बदले हुए सिर, राजा का सेवक — विक्रम और बेताल, चित्र

अध्याय ४

बदले हुए सिर, राजा का सेवक

देवी के सामने किया वचन तोड़ने से तीन जानें गईं और जब देवी ने जिलाया तो जल्दबाज़ी में सिर आपस में बदल गए — और एक राजा ने अपनी भूखी रात का क़र्ज़ अनोखे ढंग से चुकाया

बदले हुए सिर, राजा का सेवक — विक्रम और बेताल का अध्याय ४। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 6 और 8। इसमें २ दृश्य हैं — छठी कहानी: देवी के सामने किया वचन; आठवीं कहानी: राजा और उसका सेवक — और अंत में १० सवाल।

छठी कहानी: देवी के सामने किया वचन

विक्रम ने पेड़ से बेताल को उतारा और चला, तो बेताल बोला, 'राजन्, छठी कहानी सुन।'

धर्मपुर नाम का नगर था, जिसका राजा धर्मशील था और मंत्री अंधक। एक दिन मंत्री ने कहा, 'महाराज, देवी का मंदिर बनवाइए और उसमें मूर्ति रखकर रोज़ पूजा कीजिए। शास्त्र में इसका बड़ा पुण्य बताया है।' राजा ने मंदिर बनवाया, देवी की मूर्ति रखी और वेदों की विधि से पूजा करने लगा। वह बिना पूजा किए पानी तक नहीं पीता था।

कुछ समय बाद मंत्री ने एक दिन कहा, 'महाराज, यह सुना ही होगा कि बिना बेटे का घर सूना है, मूर्ख का मन सूना है, और निर्धन की हर चीज़ सूनी है।' राजा देवी के मंदिर गया और हाथ जोड़कर बोला, 'हे देवी, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इंद्र दिन भर तुम्हारी आज्ञा की प्रतीक्षा करते हैं। तुमने महिषासुर, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे दैत्यों को मारकर पृथ्वी का भार हलका किया है। तुम्हारे भक्तों पर जहाँ भी संकट पड़ा, वहीं पहुँचकर तुमने मदद की। इसी आस से मैं तुम्हारी देहरी पर आया हूँ। मेरे मन की भी इच्छा पूरी करो।' तब मंदिर से आवाज़ आई, 'राजन्, मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। जो चाहे वर माँग।' राजा ने कहा, 'माता, अगर प्रसन्न हो तो मुझे एक बेटा दो।' देवी बोली, 'तुझे बड़ा बलवान और यशस्वी बेटा होगा।' राजा चंदन, अक्षत, फूल, धूप, दीप और भोग से पूजा करता रहा और कुछ दिन बाद उसे बेटा हुआ। राजा परिवार के साथ गाजे-बाजे से मंदिर गया और देवी की पूजा की।

उन्हीं दिनों एक धोबी अपने एक मित्र के साथ किसी नगर से इस नगर की ओर आ रहा था कि उसे देवी का मंदिर दिखाई दिया। उसने सोचा कि चलकर प्रणाम कर ले। उसी समय उसने सामने से आती एक बहुत सुंदर धोबिन की बेटी को देखा, और देखते ही मोहित हो गया। वह देवी की पूजा करने गया, प्रणाम करके हाथ जोड़े और मन में बोला, 'हे देवी, अगर तुम्हारी कृपा से इस सुंदरी से मेरा ब्याह हो जाए, तो मैं तुम्हें अपना सिर चढ़ा दूँगा।' यह वचन देकर वह मित्र को लेकर अपने नगर लौट गया।

वहाँ पहुँचकर वह विरह में इतना बेचैन हुआ कि नींद, भूख, प्यास सब भूल गया और दिन भर उसी का ख़याल करता रहता। उसकी यह हालत देखकर उसके मित्र ने उसके पिता को सारा हाल बता दिया। पिता घबराया और सोचने लगा कि अगर इसका ब्याह उस कन्या से न हुआ तो यह दुख से मर जाएगा। इसलिए उसने बेटे के मित्र को साथ लिया और उस नगर में जाकर कन्या के पिता से कहा, 'मैं आपसे कुछ माँगने आया हूँ। वचन दें तो बताऊँ।' उसने कहा, 'जो मेरे पास होगा, ज़रूर दूँगा।' तब उसने कहा, 'अपनी बेटी का ब्याह मेरे बेटे से कर दीजिए।' वह मान गया। पंडित बुलवाकर दिन, मुहूर्त और घड़ी तय हुई और उसने कहा, 'अपने बेटे को ले आइए, मैं बेटी के हाथ पीले करूँगा।' धोबी के पिता ने घर लौटकर ब्याह का सामान जुटाया और बारात के साथ पहुँचकर विवाह कराया। फिर बेटे और बहू को लेकर घर लौटा, और दोनों सुख से रहने लगे।

