
अध्याय १
अमर फल
एक फल राजा से रानी, रानी से कोतवाल, और कोतवाल से वापस राजा तक लौट आया — और उसी से एक राजा संन्यासी हुआ, और दूसरा श्मशान की ओर चला
अमर फल — विक्रम और बेताल का अध्याय १। स्रोत: बैताल पच्चीसी, भूमिका-कथा (धारानगर, भर्तृहरि का फल, शांतशील, शिरीष का पेड़)। इसमें ५ दृश्य हैं — वह फल जो घूमकर लौट आया; सूना सिंहासन; शांतशील का फल; श्मशान की रात; कंधे पर बेताल — और अंत में १० सवाल।
वह फल जो घूमकर लौट आया
धारानगर नाम का एक नगर था, जिसका राजा गंधर्वसेन था। उसकी चार रानियाँ थीं और उनसे छह बेटे, और हर बेटा दूसरे से बढ़कर विद्वान और बलवान। कुछ समय बाद राजा चल बसा और सबसे बड़ा बेटा, शंख, राजा बना। फिर कुछ समय बाद उसके छोटे भाई विक्रम ने, बड़े भाई को मारकर, गद्दी ले ली और राज्य अच्छी तरह चलाने लगा। उसका प्रताप इतना बढ़ा कि वह पूरे भारत का राजा हो गया, और उसने एक संवत् चलाया।
(पाठ में विक्रम के गद्दी पाने का यह प्रसंग इसी तरह संक्षेप में है। आगे का सारा क़िस्सा इसी विक्रम का है।)
कुछ समय बाद विक्रम के मन में आया कि जिन देशों के नाम वह सुनता है, उन्हें स्वयं जाकर देखे। उसने राज अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपा और ख़ुद साधु का वेश बनाकर देस-देस, वन-वन घूमने निकल पड़ा।
उसी नगर में एक ब्राह्मण तप करता था। एक दिन किसी देवता ने उसे अमर कर देने वाला एक फल दिया। ब्राह्मण ने घर आकर पत्नी से कहा, 'यह फल जो खाएगा, अमर हो जाएगा। देवता ने देते समय यही बताया।' पत्नी रोने लगी। 'यह तो बड़ी मुसीबत हुई। अमर होकर हम कब तक भीख माँगते रहेंगे? इससे तो मर जाना भला, कम से कम दुनिया के दुख से छूटेंगे।' ब्राह्मण ने कहा, 'फल तो मैं ले आया, पर तुम्हारी बात सुनकर मेरी अक़्ल गुम है। अब जो तुम कहो, वही करूँगा।' पत्नी बोली, 'यह फल राजा को दे दीजिए और उसके बदले धन ले लीजिए, जिससे इस लोक का भी सुख भोगें और उस लोक का भी।'
ब्राह्मण राजा भर्तृहरि के पास गया, आशीर्वाद दिया और फल का हाल सुनाकर बोला, 'महाराज, आप यह फल लीजिए और मुझे कुछ धन दीजिए। आपके दीर्घायु होने में मेरा सुख है।' राजा ने ब्राह्मण को एक लाख रुपये देकर विदा किया। फिर वह महल में गया और जिस रानी को सबसे ज़्यादा चाहता था, उसे फल देकर बोला, 'रानी, इसे तुम खाओ। तुम अमर हो जाओगी और सदा जवान रहोगी।' रानी ने फल ले लिया, और राजा बाहर दरबार में चला गया।
उस रानी का एक चाहने वाला कोतवाल था। रानी ने वह फल उसे दे दिया। कोतवाल की एक गणिका से दोस्ती थी। उसने वह फल उसे दे दिया और उसके गुण भी बता दिए। गणिका ने सोचा कि यह फल तो राजा के योग्य है। वह फल लेकर राजा के पास पहुँची और भेंट कर दिया। राजा ने उसे बहुत-सा धन देकर विदा किया।
फल हाथ में लिए राजा सोच में डूब गया और उसका मन संसार से उचट गया। उसने कहा, 'इस संसार की नश्वर दौलत किसी काम की नहीं। इसके पीछे अंत में नरक ही हाथ आता है। इससे तो धर्म-कर्म करना और परमात्मा का स्मरण करना भला है, जिससे आगे का जीवन सुधरे।' उसने महल में जाकर रानी से पूछा, 'वह फल तुमने क्या किया?' रानी बोली, 'मैंने खा लिया।' तब राजा ने वही फल निकालकर रानी को दिखाया। रानी ने जैसे ही उसे देखा, उसके होश उड़ गए, और वह एक शब्द न बोल सकी। राजा ने बाहर आकर वह फल धुलवाया और ख़ुद खा लिया। फिर राजपाट छोड़कर वह साधु का वेश धारण करके, बिना किसी को साथ लिए और बिना किसी से बोले, जंगल की ओर चला गया।
