अध्याय ९

हिमालय का पत्थर

पहाड़ी कन्याओं ने पहली बार कन्नगी को देवी माना — फिर राजा चेंगुट्टुवन उत्तर की ओर चला, हिमालय से पत्थर लाकर उसकी मूर्ति गढ़ने के लिए

पहाड़ी कन्याओं की पूजा

कन्नगी जिस पहाड़ी पर पहुँची, वहाँ मुरुगन की उपासक पहाड़ी कन्याओं ने उसे स्तनहीन, दुःखी अवस्था में देखा और उसकी कथा सुनी। कन्नगी के स्वर्गारोहण की साक्षी बनकर उन्होंने कहा — "हमारे लिए इससे बड़ी देवी कोई नहीं। हे छोटे गाँवों के लोगों, इस देवी को स्वीकार करो!" इस तरह कन्नगी की पूजा सबसे पहले साधारण पहाड़ी लोगों में शुरू हुई, राजदरबार में नहीं।

यह समाचार चेर राज्य के राजा चेंगुट्टुवन तक पहुँचा — पहले पहाड़ी क़बीलों से, फिर तमिल कवि सत्तनार (परंपरा से मणिमेकलै के रचयिता माने जाने वाले) की गवाही से, जिन्होंने स्वयं मदुरै में यह सब देखा था। सत्तनार ने राजा और रानी इलंगो-वेण्मल को पूरी कथा सुनाई। रानी ने कहा — "इस देवी को उचित सम्मान मिलना चाहिए।" राजा ने निश्चय किया कि इस देवी की मूर्ति साधारण पत्थर से नहीं, बल्कि हिमालय से लाए गए पत्थर से गढ़ी जाएगी। उत्तर के राजाओं की अवमानना-भरी टिप्पणियाँ, जो हिमालय के संतों के माध्यम से उन तक पहुँची थीं, उन्हें चुनौती लगीं — और पत्थर लाना तमिल राजशक्ति के प्रदर्शन से जुड़ गया।

उत्तर का अभियान

चेंगुट्टुवन ने अपनी विशाल सेना के साथ उत्तर की ओर कूच किया, मार्ग में अनेक उत्तर और मध्य भारतीय राजाओं को पराजित करते हुए, और अंततः गंगा के तट पर उत्तर के "आर्य राजाओं" कनक और विजय को बंदी बना लिया। जब बंदी राजाओं को चोल और पांड्य राजाओं के सामने दिखाया गया, तो उन्होंने व्यंग्य किया कि युद्धभूमि से भागकर तपस्वी-वेश धारण कर चुके राजाओं को बंदी बनाना क्षत्रिय मर्यादा के अनुरूप नहीं — इससे चेंगुट्टुवन क्रोधित हो उठा।

ब्राह्मण मादलन ने राजा को शांत किया, जीवन की नश्वरता और पूर्वजन्म-पुनर्जन्म के दर्शन का स्मरण कराते हुए, और सुझाव दिया कि राजा युद्ध की जगह एक यज्ञ करे। राजा ने यह सलाह मानी, बंदी आर्य राजाओं को सम्मानपूर्वक मुक्त किया, सामान्य क्षमादान और कर-माफ़ी की घोषणा की, और हिमालय से लाए गए पत्थर से कन्नगी की — अब पत्तिनी नाम से पूजित — मूर्ति गढ़वाकर, आगम-शास्त्र के नियमों के अनुसार वंजि नगर में उसका विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा-समारोह करवाया।

गजबाहु की उपस्थिति

इसी प्राण-प्रतिष्ठा-समारोह में — काव्य के अनुसार — बंदी रहे आर्य राजा कनक और विजय, कोंगु का शासक, मालवा का राजा, और कयवाहु (गजबाहु), समुद्र-घिरे लंका के राजा, सब उपस्थित थे, और देवी से प्रार्थना करते थे कि वे अपने-अपने राज्यों को भी कृपादृष्टि दें। यही दृश्य है जिस पर "गजबाहु-तुल्यकालिकता" का पूरा ऐतिहासिक विवाद टिका है — क्योंकि गजबाहु का समय इतिहास से कुछ हद तक जाना जाता है, विद्वान इसी दृश्य से चेंगुट्टुवन और इस काव्य के रचनाकाल का अनुमान लगाने का प्रयास करते हैं।

स्रोत: तमिल पंचकाव्य — सिलप्पदिकारम् (परंपरा से इलंगो अडिगल रचित), हिमालय का पत्थर

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

कन्नगी की पूजा सबसे पहले किसने शुरू की?