कुछ समय बाद कन्या के पिता के घर कोई उत्सव हुआ, तो इन्हें भी न्योता आया। पति-पत्नी तैयार हुए और मित्र को साथ लेकर उस नगर की ओर चले। पास पहुँचे तो देवी का वही मंदिर दिखा और धोबी को अपना वचन याद आ गया। वह सोचने लगा, 'मैं बड़ा झूठा और अधर्मी हूँ, मैंने देवी से ही झूठ बोला।' उसने मित्र से कहा, 'तुम यहीं रुको, मैं देवी के दर्शन करके आता हूँ।' और पत्नी से भी रुकने को कहा। वह मंदिर गया, तालाब में नहाया, देवी के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, और अपना वचन निभाते हुए अपने प्राण देवी को अर्पित कर दिए।

(पाठ में आगे ब्योरा है कि मित्र और फिर पत्नी भी उसे खोजते-खोजते मंदिर पहुँचे, और यह सोचकर कि लोग उन्हें ही दोषी ठहराएँगे और कहेंगे कि सुंदर स्त्री को पाने के लिए इसे मार डाला, उन्होंने भी अपने प्राण दे दिए। यहाँ यह ब्योरा संयत रखा गया है।) जब पत्नी भी अपनी जान देने को हुई, तो देवी सिंहासन से उतरीं, उसका हाथ पकड़ा और बोलीं, 'बेटी, तू वर माँग, मैं तुझसे प्रसन्न हूँ।' उसने कहा, 'माता, अगर प्रसन्न हो तो इन दोनों को जिला दो।' देवी ने कहा, 'इनके सिर इनके धड़ों से जोड़ दे।' ख़ुशी की हड़बड़ी में उसने सिर आपस में बदलकर जोड़ दिए। देवी ने अमृत-जल छिड़का और दोनों जी उठे। वे आपस में झगड़ने लगे। एक कहता, 'यह मेरी पत्नी है,' दूसरा कहता, 'नहीं, मेरी है।'

कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजा विक्रम, बता, वह स्त्री इन दोनों में से किसकी पत्नी हुई?' राजा ने कहा, 'सुन, इसका नियम धर्म-शास्त्र में लिखा है: नदियों में गंगा श्रेष्ठ है, पर्वतों में सुमेरु, वृक्षों में कल्पवृक्ष, और अंगों में सिर। इस नियम के अनुसार वह स्त्री उसी की पत्नी होगी जिसके धड़ पर पति का सिर है।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा ने उसे उतारकर कंधे पर रखा और चल पड़ा।

आठवीं कहानी: राजा और उसका सेवक

(सातवीं कहानी इस पुस्तक में छोड़ी गई है।) बेताल बोला, 'राजन्, अब आठवीं कहानी सुन।'

मिथिलावती नाम के नगर में गुणाधिप राजा था। एक जवान राजपूत, चिरमदेव, दूर देश से उसकी नौकरी करने आया। वह रोज़ राजा को सलाम करने जाता, पर राजा से भेंट नहीं हो पाती। इसी तरह एक बरस में उसका लाया हुआ सारा धन ख़त्म हो गया और उधर घर पर उसका घर बिखर गया।

एक दिन राजा घोड़े पर शिकार को निकला तो चिरमदेव भी उसके दल में गया। जंगल में राजा अकेला पड़ गया, बाक़ी सेवक दूसरे जंगल में भटक गए, केवल चिरमदेव घोड़ा दौड़ाते हुए पीछे चलता रहा। आख़िर उसने पुकारकर कहा, 'महाराज, सब सेवक पीछे रह गए। मैं घोड़ा आपके घोड़े के बराबर दौड़ाकर आपके साथ हूँ।' राजा ने घोड़ा रोका और वह पास पहुँचा। राजा ने उसे देखकर पूछा, 'तू इतना दुबला कैसे हो गया?'

