अध्याय ५

वह दिन

लकड़ी काटते-काटते सिर दर्द से बेहाल पति का सिर सावित्री ने अपनी गोद में रख लिया, और उसी क्षण साक्षात यम अपने फंदे के साथ प्रकट हो गए

अंतिम दिन

सूर्योदय के कुछ समय बाद सावित्री ने सोचा — "आज ही वह दिन है।" उसने अपने प्रातःकालीन कर्म पूरे किए और यज्ञाग्नि में आहुति दी। वृद्ध ब्राह्मणों और अपने सास-श्वसुर को प्रणाम कर वह हाथ जोड़े खड़ी हो गई, अपनी इंद्रियों को पूरी तरह वश में करते हुए। आश्रम के सभी तपस्वियों ने सावित्री के कल्याण के लिए यह आशीर्वाद दिया कि उसे कभी वैधव्य का दुःख न झेलना पड़े। सावित्री ने मन-ही-मन "ऐसा ही हो" कहकर वह आशीर्वाद स्वीकार किया, और नारद के शब्दों का स्मरण करते हुए उस क्षण की प्रतीक्षा करने लगी।

सास-श्वसुर ने प्रसन्न होकर कहा — "तुमने व्रत पूरा कर लिया है, अब भोजन का समय हो गया है।" सावित्री ने कहा — "मैं सूर्यास्त के बाद भोजन करूँगी — यही मेरे हृदय का संकल्प और मेरा व्रत है।"

इसी समय सत्यवान अपने कंधे पर कुल्हाड़ी लेकर वन की ओर लकड़ी लाने चल पड़े। सावित्री ने कहा — "आप अकेले मत जाइए, मैं साथ चलूँगी। आपसे अलग रहना मुझसे सहन नहीं होगा।" सत्यवान ने कहा — "तुमने पहले कभी वन का रास्ता तय नहीं किया, और तुम व्रत से कमज़ोर भी हो — तुम पैदल कैसे चल पाओगी?" सावित्री ने कहा — "मुझे उपवास से कोई थकान नहीं है। मैंने साथ चलने का मन बना लिया है, मुझे मत रोकिए।" सत्यवान ने कहा — "यदि तुम्हारी यही इच्छा है, तो मैं इसे पूरी करूँगा — पर पहले माता-पिता से अनुमति ले लो, ताकि मुझ पर कोई दोष न आए।" सावित्री ने सास-श्वसुर से अनुमति माँगी — "आपका पुत्र फल लाने वन जा रहा है, मैं आज उसके साथ जाना चाहती हूँ, आज मुझसे उनसे अलग रहना सहन नहीं होगा।" द्युमत्सेन ने कहा — "सावित्री ने मुझसे कभी कोई बात नहीं माँगी। मेरी पुत्रवधू की यही इच्छा पूरी हो।"

वन में

अनुमति पाकर सावित्री मुस्कुराते हुए, पर हृदय में शोक लिए, अपने पति के साथ चल पड़ी। मोरों के झुंडों से भरे सुंदर वनों को देखते हुए वे आगे बढ़े। सत्यवान ने उसे नदियों और फूलों से लदे वृक्षों को दिखाया, पर सावित्री हर क्षण अपने पति को ही देखती रही, नारद के शब्दों को याद करते हुए, मानो उसने अपने पति को पहले से ही मृत मान लिया हो।

सत्यवान फल इकट्ठा करते और लकड़ी काटते रहे। लकड़ी काटते-काटते उन्हें पसीना आने लगा, और सिर में दर्द होने लगा। थककर उन्होंने सावित्री से कहा — "सावित्री, इस परिश्रम से मेरा सिर दर्द कर रहा है, मेरा पूरा शरीर पीड़ा में है। मुझे सोने का मन है, मुझमें खड़े रहने की शक्ति नहीं बची।" सावित्री तुरंत आगे बढ़ी, ज़मीन पर बैठकर उसने पति का सिर अपनी गोद में रख लिया।

साक्षात यम

नारद के शब्दों का स्मरण करते हुए सावित्री समय की गणना करने लगी। तभी उसने देखा — लाल वस्त्र पहने, सिर पर मुकुट धारण किए एक विशालकाय पुरुष खड़ा है। उसका शरीर सूर्य के समान तेजस्वी था, वर्ण साँवला, आँखें लाल, हाथ में फंदा — देखने में भयावह। वह सत्यवान के पास खड़ा स्थिर दृष्टि से उन्हें ही देख रहा था।

उसे देखते ही सावित्री ने पति का सिर धीरे से भूमि पर रखा, और काँपते हृदय से खड़ी होकर पूछा — "आपका यह अलौकिक रूप देखकर मैं आपको देवता मानती हूँ। कृपया बताइए, आप कौन हैं और यहाँ क्या करने आए हैं?" यम ने कहा — "सावित्री, तुम अपने पति के प्रति समर्पित हो, और तपस्या से युक्त भी हो, इसीलिए मैं तुमसे बात कर रहा हूँ। जान लो, मैं यम हूँ। तुम्हारे इस पति सत्यवान की आयु पूरी हो गई है — मैं इसे अपने फंदे में बाँधकर ले जाऊँगा।" सावित्री ने पूछा — "मैंने सुना था कि आपके दूत ही मनुष्यों को लेने आते हैं। आप स्वयं क्यों आए हैं, हे प्रभु?"

