अधूरा मंत्र, तीन हाथ — विक्रम और बेताल, चित्र

अध्याय ९

अधूरा मंत्र, तीन हाथ

एक जुआरी ब्राह्मण-पुत्र जो अपने मंत्र में सफल नहीं हुआ, और एक राजा जिसके पिंडदान पर गया की नदी से तीन हाथ उठे — बेताल ने पूछा, ऐसा क्यों, और पिंड किसे?

अधूरा मंत्र, तीन हाथ — विक्रम और बेताल का अध्याय ९। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 17 और 18। इसमें २ दृश्य हैं — सत्रहवीं कहानी: गुणाकर और अधूरा मंत्र; अठारहवीं कहानी: धनवती की बेटी और चोर — और अंत में १० सवाल।

सत्रहवीं कहानी: गुणाकर और अधूरा मंत्र

विक्रम बेताल को फिर पेड़ से उतारकर कंधे पर रखकर चला, तो बेताल बोला, 'राजन्, सत्रहवीं कहानी सुन।'

उज्जैन में राजा महासेन राज करता था। उसी नगर में देवशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसके बेटे का नाम गुणाकर था। गुणाकर बड़ा भारी जुआरी निकला; उसने जुए में ब्राह्मण का सारा धन हार दिया। तब घर के सब लोगों ने उसे घर से निकाल दिया। और कोई सहारा न रहा तो वह नगर छोड़कर चल पड़ा, और कई दिन बाद एक दूसरे नगर में पहुँचा। वहाँ उसने एक साधु को आग के सामने बैठे धुआँ पीकर तप करते देखा। उसने साधु को प्रणाम किया और पास बैठ गया। साधु ने पूछा, 'कुछ खाएगा?' उसने कहा, 'महाराज, आप दें तो ज़रूर खाऊँगा।' साधु एक खोपड़ी में खाना भरकर ले आया। देखकर गुणाकर बोला, 'मैं इस खोपड़ी में खाना नहीं खाऊँगा।'

जब उसने खाना नहीं खाया, तो साधु ने ऐसा मंत्र पढ़ा कि एक अप्सरा हाथ जोड़े सामने आकर बोली, 'महाराज, जो आज्ञा दें, मैं पूरी करूँगी।' साधु ने कहा, 'इस ब्राह्मण को जो भोजन चाहिए, दो।' अप्सरा ने एक सुंदर महल बना दिया, उसमें सब सुख-सुविधा जुटाई, गुणाकर को वहाँ ले गई और चौकी पर बिठाकर तरह-तरह के पकवान थालों में सामने रखे। उसने मन भरकर खाया। फिर अप्सरा ने पान का डिब्बा आगे रखा, गुलाबजल में केसर और चंदन घिसकर उसकी देह पर लगाया, इत्र में बसे कपड़े पहनाए, फूलों की माला डाली, और रात उसने उसी आनंद में बिताई।

सवेरा हुआ तो अप्सरा अपने स्थान चली गई, और गुणाकर साधु के पास आकर बोला, 'गुरुजी, वह तो चली गई, अब मैं क्या करूँ?' साधु ने कहा, 'वह विद्या के बल से आई थी, जिसके पास विद्या होती है उसी के पास रहती है।' उसने कहा, 'गुरुजी, वह विद्या मुझे भी सिखाइए, मैं साधूँगा।' साधु ने उसे मंत्र दिया और कहा, 'चालीस दिन आधी रात को पानी में बैठकर स्थिर मन से इसका जाप करना।' गुणाकर रोज़ जाप करने जाता। तरह-तरह की भयानक चीज़ें दिखाई देतीं, पर वह किसी से नहीं डरा। चालीस दिन पूरे होने पर वह साधु के पास आया और बोला, 'गुरुजी, जितने दिन आपने कहे थे, मैंने जाप कर लिया।' साधु ने कहा, 'अब इतने ही दिन आग में बैठकर जाप कर।' उसने कहा, 'गुरुजी, पहले मैं घर वालों से मिल आऊँ, फिर लौटकर जाप करूँगा।'

यह कहकर वह घर गया। उसे देखकर रिश्तेदार गले लगकर रोने लगे। पिता बोला, 'बेटा गुणाकर, इतने दिन तू कहाँ रहा? घर को क्यों भूल गया? कहा गया है कि जो पतिव्रता पत्नी को छोड़कर अलग रहे, अपने पर प्रेम रखने वाली की परवाह न करे, वह नीचों में भी नीच है। गृहस्थ-धर्म के बराबर कोई धर्म नहीं, और घर की स्त्री जितना सुख कोई नहीं देता। जो माता-पिता का अपमान करते हैं, वे पापी हैं और उनकी कभी मुक्ति नहीं होती।'