सूना सिंहासन
विक्रम का सिंहासन ख़ाली हो गया। जब यह ख़बर इंद्र तक पहुँची तो उन्होंने धारानगर की रखवाली के लिए एक दानव भेज दिया। वह दिन-रात नगर पर पहरा देता। धीरे-धीरे देश-देश में यह बात फैल गई कि राजा भर्तृहरि राज छोड़कर चले गए हैं। विक्रम ने भी यह सुना और तुरंत अपने देश लौट आया।
आधी रात का समय था, जब वह नगर में घुसने लगा तो दानव ने ललकारा, 'कौन है तू? कहाँ जा रहा है? रुक, अपना नाम बता।' राजा ने कहा, 'मैं राजा विक्रम हूँ और अपने नगर में जा रहा हूँ। तू कौन है जो मुझे रोकता है?' दानव बोला, 'देवताओं ने मुझे इस नगर की रखवाली के लिए भेजा है। अगर तू सचमुच विक्रम है, तो पहले मुझसे लड़, फिर नगर में जा।'
विक्रम ने कमर कस ली और दानव को ललकारा। दानव भी तनकर खड़ा हुआ और कुश्ती शुरू हो गई। आख़िर राजा ने दानव को पटक दिया और उसकी छाती पर बैठ गया। तब दानव बोला, 'राजन्, तुमने मुझे पटक दिया। मैं तुम्हें जीवन-दान देता हूँ।' राजा हँस पड़ा। 'तू पागल हो गया है। किसे जीवन-दान दे रहा है? चाहूँ तो तुझे मार दूँ। तू मुझे जीवन कैसे देगा?' दानव ने कहा, 'राजन्, मैं तुम्हें मौत से बचाने वाला हूँ। पहले मेरी एक कहानी सुन लो, फिर निश्चिंत होकर पूरी धरती पर राज करना।' राजा ने उसे छोड़ दिया और ध्यान से सुनने लगा।
दानव ने कहा, 'तुम तीन पुरुष एक ही नक्षत्र, एक ही योग और एक ही क्षण में जन्मे हो। तुम राजा के घर में जन्मे, दूसरा एक तेली के घर, और तीसरा, जो साधु बना, एक कुम्हार के घर। तुम यहाँ राज कर रहे हो। तेली का बेटा पाताल का राजा था। पर वह कुम्हार का बेटा तपस्या में सिद्ध हो गया है और उसने तेली को मारकर श्मशान में शिरीष के पेड़ पर उलटा लटका दिया है और उसे बेताल बना दिया है। अब वह तुम्हें मारना चाहता है। अगर तुम उसके हाथ से बच गए, तो तुम राज करोगे। मैंने सब बता दिया। इस बारे में चूक मत करना।' इतना कहकर दानव चला गया और राजा अपने महल में गया।
सुबह राजा दरबार में आया और आम दरबार का हुक्म दिया। जितने छोटे-बड़े सेवक थे, सब आए और भेंट चढ़ाई। नगर में बाजे बजे और घर-घर नाच-गान होने लगा। इसके बाद राजा न्याय से राज करने लगा।
शांतशील का फल
कहते हैं कि एक दिन शांतशील नाम का एक साधु हाथ में फल लिए राजा के दरबार में आया। उसने फल राजा को भेंट किया, चादर बिछाई और कुछ देर वहाँ बैठा, फिर चला गया। राजा ने सोचा कि दानव ने जिसकी बात की थी, शायद वह यही हो। इसी शक में उसने फल नहीं खाया। उसने ख़ज़ांची को बुलाकर फल उसे सँभालकर रखने को दिया। साधु हर दिन इसी तरह आता और एक फल छोड़ जाता।
एक दिन राजा अपने कुछ सेवकों के साथ घुड़साल देखने गया। उसी बीच साधु भी वहीं पहुँचा और राजा को हमेशा की तरह फल दिया। राजा उसे हवा में उछाल रहा था कि अचानक वह हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरा, और एक बंदर ने उसे उठाकर तोड़ डाला। उसमें से ऐसा बढ़िया लाल निकला कि राजा और उसके सेवक उसकी चमक देखकर दंग रह गए। राजा ने साधु से पूछा, 'आपने मुझे यह लाल क्यों दिया?'