  • राजा चेंगुट्टुवन ने
  • ब्राह्मण मादलन ने
  • पहाड़ी कन्याओं ने, मुरुगन की उपासिकाओं ने
  • देवी मदुरापति ने स्वयं
पूरी कथा पढ़िए — साधारण लोगों में पहली पूजा

कन्नगी की पूजा सबसे पहले पहाड़ी कन्याओं ने शुरू की।

यह राजदरबार से नहीं, साधारण पहाड़ी लोगों से शुरू हुई।

किसने कहा?

"इस देवी को उचित सम्मान मिलना चाहिए।" — यह किसने कहा?

  • रानी इलंगो-वेण्मल ने राजा चेंगुट्टुवन से
  • कवि सत्तनार ने राजा से
  • ब्राह्मण मादलन ने राजा से
  • पहाड़ी कन्याओं ने राजा से
पूरी कथा पढ़िए — रानी का समर्थन

जब सत्तनार ने कन्नगी की पूरी कथा सुनाई, तो रानी ने राजा से कहा कि देवी को उचित सम्मान मिलना चाहिए।

इसी के बाद राजा ने मूर्ति बनवाने का निश्चय किया।

ऐसा क्यों?

राजा चेंगुट्टुवन ने पास के पोदियिल पर्वत की जगह दूर हिमालय से पत्थर लाने का निश्चय क्यों किया?

  • क्योंकि पोदियिल पर्वत पवित्र नहीं माना जाता था
  • क्योंकि पास के पत्थर उपलब्ध नहीं थे
  • यह विवरण कथा में स्पष्ट नहीं है
  • उत्तर के राजाओं की अवमानना-भरी टिप्पणियों के बाद यह केवल धार्मिक विकल्प नहीं रहा; उसने इसे तमिल राजशक्ति के प्रदर्शन से जोड़ दिया
पूरी कथा पढ़िए — चुनौती और निश्चय

राजा ने कहा कि पास के पोदियिल पर्वत से पत्थर लाना उसके वंश के गौरव के लायक उपलब्धि नहीं है।

उत्तर के राजाओं की टिप्पणियों को अनसुना करना उसे अपमानजनक लगा, इसलिए हिमालय से पत्थर लाना तमिल राजशक्ति का प्रदर्शन बन गया।

तथ्य

चेंगुट्टुवन ने गंगा के तट पर किन दो राजाओं को पराजित कर बंदी बनाया?

  • राम और लक्ष्मण
  • कनक और विजय, उत्तर के "आर्य राजा"
  • नेडुंजेलियन और कोप्पेरुंदेवी
  • सत्तनार और मादलन
पूरी कथा पढ़िए — उत्तर के दो राजा

चेंगुट्टुवन ने गंगा के तट पर कनक और विजय नामक आर्य राजाओं को पराजित कर बंदी बनाया।

बाद में उसने इन्हें सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया।

तथ्य

बंदी कनक और विजय को देखकर चोल और पांड्य राजाओं ने क्या टिप्पणी की?

  • कि युद्ध से भागकर तपस्वी-वेश धारण कर चुके राजाओं को बंदी बनाना क्षत्रिय मर्यादा के अनुरूप नहीं
  • कि यह चेंगुट्टुवन की महानतम जीत है
  • कि उन्हें तुरंत छोड़ देना चाहिए
  • कि उन्होंने युद्ध में कड़ा प्रतिरोध किया
पूरी कथा पढ़िए — एक तीखी टिप्पणी

चोल और पांड्य राजाओं ने व्यंग्य किया कि तपस्वी-वेश में भागे हुए राजाओं को बंदी बनाना क्षत्रिय मर्यादा के अनुरूप नहीं।

इस टिप्पणी को सुनकर चेंगुट्टुवन क्रोधित हो उठा। (दिक्षितार का मत है कि इसे अप्रत्यक्ष रूप से चेंगुट्टुवन की शक्ति की प्रशंसा के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।)

क्या हुआ?

