उनका राज्य उसी क्षण वापस मिल गया
पूरी कथा पढ़िए — अचानक दृष्टि

जब सावित्री यम से बातचीत कर रही थी, तभी द्युमत्सेन को दृष्टि वापस मिल गई।

वे शैव्या के साथ अपने पुत्र को ढूँढने निकल पड़े।

रातभर वन में भटकने के बाद ब्राह्मण उन्हें वापस आश्रम लाए।

किसने कहा?

"सावित्री के तप, संयम और आचरण को देखते हुए, इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्यवान जीवित है।" — यह किसने कहा?

  • सुवर्चा नाम के एक ब्राह्मण ने
  • गौतम ऋषि ने
  • द्युमत्सेन ने स्वयं
  • शैव्या ने
पूरी कथा पढ़िए — आश्वासन देने वाले ऋषि

सत्यवान की तलाश में असफल होने पर द्युमत्सेन और शैव्या विलाप करने लगे।

सुवर्चा नाम के ब्राह्मण ने सावित्री के गुणों के आधार पर आश्वासन दिया।

अन्य ऋषियों ने भी अपने-अपने तर्कों से यही बात दोहराई।

क्या हुआ?

सत्यवान और सावित्री आश्रम कब लौटे?

  • अगली सुबह
  • दोपहर में
  • तीन दिन बाद
  • उसी रात, जब द्युमत्सेन और शैव्या ऋषियों की सांत्वना में बैठे थे
पूरी कथा पढ़िए — रात में वापसी

द्युमत्सेन और शैव्या ऋषियों से घिरे बैठे थे।

तभी सावित्री अपने पति सत्यवान के साथ प्रसन्न हृदय से आश्रम पहुँची।

ब्राह्मणों ने इसे तिहरा सौभाग्य — पुत्र, पुत्रवधू और दृष्टि — बताया।

तथ्य

सावित्री ने अपने पाँच वरदान किस क्रम में गिनाए — याद कीजिए?

  • सत्यवान का जीवन सबसे पहले
  • श्वसुर की दृष्टि और राज्य, पिता के लिए सौ पुत्र, स्वयं के लिए सौ पुत्र, और अंत में सत्यवान की आयु
  • केवल तीन वरदान गिनाए
  • केवल सत्यवान के जीवन का वरदान गिनाया
पूरी कथा पढ़िए — पाँच वरदान

सावित्री ने ऋषियों को सारी सच्चाई बताई।

उसने यम से मिले पाँचों वरदान क्रम से गिनाए।

श्वसुर की दृष्टि-राज्य, पिता और स्वयं के लिए पुत्र, और सत्यवान की आयु।

किसने कहा?

"हे सती स्त्री, तुमने ही इस राजा के डूबते हुए वंश को अंधकार से बचाया है।" — यह किसने कहा?

  • आश्रम के ऋषियों ने सावित्री से
  • मार्कंडेय ने युधिष्ठिर से
  • यम ने सावित्री से
  • द्युमत्सेन ने सावित्री से
पूरी कथा पढ़िए — ऋषियों की सराहना

सावित्री ने अपनी पूरी कथा ऋषियों को सुनाई।

ऋषियों ने उसकी प्रशंसा करते हुए यह कहा।

फिर वे सब अपने-अपने आश्रमों को लौट गए।

क्या हुआ?

अगली सुबह शाल्व देश से आए लोगों ने क्या ख़बर दी?

  • कि सत्यवान को राजा घोषित कर दिया गया है
  • कि पड़ोसी राज्य ने आक्रमण की योजना बनाई है
  • कि अश्वपति का देहांत हो गया है
  • कि द्युमत्सेन के शत्रु को उसी के अपने मंत्री ने मार डाला था, और प्रजा द्युमत्सेन को वापस चाहती है
पूरी कथा पढ़िए — राज्य की वापसी

शाल्व देश से बहुत-से लोग आश्रम पहुँचे।

उन्होंने बताया कि शत्रु को उसी के मंत्री ने मार डाला था।

प्रजा एकमत होकर द्युमत्सेन को वापस राजा चाहती थी।

क्या हुआ?

द्युमत्सेन के नगर लौटने के बाद क्या हुआ?

  • सत्यवान को तुरंत राजा बना दिया गया
  • द्युमत्सेन को सिंहासन पर बिठाया गया, और सत्यवान को युवराज घोषित किया गया
  • सावित्री को रानी घोषित किया गया, द्युमत्सेन को नहीं
  • राज्य को दो भागों में बाँट दिया गया
पूरी कथा पढ़िए — सिंहासन पर वापसी

द्युमत्सेन अपने नगर लौटे, सदृष्टि और सशक्त।

पुरोहितों ने विधिपूर्वक उन्हें सिंहासन पर बिठाया।

सत्यवान को युवराज घोषित किया गया।

ऐसा क्यों?

मार्कंडेय ने युधिष्ठिर को यह कथा सुनाकर अंत में क्या कहा?

  • कि युधिष्ठिर को भी ऐसा ही व्रत रखना चाहिए
  • कि युधिष्ठिर को अब जुआ कभी नहीं खेलना चाहिए
  • कि जिस तरह सावित्री ने अपने पूरे परिवार को दुर्भाग्य से उबारा, उसी तरह द्रौपदी भी अपने उत्तम चरित्र से पांडवों को उबारेगी
  • कि द्रौपदी को भी यम से बात करनी चाहिए
पूरी कथा पढ़िए — द्रौपदी से तुलना

मार्कंडेय ने कथा को द्रौपदी के प्रति युधिष्ठिर की चिंता से जोड़ा था।

अंत में उन्होंने कहा कि सावित्री ने अपने पूरे परिवार को उबारा।

उसी तरह द्रौपदी भी पांडवों को उबारेगी, यही आशा उन्होंने जताई।

तथ्य

सावित्री और सत्यवान को कुल कितने पुत्र मिले, और अश्वपति को मालवी से कितने?

  • पचास-पचास
  • सावित्री को सौ, अश्वपति को पचास
  • केवल सावित्री को पुत्र मिले, अश्वपति को नहीं
  • दोनों को सौ-सौ पुत्र मिले
पूरी कथा पढ़िए — दो सौ पुत्रों की कथा

सावित्री और सत्यवान को सौ पराक्रमी पुत्र मिले, जो शाल्व वंश की कीर्ति बढ़ाने वाले बने।

अश्वपति को भी मालवी से सौ पुत्र मिले।

ये मालव के नाम से जाने गए।

पहेली

मैं वह रात हूँ जब एक अंधे राजा को दृष्टि वापस मिली, उसका पुत्र और पुत्रवधू लौट आए, और अगली सुबह उसका खोया राज्य भी वापस मिल गया। मैं क्या हूँ?

  • सावित्री के वरदान सच होने की रात
  • सावित्री के विवाह की रात
  • सावित्री के त्रिरात्र व्रत की पहली रात
  • यम के प्रकट होने का क्षण
पूरी कथा पढ़िए — एक रात में तीन सौभाग्य

उसी रात द्युमत्सेन को दृष्टि, और सत्यवान-सावित्री की वापसी मिली।

अगली सुबह राज्य वापस मिलने की ख़बर आई।

सौ-सौ पुत्रों वाले बाकी वर कथा के आगे, समय बीतने पर पूरे होते हैं।