
अध्याय १२
अनुत्तरित पहेली, साधु का अंत
आख़िरी कहानी की पहेली का जवाब विक्रम को नहीं सूझा, और तभी बेताल ने उसे साधु शांतशील की असली चाल बता दी — श्मशान की रात कैसे ख़त्म हुई?
अनुत्तरित पहेली, साधु का अंत — विक्रम और बेताल का अध्याय १२। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 25 और समापन। इसमें २ दृश्य हैं — पच्चीसवीं कहानी: दो राजकुमारियाँ, दो राजा; बेताल की चेतावनी — और अंत में १० सवाल।
पच्चीसवीं कहानी: दो राजकुमारियाँ, दो राजा
विक्रम बेताल को फिर पेड़ से उतारकर कंधे पर रखकर चला, तो बेताल बोला, 'राजन्, पच्चीसवीं और आख़िरी कहानी सुन।'
दक्षिण में धर्मपुर नाम का नगर था, जिसमें राजा महाबल राज करता था। एक बार उसी देश के दूसरे राजा ने सेना लेकर उसकी राजधानी को घेर लिया और कई दिन तक लड़ता रहा। महाबल की सेना का कुछ हिस्सा दुश्मन से जा मिला और कुछ कट गया। तब कोई चारा न देखकर राजा रात को अपनी रानी और बेटी को लेकर जंगल में निकल गया। कई कोस जंगल चलने के बाद दिन निकला और एक गाँव दिखा। राजा ने रानी और बेटी को एक पेड़ के नीचे बिठाया और ख़ुद खाने का कुछ लेने गाँव की ओर गया। इसी बीच एक टोली ने उसे घेर लिया और हथियार डालने को कहा। राजा ने तीर चलाए, उन्होंने भी चलाए, और तीन घंटे लड़ाई चली। आख़िर एक तीर राजा के माथे पर लगा और वह वहीं मारा गया।
रानी और बेटी ने राजा को मरा देखा तो रोती-पीटती जंगल की ओर लौट गईं। कई कोस चलकर थक गईं और बैठकर चिंता में डूब गईं। उसी समय राजा चंद्रसेन अपने बेटे के साथ शिकार करता उसी जंगल में आया। उसने दो पैरों के निशान देखे और बेटे से कहा, 'इस घने जंगल में इंसान के पाँव के निशान कहाँ से आए?' बेटे ने कहा, 'महाराज, ये स्त्रियों के पाँव के निशान हैं, पुरुष का पैर इतना छोटा नहीं होता।' राजा ने कहा, 'सच है, इतने कोमल पाँव पुरुष के नहीं होते।' बेटा बोला, 'अभी-अभी गई हैं।' राजा ने कहा, 'चलो, जंगल में ढूँढ़ें। मिलीं तो जिसका पैर बड़ा है, उसे मैं तुझे दूँगा और छोटे पैर वाली को ख़ुद रखूँगा।' यह शर्त करके वे आगे बढ़े और दोनों को बैठा पाया। उन्होंने उन्हें घोड़ों पर बिठाया और घर ले आए। जैसा तय हुआ था, बेटे ने रानी को अपनाया और राजा ने राजकुमारी को।
कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, इन दोनों की संतानों में आपस में क्या रिश्ता होगा?' यह सुनकर राजा चुप रह गया, क्योंकि उसे जवाब नहीं सूझा।
बेताल की चेतावनी
