
अध्याय ५
मदुरै की राह
कन्नगी के पास लौटकर, निर्धन हो चुके कोवलन ने उसे क्षमा माँगी — कन्नगी ने बिना उलाहना दिए उसे स्वीकार किया, और दोनों मदुरै की ओर निकल पड़े
लौटना
माधवी से अलग होकर कोवलन कन्नगी के पास लौटा — अपना धन गँवा चुका, पछतावे से भरा। उसने कहा — "मैं अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ नहीं रहा, मैंने तुम्हें, जो आयु में छोटी पर बुद्धि में मुझसे बड़ी हो, अपमानित किया। मुझे लगता था कि मैं ग़लत नहीं कर रहा।"
कन्नगी ने उत्तर दिया — "यद्यपि मैं धर्म-पालन करने वालों को दान न दे सकी, ब्राह्मणों का सम्मान न कर सकी, अतिथियों का सत्कार न कर सकी जैसा हमारे कुल को शोभा देता — फिर भी, यद्यपि तुम मार्ग से भटके, मैं धर्म के मार्ग पर बनी रही, इसीलिए मैंने तुम्हारे साथ चलना चुना।" उसने कोई उलाहना नहीं दिया, कोई शर्त नहीं रखी।
मादलन का साक्ष्य, मादरी की शरण
रास्ते में उन्हें जैन तपस्विनी कावुंदी अडिगल मिलीं, जो उनके साथ मदुरै तक चलीं। नगर के बाहरी इलाक़े में एक ब्राह्मण, मादलन, से भेंट हुई — जिसने कोवलन के पिछले सुकृत्यों का विस्तार से वर्णन किया — एक उन्मत्त हाथी से एक ब्राह्मण को बचाना, एक स्त्री के ऋण-भार को चुकाना, एक झूठे आरोप में फँसे व्यक्ति की जान के बदले अपनी जान देने की पेशकश करना। यह सुनकर लगता है कि कोवलन के भीतर उदारता और साहस दोनों थे, भले ही वह माधवी के मोह में भटक गया हो।
कावुंदी अडिगल ने कन्नगी को गोपालिन मादरी के घर शरण दिलाई, जिसकी बेटी ऐयै कन्नगी की सखी बनी। मादरी के घर में कन्नगी ने अपने हाथों से भोजन बनाकर कोवलन को खिलाया — कृष्ण और नप्पिन्नै की तरह उपमित एक सादा, आत्मीय दृश्य। भोजन के बाद कोवलन ने कहा — "मैं तुम्हारी एक पायल लेकर बाज़ार जाता हूँ, उसे बेचकर लौटूँगा। तब तक धीरज रखो।"
स्रोत: तमिल पंचकाव्य — सिलप्पदिकारम् (परंपरा से इलंगो अडिगल रचित), मदुरै की राह