साधु बोला, 'महाराज, शास्त्र में लिखा है कि राजा, गुरु, ज्योतिषी, वैद्य और बेटी के घर ख़ाली हाथ नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इन जगहों पर भेंट के बदले फल मिलता है। एक लाल की क्या बात? मैंने जितने फल आपको दिए हैं, हर एक में एक रत्न है।' यह सुनकर राजा ने ख़ज़ांची से सारे फल मँगवाए। हर फल तोड़ा गया तो हर एक में लाल निकला। राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने जौहरी को बुलाकर लालों की जाँच करवाई, यह कहते हुए, 'साथ कुछ नहीं जाएगा, ईमानदारी ही सबसे बड़ी चीज़ है। सच-सच बताओ कि हर रत्न का मोल क्या है।'
जौहरी ने कहा, 'महाराज, आपने सच कहा। जिसकी ईमानदारी सलामत है, उसका सब कुछ सलामत है। ईमानदारी ही दोनों लोकों में साथ जाती है। सुनिए, हर रत्न रंग, जात और बनावट में बेदाग़ है। अगर मैं हर एक की क़ीमत एक करोड़ रुपये कहूँ, तो भी कम पड़ेगी। सच पूछिए तो हर रत्न एक देश के बराबर है।' राजा बहुत प्रसन्न हुआ और जौहरी को ख़िलअत देकर विदा किया। फिर उसने साधु का हाथ पकड़कर उसे सिंहासन पर बैठाया और कहा, 'मेरा पूरा राज्य इनमें से एक रत्न के बराबर भी नहीं। तब बताइए कि एक साधु होकर आपने मुझे इतने रत्न क्यों दिए?'
साधु बोला, 'महाराज, ये चीज़ें सबके सामने नहीं कही जातीं: मंत्र-तंत्र, दवा-दारू, धर्म-कर्म, घर की बात, गंदा मांस खाना और सुनी हुई बुराई। मैं आपसे अकेले में कहूँगा। नियम है कि जो बात तीन कानों में पड़ जाए वह भेद नहीं रहती; जो दो कानों में पड़े उसे कोई नहीं सुनता; और जो एक कान में पड़े, उसे ब्रह्मा भी नहीं जानते, आदमी की क्या बिसात।' राजा उसे अलग ले गया और बोला, 'महात्मन्, आपने मुझे इतने रत्न दिए और ख़ुद एक कौर भी नहीं खाया। आपने मुझे बहुत शर्मिंदा किया। बताइए आप क्या चाहते हैं?'
साधु ने कहा, 'महाराज, मैं गोदावरी के किनारे के एक बड़े श्मशान में एक अनुष्ठान करने जा रहा हूँ, जिससे मुझे सिद्धियाँ मिलेंगी। आप एक पूरी रात मेरे साथ रहिए, आपके पास रहने से मेरा साधन सफल होगा।' राजा ने कहा, 'ठीक है, मैं आऊँगा। दिन बता दीजिए।' साधु ने कहा, 'भादों के कृष्ण पक्ष के मंगलवार की शाम, हथियार बाँधकर और अकेले मेरे पास आइए।' राजा ने कहा, 'आप जाइए, मैं ज़रूर आऊँगा और अकेला आऊँगा।'
श्मशान की रात
वचन लेकर साधु मंदिर गया, तैयारियाँ कीं, सारा सामान लिया और श्मशान में जमकर बैठ गया। इधर राजा सोचता रहा। फिर वह घड़ी भी आ पहुँची। राजा ने तलवार बाँधी, कमर कसी और रात में अकेला साधु के पास पहुँचकर प्रणाम किया। साधु ने उसे बैठने को कहा। राजा ने देखा कि चारों ओर भूत-प्रेत और डाकिनियाँ तरह-तरह के डरावने रूपों में नाच रही हैं, और साधु बीच में बैठा मंत्र जप रहा है। राजा को ज़रा भी डर नहीं लगा। उसने साधु से कहा, 'मेरे लिए क्या आज्ञा है?'