गुणाकर ने कहा, 'यह देह माँस और रक्त की बनी है, जो कीड़ों का भोजन है। एक दिन भी इसकी सँभाल न करो तो बदबू आने लगती है। जो इससे मोह करते हैं वे मूर्ख हैं, और जो इसमें मन नहीं लगाते वे ज्ञानी। यह बार-बार जन्मती और मरती है, इसका क्या भरोसा! कितना भी धोओ, मिट्टी का घड़ा भीतर की गंदगी से साफ़ नहीं होता, और कोयला कितना भी धोओ, सफ़ेद नहीं होता। कौन किसका पिता, कौन किसकी माता, कौन किसकी पत्नी, कौन किसका भाई? संसार की रीत यही है कि बहुत से आते हैं और बहुत से चले जाते हैं। मैं गृहस्थी के ये काम नहीं करूँगा, ध्यान साधूँगा।' यह कहकर वह घर वालों से विदा लेकर साधु के पास लौटा और आग में बैठकर मंत्र जपा। अप्सरा नहीं आई। वह साधु के पास गया तो साधु ने पूछा, 'विद्या सधी?' उसने कहा, 'गुरुजी, नहीं सधी।'

कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, उसे विद्या क्यों नहीं सधी?' राजा ने कहा, 'साधने वाले का मन दो जगह था, इसलिए नहीं सधी। कहा गया है कि मंत्र एक-मन से सधता है, और जिसका मन बँटा हो, उसे नहीं सधता।' बेताल ने पूछा, 'आग में बैठकर जो साधना करे, उसे दुचित्ता कैसे कहें?' राजा ने कहा, 'जब वह घरवालों से मिलने गया, तब साधु ने मन में खीझकर सोचा कि ऐसे डगमगाने वाले को मैंने विद्या क्यों सिखाई। इसी कारण नहीं सधी। और कहा भी है कि आदमी कितना भी ज़ोर लगाए, भाग्य उसके साथ चलता है।' यह सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा उसे उतारकर बाँधकर कंधे पर रखकर चल पड़ा।

अठारहवीं कहानी: धनवती की बेटी और चोर

चलते-चलते बेताल ने कहा, 'राजन्, अठारहवीं कहानी सुन।'

कुबलपुर नाम के नगर में राजा सुदक्षि राज करता था। वहीं धनाक्षि नाम का एक व्यापारी रहता था, जिसकी बेटी का नाम धनवती था। उसने उसे बचपन में ही गौरीदत्त नाम के व्यापारी से ब्याह दिया। कुछ समय बाद धनवती को एक बेटी हुई, जिसका नाम उसने मोहिनी रखा। जब वह कुछ बरस की हुई तो उसके पिता की मृत्यु हो गई, और गौरीदत्त के रिश्तेदारों ने उसकी सारी संपत्ति छीन ली। असहाय धनवती रात के अँधेरे में बेटी को लेकर घर से निकली और अपने मायके की ओर चल पड़ी।

थोड़ी दूर जाकर वह रास्ता भटक गई और एक श्मशान में जा पहुँची, जहाँ एक चोर सूली पर चढ़ा था। अनजाने में उसका हाथ चोर के पैर से छू गया। चोर चिल्लाया, 'अभी किसने मुझे दुख दिया?' धनवती ने कहा, 'मैंने जान-बूझकर दुख नहीं दिया, मेरा अपराध क्षमा करो।' चोर बोला, 'कोई किसी को न दुख देता है, न सुख। जैसा विधाता तय करे, वैसा हर आदमी पाता है। जो कहते हैं कि मैंने यह किया, वे बड़े नासमझ हैं। आदमी भाग्य की डोर से बँधा है, वह जहाँ चाहे खींच ले जाती है।'

धनवती ने पूछा, 'भाई, तुम कौन हो?' उसने कहा, 'मैं चोर हूँ, आज सूली पर मेरा तीसरा दिन है और प्राण नहीं निकलते।' उसने पूछा, 'क्यों?' चोर बोला, 'मैं कुँवारा हूँ। तुम अपनी बेटी मुझे ब्याह दो तो मैं तुम्हें एक करोड़ मोहरें दूँगा।' कहा गया है कि लालच सब बुराइयों की जड़ है। आख़िर लालच में आकर धनवती बेटी देने को तैयार हो गई। उसने कहा, 'मैं चाहती हूँ कि तुम्हारा बेटा हो, पर यह कैसे हो?' चोर ने कहा, 'जब यह जवान हो, तब किसी सुंदर ब्राह्मण को पाँच सौ मोहरें देकर इसके पास भेज देना, उससे पुत्र होगा।'

