
अध्याय १०
पत्तिनी
आज भी केरल और श्रीलंका में पत्तिनी की पूजा होती है — एक तमिल काव्य से निकली देवी, जो सदियों बाद भी लोगों को जोड़े हुए है
केरल और श्रीलंका में पत्तिनी
आगे की शताब्दियों में कन्नगी/पत्तिनी की पूजा तमिलनाडु से बाहर भी फैली। केरल में पुराने चेर-राजधानी क्षेत्र के कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर की एक स्थानीय परंपरा कन्नगी से जुड़ी बताई जाती है। श्रीलंका में सिंहली बौद्ध और तमिल, दोनों समुदाय पत्तिनी की पूजा करते आए हैं — पूर्वी प्रांत में साठ से अधिक "कन्नगी अम्मन कोविल" (मंदिर) हैं। श्रीलंकाई परंपरा यह भी कहती है कि गजबाहु स्वयं पत्तिनी की एक पायल लेकर लंका लौटे और वहाँ एक मंदिर बनवाया — पर कुछ विद्वान इसके विपरीत यह भी मानते हैं कि यह पूजा-परंपरा तेरहवीं शताब्दी में शुरू हुई और गजबाहु की कथा बाद में इसे वैधता देने के लिए जोड़ी गई। मणिमेकलै — कोवलन और माधवी की बेटी की कथा — को इस काव्य की अगली कड़ी माना जाता है। यह कथा दोनों मत खुलकर सामने रखती है, किसी एक का पक्ष नहीं लेती।
आधुनिक स्मृति
बीसवीं शताब्दी में कन्नगी की कथा तमिल पहचान की राजनीति से भी जुड़ी — 1942 की फ़िल्म *कन्नगी*, 1964 की फ़िल्म *पूम्पुहार* जिसकी पटकथा एम. करुणानिधि ने लिखी, जयमोहन का उपन्यास *कोत्रवई* (2005), और अमृतलाल नागर का हिंदी उपन्यास *सुहाग के नूपुर* (1960)। चेन्नई के मरीना बीच पर कन्नगी की प्रतिमा 2001 में हटाई गई। सरकार ने क्षतिग्रस्त पेडेस्टल और सुरक्षा/यातायात संबंधी कारण दिए; विपक्ष ने इस स्पष्टीकरण को चुनौती दी और राजनीतिक तथा ज्योतिषीय कारणों के आरोप भी लगाए। 3 जून 2006 को प्रतिमा उसी मरीना स्थल पर फिर स्थापित की गई।
एक सतर्क श्रद्धांजलि
सिलप्पदिकारम् की तुलना अक्सर तमिल साहित्य की आधारभूत शास्त्रीय कृतियों के रूप में यूनानी *इलियड* और *ओडिसी* जैसी महाकाव्य परंपराओं से की जाती है। पर यह कथा अपनी पूरी जटिलता के साथ ही याद रखने लायक़ है — एक स्त्री जो अपने पति की मृत्यु पर एक पूरा नगर भस्म कर देती है; एक परंपरागत रचयिता जिसका धर्म विवादित है; एक इतिहास जो अभी भी अपनी सही तिथि नहीं जानता। यही जटिलता इसे केवल एक वीरगाथा नहीं, बल्कि एक ऐसी कथा बनाती है जो आज भी बहस और श्रद्धा दोनों को जन्म देती है।
स्रोत: तमिल पंचकाव्य — सिलप्पदिकारम् (परंपरा से इलंगो अडिगल रचित), पत्तिनी