साधु बोला, 'राजन्, अब जब आप आ गए हैं तो यह कीजिए: यहाँ से दो कोस दक्षिण में एक श्मशान है, जिसमें एक शिरीष का पेड़ है। उस पर एक शव लटक रहा है। उसे अभी यहाँ ले आइए, जहाँ मैं साधना कर रहा हूँगा।' राजा को वहाँ भेजकर वह ख़ुद आसन जमाकर मंत्र जपने लगा।
एक तो रात का अँधेरा ही डरावना था। ऊपर से पानी ऐसे बरस रहा था मानो आज ही बस बरस जाना हो। भूत-प्रेत ऐसा शोर कर रहे थे कि बड़े-बड़े वीर भी घबरा जाते। पर राजा चलता रहा। साँप आ-आकर उसके पैरों से लिपटते, और वह मंत्र पढ़कर उन्हें छुड़ाता जाता। आख़िर किसी तरह कठिन रास्ता पार करके वह उस श्मशान पहुँचा। वहाँ भूत आदमियों को पकड़-पकड़कर मार रहे थे, डाकिनियाँ बच्चों का कलेजा चबा रही थीं, बाघ दहाड़ रहे थे और हाथी चिंघाड़ रहे थे। पेड़ पर नज़र डाली तो देखा कि उसकी एक-एक डाल और पत्ता जड़ से चोटी तक धधक रहा है, और चारों ओर से शोर उठ रहा है, 'मार डालो! पकड़ लो! देखना, बचकर न जाए!'
राजा को ज़रा भी डर नहीं हुआ। उसने मन में कहा, 'हो न हो, यह वही साधु है जिसकी बात दानव ने बताई थी।' पास जाकर देखा तो एक शव रस्सी से बँधा उलटा लटक रहा था। शव को देखकर वह खुश हुआ कि उसकी मेहनत ठिकाने लगी। उसने तलवार और ढाल सँभाली, निडर होकर पेड़ पर चढ़ा और ऐसा वार किया कि रस्सी कट गई और शव नीचे आ गिरा। गिरते ही वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उसकी आवाज़ सुनकर राजा प्रसन्न हुआ कि चलो, यह तो ज़िंदा है। उसने उतरकर पूछा कि तू कौन है। यह सुनते ही शव ठहाका मारकर हँस पड़ा। राजा अचरज में पड़ गया। फिर शव उछलकर पेड़ पर चढ़ गया और उलटा लटक गया। राजा भी उसी क्षण चढ़ गया और उसे बग़ल में दबाकर नीचे उतार लाया। 'दुष्ट, बता तू कौन है।' शव ने कोई जवाब नहीं दिया। राजा ने सोचा, 'शायद यह वही तेली है जिसे साधु ने श्मशान में रखा है।' यह सोचकर उसने उसे अपनी चादर में बाँधा और साधु के पास ले चला। जो ऐसा साहस दिखाता है, वह अपने काम में ज़रूर सफल होता है।
कंधे पर बेताल
तब कंधे पर लदे बेताल ने कहा, 'तू कौन है, और मुझे कहाँ ले जा रहा है?' राजा ने कहा, 'मैं राजा विक्रम हूँ और तुझे एक साधु के पास ले जा रहा हूँ।' बेताल बोला, 'मैं एक शर्त पर चलूँगा। रास्ते में अगर तूने एक शब्द भी कहा, तो मैं सीधा लौट जाऊँगा।' राजा ने शर्त मान ली और चल पड़ा।
तब बेताल ने कहा, 'राजन्, जो विद्वान, समझदार और बुद्धिमान हैं, उनके दिन गीत और शास्त्र के सुख में बीतते हैं, और मूर्खों के दिन विलास और नींद में। इसलिए यह लंबा रास्ता किसी काम की बात सुनकर कटे, यही अच्छा है। राजन्, मैं एक कहानी सुनाता हूँ, ध्यान से सुन।'
टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अंग्रेज़ी अनुवाद) से सीधे लिखा गया है। इस रूप में राजा का नाम विक्रम (बीर विक्रमाजीत) है, नगर धारानगर है और साधु का नाम शांतशील; सोमदेव के कथासरित्सागर में राजा त्रिविक्रमसेन है, नगर प्रतिष्ठान है और साधु क्षांतिशील। इस अध्याय में पाठ की दो बातें जान-बूझकर संक्षेप में हैं या छोड़ी गई हैं: विक्रम के गद्दी पाने का (भाई के वध वाला) ब्योरा केवल एक वाक्य में है, और दानव की सुनाई पुराने जन्म की कथा (गणिका और उलटे लटके साधु वाली) पूरी छोड़ दी गई है। रानी के प्रेम-संबंध का ज़िक्र ग्रंथ में है, उसे यहाँ तथ्य की तरह कहा गया है, उसका विस्तार नहीं। नाम पाठ के रूप में हैं: गंधर्वसेन, शंख, विक्रम, भर्तृहरि, शांतशील, धारानगर।
स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, अमर फल