तब बेताल बहुत प्रसन्न होकर बोला, 'राजन्, तेरा धीरज और साहस देखकर मैं बहुत ख़ुश हुआ। मैं तुझे एक बात बताता हूँ, ध्यान से सुन। जिसके रोएँ काँटों जैसे हैं और देह लकड़ी जैसी है, जिसका नाम शांतशील है, वह तेरे नगर में आया है। उसी ने तुझे मुझे लाने भेजा है। वह ख़ुद श्मशान में अपना अनुष्ठान किए बैठा है और तुझे मारना चाहता है। मैं तुझे पहले से बता दूँ कि जब उसकी पूजा पूरी हो जाए तो वह तुझसे कहेगा, “राजन्, ऐसे प्रणाम करो कि देह के आठों अंग धरती को छुएँ।” तू कहना, “मैं राजाओं का राजा हूँ, सब राजा मुझे प्रणाम करते हैं। मैंने आज तक किसी को प्रणाम नहीं किया और मुझे आता भी नहीं। आप गुरु हैं, मुझे दिखा दीजिए कि कैसे करते हैं, तब मैं करूँगा।” जब वह झुके, तो तलवार का ऐसा वार करना कि उसका सिर कट जाए। तब तू निश्चिंत होकर राज करेगा। अगर तू ऐसा नहीं करेगा, तो वह तुझे मार डालेगा और ख़ुद राज करेगा।'
यह चेताकर बेताल उस शव में से निकलकर अपने रास्ते चला गया। रात का कुछ भाग बाक़ी था जब राजा शव को लाकर साधु के सामने रख आया। साधु उसे देखकर बहुत ख़ुश हुआ और राजा की बड़ी बड़ाई की। फिर उसने मंत्र पढ़कर शव को जिला दिया और हवन किया, दक्षिण की ओर मुँह करके बैठा और जो सामग्री जुटाई थी वह देवता को चढ़ाई, पान, फूल, धूप, दीप और प्रसाद चढ़ाया। फिर राजा से बोला, 'प्रणाम करो। तुम्हारा बड़ा यश होगा और आठों सिद्धियाँ सदा तुम्हारे घर रहेंगी।'
राजा को बेताल की बात याद आई। उसने हाथ जोड़कर बड़ी नम्रता से कहा, 'महाराज, मुझे प्रणाम करना नहीं आता। आप गुरु हैं, सिखा दीजिए तो मैं कर दूँगा।' यह सुनकर साधु सिर झुकाकर प्रणाम करने को झुका। उसी क्षण राजा ने तलवार चला दी। साधु वहीं गिरा, और बेताल ने आकर फूल बरसाए। कहा गया है कि जो दूसरे को मारने चला हो, उसे मारने में दोष नहीं।
तभी इंद्र और सब देवता राजा का साहस देखकर अपने रथों पर आए और जय-जयकार करने लगे। इंद्र ने प्रसन्न होकर कहा, 'वर माँग।' राजा ने हाथ जोड़कर कहा, 'महाराज, यह मेरी कथा संसार में प्रसिद्ध हो।' इंद्र ने कहा, 'जब तक चंद्रमा, सूर्य, पृथ्वी और आकाश हैं, यह कथा प्रसिद्ध रहेगी, और तू पूरी पृथ्वी का राजा होगा।'
यह कहकर इंद्र अपने लोक चले गए, और राजा ने उन दोनों शवों को तेल के कड़ाह में डाल दिया। तब दो वीर प्रकट हुए और बोले, 'क्या आज्ञा है?' राजा ने कहा, 'जब मैं याद करूँ, तब तुम आना।' उनसे यह वचन लेकर राजा घर लौटा और राज-काज सँभालने लगा।
टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अनुवाद) की कथा 25 और समापन से लिखा गया है। पाठ में पच्चीसवीं कथा की पहेली का उत्तर नहीं दिया गया; यहाँ भी नहीं दिया गया। राजा महाबल की मृत्यु पाठ में एक युद्ध में तीर लगने और सिर कटने के रूप में है; यहाँ उसे संयत और संक्षिप्त कहा गया है। अंत में दो शवों और दो वीरों की पहचान पाठ में स्पष्ट नहीं है, इसलिए यहाँ भी उतना ही कहा गया है जितना पाठ कहता है। नाम पाठ के रूप में हैं: महाबल, चंद्रसेन, शांतशील।
स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, अनुत्तरित पहेली, साधु का अंत