यम ने उत्तर दिया — "यह राजकुमार गुणों और रूप से संपन्न है, गुणों का सागर है। यह मेरे दूतों द्वारा ले जाए जाने योग्य नहीं — इसीलिए मैं स्वयं आया हूँ।" यह कहकर यम ने बलपूर्वक सत्यवान के शरीर से अँगूठे के बराबर एक पुरुषरूपी जीवन-सत्ता खींच निकाली, फंदे में बँधी और पूर्णतः वश में। इसके निकलते ही सत्यवान का शरीर श्वासहीन, तेजहीन और निश्चल होकर कुरूप हो गया। सत्यवान की इस जीवन-सत्ता को बाँधकर यम दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। हृदय में शोक से भरी सावित्री, अपने पति की अनन्य भक्त, यम के पीछे-पीछे चलने लगी।

टिप्पणी: यह प्रसंग गांगुली के अनुवाद में विस्तार से है — यम का वर्णन (लाल वस्त्र, मुकुट, साँवला वर्ण, लाल आँखें, हाथ में फंदा), उनका स्वयं आने का कारण, और अँगूठे के बराबर पुरुषरूपी जीवन-सत्ता को फंदे में बाँधकर दक्षिण दिशा ले जाना — यह सब मूल पाठ में ज्यों-का-त्यों है। सावित्री का यम के पीछे चल पड़ना भी उसी क्षण से शुरू होता है। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: महाभारत, वनपर्व — पतिव्रता-माहात्म्य पर्व, वह दिन

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

अंतिम दिन सावित्री ने सुबह सबसे पहले क्या किया?

  • वह वन की ओर चल पड़ी
  • वह सो गई
  • प्रातःकालीन कर्म और यज्ञाग्नि में आहुति दी, फिर ब्राह्मणों और सास-श्वसुर को प्रणाम किया
  • उसने सत्यवान को वन जाने से रोका
पूरी कथा पढ़िए — अंतिम दिन की शुरुआत

सावित्री ने सोचा कि आज ही वह दिन है।

उसने प्रातःकालीन कर्म पूरे किए और यज्ञाग्नि में आहुति दी।

फिर ब्राह्मणों और सास-श्वसुर को प्रणाम कर आशीर्वाद स्वीकार किया।

किसने कहा?

"मुझे उपवास से कोई थकान नहीं है। मैंने साथ चलने का मन बना लिया है, मुझे मत रोकिए।" — यह किसने कहा?

  • सावित्री ने सत्यवान से
  • सत्यवान ने सावित्री से
  • शैव्या ने सावित्री से
  • द्युमत्सेन ने सावित्री से
पूरी कथा पढ़िए — साथ चलने की ज़िद

सत्यवान वन की ओर कुल्हाड़ी लेकर चल पड़े।

सावित्री ने साथ चलने की इच्छा जताई, सत्यवान की आपत्ति के बावजूद।

सास-श्वसुर की अनुमति लेकर आख़िर वह उनके साथ चल पड़ी।

क्या हुआ?

वन में सत्यवान को क्या हुआ?

  • वे किसी जंगली जानवर से डर गए
  • वे रास्ता भटक गए
  • उन्हें साँप ने डस लिया
  • लकड़ी काटते-काटते पसीना आने लगा और सिर में तेज़ दर्द होने लगा
पूरी कथा पढ़िए — अचानक पीड़ा

सत्यवान फल इकट्ठा करते और लकड़ी काटते रहे।

इस परिश्रम से उन्हें पसीना और तेज़ सिरदर्द होने लगा।

थककर उन्होंने सावित्री की गोद में सिर रखकर विश्राम माँगा।

तथ्य

सावित्री के सामने प्रकट हुए यम का रूप कैसा था?

  • श्वेत वस्त्र, शांत मुख, हाथ में कमल
  • लाल वस्त्र, मुकुट धारण किए, साँवला वर्ण, लाल आँखें, हाथ में फंदा
  • नीले वर्ण, त्रिशूल लिए
  • हरे वस्त्र, हाथ में गदा
पूरी कथा पढ़िए — एक भयावह रूप

सावित्री ने देखा — लाल वस्त्र, मुकुट, साँवला वर्ण, लाल आँखों वाला एक विशालकाय पुरुष।

उसके हाथ में फंदा था, और वह सूर्य के समान तेजस्वी था।

वह सत्यवान के पास स्थिर दृष्टि से खड़ा था।

किसने कहा?