ब्राह्मण मादलन ने क्रोधित राजा को कैसे शांत किया?

  • उसे युद्ध जारी रखने के लिए उकसाया
  • उसे चुप रहने का आदेश दिया
  • कनक और विजय को दंड देने का सुझाव दिया
  • जीवन की नश्वरता और पूर्वजन्म-पुनर्जन्म का स्मरण कराकर, युद्ध की जगह एक यज्ञ करने का सुझाव देकर
पूरी कथा पढ़िए — यज्ञ का सुझाव

मादलन ने राजा को जीवन की नश्वरता और कर्म-सिद्धांत का स्मरण कराया।

उसने युद्ध की जगह एक यज्ञ करने का सुझाव दिया — राजा ने यह सलाह मान ली।

तथ्य

कन्नगी की मूर्ति को किस नाम से पूजित बताया गया है?

  • देवी मदुरापति
  • पत्तिनी
  • देवी कोर्रवै
  • देवी मीनाक्षी
पूरी कथा पढ़िए — नया नाम, नई पूजा

मूर्ति में ढलने के बाद कन्नगी पत्तिनी नाम से पूजित हुई।

वंजि नगर में विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा-समारोह हुआ।

ऐसा क्यों?

गजबाहु-तुल्यकालिकता का ऐतिहासिक महत्व क्या है?

  • क्योंकि गजबाहु ने काव्य पर टीका लिखी
  • क्योंकि गजबाहु ने चेंगुट्टुवन को पराजित किया
  • चूँकि गजबाहु का समय इतिहास से कुछ हद तक जाना जाता है, विद्वान इस दृश्य से चेंगुट्टुवन और काव्य के रचनाकाल का अनुमान लगाने का प्रयास करते हैं
  • इसका कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है
पूरी कथा पढ़िए — रचनाकाल का सुराग

प्राण-प्रतिष्ठा-समारोह में गजबाहु की उपस्थिति का उल्लेख काव्य में स्पष्ट है।

चूँकि गजबाहु का समय इतिहास से कुछ हद तक जाना जाता है, यह दृश्य काव्य के रचनाकाल के अनुमान का आधार बनता है — पर यह अनुमान भी विवादित है, जैसा अध्याय 1 में बताया गया।

तथ्य

प्राण-प्रतिष्ठा-समारोह में उपस्थित राजाओं ने देवी से क्या माँगा?

  • अधिक धन
  • चेंगुट्टुवन के विरुद्ध सहायता
  • कुछ नहीं माँगा, केवल दर्शन किए
  • कि देवी अपने-अपने राज्यों को भी कृपादृष्टि दें
पूरी कथा पढ़िए — कृपा की प्रार्थना

कनक, विजय, कोंगु का शासक, मालवा का राजा, और गजबाहु — सब उपस्थित थे।

उन्होंने देवी से प्रार्थना की कि वे अपने-अपने राज्यों को भी कृपादृष्टि दें।

तथ्य

परंपरा से कवि सत्तनार किस अन्य महाकाव्य के रचयिता माने जाते हैं?

  • मणिमेकलै, कोवलन-माधवी की बेटी की कथा
  • रामायण
  • महाभारत
  • शिवपुराण
पूरी कथा पढ़िए — अगली कथा के रचयिता

सत्तनार, जिन्होंने स्वयं मदुरै में यह सब देखा था, परंपरा से मणिमेकलै के रचयिता माने जाते हैं।

यह काव्य कोवलन-माधवी की बेटी मणिमेकलै की कथा है — सिलप्पदिकारम् की अगली कड़ी।