यह सुनकर धनवती ने सूली के चारों ओर चार फेरे दिलाकर बेटी का ब्याह उससे कर दिया। चोर ने कहा, 'यहाँ से पूरब में एक बड़ा पक्का कुआँ है, उसके पास एक बरगद का पेड़ है। उसके नीचे मोहरें गड़ी हैं, जाकर ले लो।' यह कहकर वह मर गया। धनवती वहाँ गई, गड़ी हुई कुछ मोहरें निकालीं और अपने माता-पिता के घर आई। सब बात उन्हें बताई, फिर उन्हें साथ लेकर अपने पति के नगर लौटी। वहाँ बड़ा घर बनवाया और रहने लगी, और लड़की दिन-दिन बड़ी होने लगी।

जब वह जवान हुई, तो एक दिन अपनी सहेली के साथ छत पर खड़ी रास्ता देख रही थी कि एक जवान ब्राह्मण उधर से गुज़रा। वह उसे देखते ही मोहित हो गई और बोली, 'सखी, इस आदमी को मेरी माँ के पास ले आ।' सहेली उसे माँ के पास ले आई। माँ ने कहा, 'ब्राह्मण, मेरी बेटी जवान है; पुत्र के लिए तू उसके साथ रहे तो मैं तुझे सौ मोहरें दूँगी।' उसने कहा, 'ठीक है।' उसे भोजन कराया गया, और कुछ समय बाद लड़की गर्भवती हुई। समय पूरा होने पर उसे एक बेटा हुआ।

छठी रात को माँ ने सपने में एक जटाधारी साधु देखा, जिसके माथे पर चाँद चमक रहा था, देह पर भभूत लगी थी, कंधे पर जनेऊ था, गले में सफ़ेद साँपों की माला और खोपड़ियों की लड़ी थी, एक हाथ में खोपड़ी और दूसरे में त्रिशूल था। उसने डरावने रूप में कहा, 'कल आधी रात को एक टोकरी में हज़ार मोहरों की थैली रखकर इस बालक को उसमें रखना और टोकरी राजमहल के फाटक पर छोड़ आना।' माँ की आँख खुल गई। सवेरे उसने सब बात अपनी माँ से कही। अगले दिन उसकी माँ ने ठीक वैसा ही किया और बालक को टोकरी में रखकर राजा के फाटक पर छोड़ आई।

उधर महल में राजा ने भी सपना देखा: दस भुजाओं और पाँच सिरों वाला एक रूप, हर सिर में तीन आँखें और माथे पर चाँद, हाथ में त्रिशूल। उसने कहा, 'राजन्, तेरे द्वार पर एक टोकरी रखी है, उसमें जो बालक है उसे ले आ। वही तेरा राज सँभालेगा।' राजा की आँख खुली। उसने रानी को सब बताया, फिर उठकर द्वार पर आया। टोकरी खोलकर देखी तो उसमें एक बालक और हज़ार मोहरों की थैली थी। राजा ने बालक को ख़ुद उठाया, थैली अंदर लाने को कहा, और बालक को रानी की गोद में रख दिया।

सवेरा हुआ तो राजा ने ज्योतिषियों और पंडितों को बुलाकर पूछा, 'इस बालक में राजा के क्या लक्षण दिखते हैं?' उनमें से एक ने, जो शरीर के चिह्न पढ़ना जानता था, कहा, 'महाराज, बालक में तीन लक्षण साफ़ हैं: चौड़ी छाती, ऊँचा माथा और बड़ा मुख। मनुष्य के जो बत्तीस लक्षण गिने जाते हैं, वे सब इसमें हैं। आप चिंता न करें, यह राज करेगा।' राजा प्रसन्न हुआ। उसने अपने गले से मोतियों की माला उतारकर उस ब्राह्मण को दी, सब ब्राह्मणों को बड़े दान दिए और बालक का नाम रखवाया। ज्योतिषी ने शुभ घड़ी देखकर बालक का नाम हरदत्त रखा। वह दिन-दिन बढ़ता गया। नौ बरस की उम्र तक उसने छह शास्त्र और चौदह विद्याएँ पढ़ लीं और बड़ा विद्वान हो गया। इसी बीच विधि की इच्छा से राजा-रानी की मृत्यु हो गई, और हरदत्त सिंहासन पर बैठकर न्याय से राज करने लगा।