"यह राजकुमार गुणों और रूप से संपन्न है, गुणों का सागर है। यह मेरे दूतों द्वारा ले जाए जाने योग्य नहीं — इसीलिए मैं स्वयं आया हूँ।" — यह किसने कहा?

  • यम ने सावित्री से
  • सावित्री ने यम से
  • नारद ने अश्वपति से
  • द्युमत्सेन ने सावित्री से
पूरी कथा पढ़िए — स्वयं आने का कारण

सावित्री ने पूछा कि यम स्वयं क्यों आए, जब उनके दूत ही यह काम करते हैं।

यम ने उत्तर दिया कि सत्यवान इतना गुणी है कि वह स्वयं उसे लेने आए।

यही कहकर उन्होंने सत्यवान की जीवन-सत्ता को अँगूठे के बराबर पुरुषरूप में खींच निकाला।

क्या हुआ?

यम सत्यवान की जीवन-सत्ता को किस रूप में और किस दिशा में ले गए?

  • एक श्वेत प्रकाश के रूप में, उत्तर दिशा की ओर
  • एक पक्षी के रूप में, पूर्व दिशा की ओर
  • सत्यवान के शरीर को पूरा साथ ले जाकर
  • अँगूठे के बराबर एक पुरुष के रूप में, फंदे में बाँधकर, दक्षिण दिशा की ओर
पूरी कथा पढ़िए — जीवन-सत्ता का हरण

यम ने बलपूर्वक सत्यवान के शरीर से अँगूठे के बराबर एक पुरुष खींच निकाला।

यह जीवन-सत्ता फंदे में बँधी, पूर्णतः वश में थी।

यम इसे लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े, सावित्री उनके पीछे-पीछे।

क्या हुआ?

यह जीवन-सत्ता निकलते ही सत्यवान के शरीर का क्या हुआ?

  • वह तुरंत जलकर राख हो गया
  • वह श्वासहीन, तेजहीन और निश्चल होकर कुरूप हो गया
  • वह अदृश्य हो गया
  • उसमें से रक्त बहने लगा
पूरी कथा पढ़िए — शरीर की दशा

यम ने सत्यवान की जीवन-सत्ता को बलपूर्वक खींच निकाला।

इसके निकलते ही शरीर श्वासहीन और निश्चल हो गया।

वह कुरूप दिखने लगा, अपनी पहले की कांति खो बैठा।

ऐसा क्यों?

आश्रम के तपस्वियों ने सावित्री को कौन-सा आशीर्वाद दिया, और उसने उसे कैसे स्वीकार किया?

  • कि उसे सौ पुत्र मिलें
  • कि उसका पति दीर्घायु हो
  • कि उसे कभी वैधव्य का दुःख न झेलना पड़े
  • कि उसे राज्य वापस मिले
पूरी कथा पढ़िए — एक आशीर्वाद, एक स्वीकृति

प्रातःकालीन कर्मों के बाद सावित्री हाथ जोड़े खड़ी हुई।

आश्रम के तपस्वियों ने आशीर्वाद दिया कि उसे कभी वैधव्य न झेलना पड़े।

सावित्री ने मन-ही-मन "ऐसा ही हो" कहकर इसे स्वीकार किया।

तथ्य

सावित्री ने वन में चलते हुए सत्यवान को कैसे देखा — याद कीजिए?

  • वह आसपास के दृश्यों को ही देखती रही
  • वह डर के कारण पीछे-पीछे चलती रही
  • वह ज़्यादातर आँखें बंद करके चली
  • वह हर क्षण अपने पति को ही देखती रही, मानो उसने उसे पहले से ही मृत मान लिया हो
पूरी कथा पढ़िए — एक मौन प्रतीक्षा

सत्यवान ने उसे नदियों और फूलों से लदे वृक्ष दिखाए।

पर सावित्री हर क्षण अपने पति को ही देखती रही, नारद के शब्दों को याद करते हुए।

हृदय में उसने अपने पति को मानो पहले से ही मृत मान लिया था।

पहेली

मैं वह क्षण हूँ जब एक रानी ने अपने पति का सिर अपनी गोद में रखा, और ठीक तभी साक्षात मृत्यु के देवता प्रकट हो गए। मैं क्या हूँ?

  • सत्यवान की मृत्यु का क्षण
  • सावित्री के व्रत का आरंभ
  • सावित्री और सत्यवान का विवाह
  • नारद की भविष्यवाणी
पूरी कथा पढ़िए — जिस पल की प्रतीक्षा थी

सत्यवान ने थककर सावित्री की गोद में सिर रखा।

नारद के शब्दों को याद करते हुए सावित्री समय गिन रही थी।

ठीक उसी क्षण उसने साक्षात यम को अपने सामने खड़ा देखा।