कई बरस बाद एक दिन राजा ने मन में सोचा, 'मैंने अपने माता-पिता के लिए क्या किया, जिनके घर मैंने जन्म लिया? जो श्रद्धा के बिना और घमंड से श्राद्ध और पिंडदान करते हैं, उन्हें कुछ फल नहीं मिलता, और उनके पितर अधूरी इच्छाएँ लिए चले जाते हैं।' यह सोचकर उसने ठान लिया कि पितरों का श्राद्ध करे। राजा हरदत्त गया पहुँचा, पितरों के नाम पुकारे और फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने लगा, तब नदी से तीन हाथ ऊपर निकले। यह देखकर वह परेशान हुआ कि किस हाथ को पिंड दे और किसे नहीं।

कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, पिंड तीनों में से किसे देना ठीक था?' राजा ने कहा, 'चोर को।' बेताल ने पूछा, 'क्यों?' राजा बोला, 'ब्राह्मण का बीज ख़रीदा हुआ था, और राजा ने हज़ार मोहरें लेकर बालक को पाला था, इसलिए इन दोनों का पिंड पर कोई हक़ नहीं बनता।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा उसे उतारकर बाँधकर कंधे पर रखकर चल पड़ा।

टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अनुवाद) की कथा 17 और 18 से लिखा गया है। कथा 18 में पाठ बाल-विवाह और धन देकर पुत्र पाने का वर्णन करता है, जो आज की दृष्टि से कठिन है; यहाँ इसे केवल कथा-क्रम भर के लिए, बिना ब्योरे के, कहा गया है। कथा 17 में अप्सरा के साथ बिताई रात का वर्णन पाठ में विस्तार से है; यहाँ छोड़ दिया गया है। नाम पाठ के रूप में हैं: महासेन, देवशर्मा, गुणाकर, धनवती, मोहिनी, हरदत्त, सुदक्षि।

स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, अधूरा मंत्र, तीन हाथ

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

गुणाकर कौन था और उसका घर कैसे छूटा?

  • एक व्यापारी का बेटा, जो समुद्र में सब गँवा बैठा
  • राजा महासेन का मंत्री, जिसे राज से निकाला गया
  • देवशर्मा ब्राह्मण का बेटा, जिसने जुए में पिता का सारा धन हार दिया और घर वालों ने उसे निकाल दिया
  • एक साधु का चेला, जिसने गुरु से झगड़ा किया
पूरी कथा पढ़िए — घर से निकाला गया

वह उज्जैन का रहने वाला था।

उसकी लत जुए की थी।

क्या हुआ?

साधु ने खोपड़ी में खाना दिया तो गुणाकर ने क्या किया, और फिर क्या हुआ?

  • उसने उसमें खाने से मना कर दिया, तो साधु ने मंत्र पढ़कर एक अप्सरा बुला दी जिसने महल बनाकर उसे भोजन कराया
  • उसने चुपचाप खा लिया
  • वह डरकर भाग गया
  • साधु ने उसे घर लौटा दिया
पूरी कथा पढ़िए — मंत्र की अप्सरा

साधु ने अप्सरा से कहा कि ब्राह्मण को जो चाहिए, दो।

सवेरा होते ही अप्सरा चली गई।

क्या हुआ?

चालीस दिन पानी में जाप के बाद साधु ने क्या कहा, और गुणाकर ने क्या किया?

  • साधु ने कहा कि अब विद्या सिद्ध हुई
  • साधु ने उसे घर भेज दिया
  • गुणाकर ने साधना छोड़ दी
  • साधु ने कहा कि अब इतने ही दिन आग में बैठकर जाप कर, और गुणाकर ने कहा कि पहले घर वालों से मिल आऊँ
पूरी कथा पढ़िए — बीच में घर

चालीस दिन आधी रात को पानी में बैठकर जाप हुआ था।

गुणाकर किसी भयानक चीज़ से नहीं डरा।

पहेली

बेताल ने पूछा कि विद्या क्यों नहीं सधी। विक्रम ने क्या कहा?

  • अप्सरा रूठ गई थी
  • साधने वाले का मन दो जगह था, इसलिए नहीं सधी
  • साधु ने मंत्र ग़लत सिखाया था
  • आग बहुत गर्म थी
पूरी कथा पढ़िए — दुचित्ता मन

बेताल ने पूछा कि आग में बैठने वाले को दुचित्ता कैसे कहें।

विक्रम ने कहा कि घर जाने पर साधु खीझ गया था।

तथ्य

धनवती रात के अँधेरे में घर से क्यों निकली?

  • पति की मृत्यु के बाद उसके रिश्तेदारों ने सारी संपत्ति छीन ली थी, और वह बेटी को लेकर मायके चली
  • उसे सपने में देवी ने बुलाया था
  • वह तीर्थ को जा रही थी
  • राजा ने उसे निकाला था
पूरी कथा पढ़िए — विधवा माँ और बेटी

बेटी का नाम मोहिनी था।

रास्ते में वह भटक गई।

क्या हुआ?

श्मशान में सूली पर चढ़े चोर ने धनवती से क्या माँगा, और बदले में क्या देने को कहा?

  • वह छुड़ाने को कहता रहा
  • राजा तक संदेश, और बदले में माफ़ी
  • पानी, और बदले में आशीर्वाद
  • बेटी से ब्याह, और बदले में एक करोड़ मोहरें; धनवती लालच में मान गई
पूरी कथा पढ़िए — चोर का सौदा

वह अब तक कुँवारा था।

मोहरें पूरब के बरगद के नीचे गड़ी थीं।

क्या हुआ?

छठी रात को धनवती की बेटी को सपने में क्या आदेश मिला, और अगले दिन क्या हुआ?

  • कि बालक को नदी में छोड़ दे
  • कि टोकरी में हज़ार मोहरों की थैली रखकर बालक को राजमहल के फाटक पर छोड़ आए, और ठीक वैसा ही किया गया
  • कि बालक को नाना के घर भेज दे
  • कि बालक को ब्राह्मण को सौंप दे
पूरी कथा पढ़िए — दो सपने

उसी रात राजा ने भी सपना देखा।

राजा ने सुबह फाटक पर टोकरी पाई।

क्या हुआ?

पिंडदान के समय गया में क्या हुआ?

  • नदी सूख गई
  • पितर साक्षात् आ खड़े हुए
  • फल्गु नदी से तीन हाथ निकले, और राजा उलझन में पड़ा कि पिंड किसे दे
  • राजा के हाथ से पिंड गिर गया
पूरी कथा पढ़िए — तीन हाथ

राजा का नाम हरदत्त था।

वह माता-पिता के लिए पिंडदान करने आया था।

पहेली

तीन हाथों में से पिंड किसे देना ठीक था? विक्रम ने क्या कहा?

  • राजा को पालने वाले पुराने राजा को
  • उस ब्राह्मण को, जिसने बालक को जन्म दिया
  • तीनों को बराबर
  • चोर को, क्योंकि ब्राह्मण का बीज ख़रीदा हुआ था और राजा ने हज़ार मोहरें लेकर बालक पाला, इसलिए इन दोनों का पिंड पर हक़ नहीं बनता
पूरी कथा पढ़िए — तीन दावेदार

वे तीन थे: जन्म देने वाला, पालने वाला, और ब्याहा हुआ पति।

विक्रम ने कहा कि बाक़ी दो का हक़ ख़रीद-फ़रोख़्त से कट जाता है।

व्याख्या

इस कथा के पिता-प्रश्न को कैसे पढ़ना ठीक है, हमारे पठन में?

  • एक ऐसे सवाल की तरह कि पिता किसे कहें: जिसने जन्म दिया, जिसने पाला, या जिसने ब्याह की रीति से पत्नी और पुत्र पर अधिकार पाया
  • एक चोर की महिमा की तरह
  • गया तीर्थ के ख़िलाफ़ तर्क की तरह
  • राजा की मूर्खता की तरह
पूरी कथा पढ़िए — एक पठन

ग्रंथ में विक्रम सिर्फ़ इतना कहता है कि बाक़ी दो का हक़ नहीं बनता।

यह आज के पाठक का पठन है, पाठ का स्वयं का दावा नहीं।

अधूरा मंत्र, तीन हाथ के बारे में सवाल

अधूरा मंत्र, तीन हाथ (विक्रम और बेताल) में क्या होता है?

एक जुआरी ब्राह्मण-पुत्र जो अपने मंत्र में सफल नहीं हुआ, और एक राजा जिसके पिंडदान पर गया की नदी से तीन हाथ उठे — बेताल ने पूछा, ऐसा क्यों, और पिंड किसे? कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: सत्रहवीं कहानी: गुणाकर और अधूरा मंत्र; अठारहवीं कहानी: धनवती की बेटी और चोर।

विक्रम और बेताल में अधूरा मंत्र, तीन हाथ के बाद क्या आता है?

आगे सबसे गहरा प्रेम, बाघ में प्राण: तीन लोग एक ही चिता के पास पहुँचे और बेताल ने पूछा कि सबसे गहरा प्रेम किसका; फिर चार विद्वान भाइयों ने हड्डियों से बाघ खड़ा किया — सबसे बड़ा मूर्ख कौन?

अधूरा मंत्र, तीन हाथ का स्रोत क्या है?

बैताल पच्चीसी, कथा 17 और 18।