उसने कहा, 'अगर मैं ऐसे स्वामी के पास रहूँ जो हज़ारों का पालन करता है, पर मेरी सुध नहीं लेता, तो इसमें स्वामी का दोष नहीं, मेरे भाग्य का दोष है। जैसे दिन में सारा संसार साफ़ दिखाई देता है, पर उल्लू को नहीं दिखता, तो इसमें सूरज का क्या दोष? मुझे अचरज है कि जिसने माँ के गर्भ में ही मेरा पेट भरने का इंतज़ाम किया, वह अब जन्म लेकर भोगने के लायक़ हो जाने पर मेरी सुध नहीं लेता। नहीं पता वह सोता है या मर गया। मेरी समझ से तो ज़हर पीकर मर जाना भला है, किसी बड़े आदमी से माल-धन माँगने से, जो देते हुए मुँह बिचकाता, नाक सिकोड़ता और भौंहें चढ़ाता है। छह चीज़ें आदमी को हलका बनाती हैं: बेवफ़ा से दोस्ती, बिना बात हँसी, स्त्री से झगड़ा, बुरे स्वामी की सेवा, गधे की सवारी और अशिष्ट बोली। और पाँच बातें विधाता जन्म के समय आदमी के भाग्य में लिख देते हैं: उम्र, कर्म, धन, विद्या और यश। महाराज, जब तक आदमी के गुण चमकते हैं, सब उसके सेवक रहते हैं, पर गुण घट जाएँ तो मित्र भी शत्रु हो जाते हैं। फिर भी एक बात तय है कि अच्छे स्वामी की सेवा का फल देर-सवेर मिलता ही है।'

राजा ने ये सब बातें सुनकर मन में तौलीं, पर कुछ बोला नहीं। बस इतना कहा, 'मुझे भूख लगी है, कहीं से कुछ खाने को ले आओ।' चिरमदेव ने कहा, 'महाराज, यहाँ रोटी नहीं मिलेगी।' यह कहकर वह जंगल में गया, एक हिरन मारा, जेब से चकमक निकालकर आग जलाई, मांस के टुकड़े भूने और राजा को भरपेट खिलाया और ख़ुद भी खाया। जब राजा तृप्त हो गया तो बोला, 'अब राजपूत, मुझे नगर पहुँचा दो, मुझे रास्ता नहीं मालूम।' चिरमदेव उसे सही-सलामत महल तक ले आया। राजा ने उसे नौकरी पर रखा और बहुत-से वस्त्र-आभूषण दिए। इसके बाद वह राजा के पास ही रहने लगा।

एक दिन राजा ने उसे किसी काम से समुद्र के किनारे भेजा। वहाँ उसे देवी का एक मंदिर दिखा। उसने भीतर जाकर पूजा की। जैसे ही वह बाहर निकला, पीछे से एक सुंदर कन्या आई और पूछा, 'तुम यहाँ क्यों आए हो?' उसने कहा, 'मैं सुख की खोज में आया हूँ और तुम्हारी सुंदरता देखकर मोहित हो गया।' वह बोली, 'अगर तुम्हारी कोई इच्छा है तो पहले इस तालाब में नहाकर आओ, फिर मैं तुम्हारी बात सुनूँगी।' उसने कपड़े उतारे, तालाब में डुबकी लगाई और जैसे ही बाहर निकला तो देखा कि अपने ही नगर में खड़ा है! इस अद्भुत बात से वह डर गया, लाचार होकर घर लौटा, कपड़े पहने और जाकर राजा को सारा हाल बता दिया।

राजा ने सुनते ही कहा, 'यह अचरज मुझे भी दिखाओ।' घोड़े मँगवाए गए और दोनों चल दिए। कई दिन बाद वे समुद्र के किनारे उसी मंदिर में पहुँचे और पूजा की। राजा बाहर आया तो वही कन्या अपनी एक सखी के साथ आई। राजा का रूप देखकर वह मोहित हो गई और बोली, 'महाराज, आप जो आज्ञा देंगे, मैं वही करूँगी।' राजा ने कहा, 'अगर तू मेरी आज्ञा मानेगी, तो मेरे सेवक की पत्नी बन जा।' वह बोली, 'मैं तो आपके रूप की दासी हो गई हूँ, उसकी पत्नी कैसे बनूँ?' राजा ने कहा, 'अभी तूने ही कहा था कि जो आज्ञा दूँ, मानेगी। भले लोग अपना वचन निभाते हैं। अपना वचन निभा और मेरे सेवक की पत्नी बन।' यह सुनकर वह बोली, 'आपका वचन मेरे लिए क़ानून है।' तब राजा ने बिना रीति-रस्म के उसका ब्याह अपने सेवक से कर दिया और दोनों को अपने महल ले आया।

कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, स्वामी और सेवक में किसका गुण बड़ा था?' राजा ने कहा, 'सेवक का।' बेताल बोला, 'क्या राजा का गुण बड़ा नहीं, जिसने इतनी सुंदर स्त्री पाकर अपने सेवक को दे दी?' राजा विक्रम ने कहा, 'स्वामी का काम ही है कि वह अपने सेवक का भला करे, इसमें बड़ा गुण क्या? जो अपने हित का काम होते हुए भी दूसरे का हित करता है, वही बड़ा है। इसलिए सेवक का गुण बड़ा था।' यह सुनकर बेताल कंधे से ग़ायब हो गया और राजा उसे फिर उसी पेड़ से उतारकर ले चला।

टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अनुवाद) की कथा 6 और 8 से सीधे लिखा गया है। कथा 6 में तीनों के आत्म-बलिदान का पाठ-ब्योरा छोड़ा गया है, केवल उतना दिया गया जितना कथा-क्रम के लिए ज़रूरी है। कथा 7 (जिसकी पहेली जाति से तय होती है) इस पुस्तक में नहीं ली गई। कथा 8 में कन्या का एक सेवक के लिए 'दिया जाना' पाठ में उसी रूप में है और उसकी सहमति का एक वाक्य भी; यह उस युग की दृष्टि है, इस वेबसाइट की नहीं। चिरमदेव की 'छह बातें आदमी को हलका बनाती हैं' जैसी सूक्तियाँ उसी पात्र की हैं। नाम पाठ के रूप में हैं: धर्मशील, अंधक, गुणाधिप, चिरमदेव, मिथिलावती।

स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, बदले हुए सिर, राजा का सेवक

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

धोबी ने देवी के सामने क्या वचन दिया था?

  • कि वह देवी का मंदिर बनवाएगा
  • कि वह रोज़ देवी की पूजा करेगा
  • कि अगर उसका ब्याह उस सुंदर कन्या से हो जाए तो वह अपना सिर देवी को अर्पित करेगा
  • कि वह देवी को सोना चढ़ाएगा
पूरी कथा पढ़िए — वचन की क़ीमत

उसने कन्या को मंदिर के पास आते देखा था।

उसका ब्याह होने के बाद उसे वचन याद आया।

क्या हुआ?

देवी ने कहानी में राजा धर्मशील को क्या वरदान दिया?

  • उसे बलवान और यशस्वी बेटा होने का वर दिया
  • उसे अपना सारा राज लौटाने का वर दिया
  • उसे अमर कर दिया
  • उसके मंत्री को राजा बना दिया
पूरी कथा पढ़िए — बेटे का वर

मंत्री अंधक ने मंदिर बनवाने की सलाह दी थी।

राजा बिना पूजा के पानी तक नहीं पीता था।

ऐसा क्यों?

मित्र और फिर पत्नी ने भी मंदिर में जाकर जान क्यों दे दी?

  • क्योंकि देवी ने उन्हें आदेश दिया
  • क्योंकि उन्होंने भी कोई वचन दिया था
  • क्योंकि वे धोबी से बैर रखते थे
  • क्योंकि उन्हें डर था कि लोग उन्हें ही उसकी मृत्यु का दोषी ठहराएँगे, इसलिए बदनामी से मरना उन्हें भला लगा
पूरी कथा पढ़िए — बदनामी का डर

मित्र ने सोचा कि लोग कहेंगे उसने सुंदर स्त्री पाने को उसे मार दिया।

पत्नी ने सोचा कि लोग उसे कुलटा कहेंगे।

पहेली

जिलाने में सिर आपस में बदल गए। विक्रम ने कहा कि वह स्त्री किसकी पत्नी हुई?

  • उसकी, जिसके पास उसके पति का धड़ है
  • उसकी, जिसके कंधों पर उसके पति का सिर लगा है
  • किसी की नहीं
  • उसके मित्र की, जिसने उसे बचाया
पूरी कथा पढ़िए — सिर का नियम

विक्रम ने कहा कि गंगा नदियों में श्रेष्ठ है, सुमेरु पर्वतों में, कल्पवृक्ष पेड़ों में और सिर अंगों में।

यह सुनकर बेताल फिर पेड़ पर लौट गया।

ऐसा क्यों?

देवी ने जब जिलाया तो दोनों झगड़ने क्यों लगे?

  • क्योंकि पत्नी ने ख़ुशी की हड़बड़ी में दोनों के सिर आपस में बदलकर जोड़ दिए थे
  • क्योंकि वे आपस में शत्रु थे
  • क्योंकि देवी ने वरदान कम दिया था
  • क्योंकि दोनों के पास अलग वचन थे
पूरी कथा पढ़िए — बदले हुए सिर

पत्नी ने देवी से दोनों को जिलाने का वर माँगा था।

देवी ने सिर और धड़ जोड़ने को कहा था।

तथ्य

चिरमदेव कौन था, और राजा के पास वह कैसे पहुँचा?

  • एक साधु
  • राजा का मंत्री, जिसे राजा ने पुकारा
  • एक शिकारी जिसे राजा ने बुलाया
  • एक जवान राजपूत जो दूर देश से राजा की नौकरी करने आया, पर बरस भर तक राजा से मिल न सका
पूरी कथा पढ़िए — बिना भेंट का बरस

उसका सारा लाया हुआ धन बरस भर में ख़त्म हो गया।

एक दिन वह शिकार पर राजा के साथ गया।

क्या हुआ?

जंगल में राजा को भूख लगी तो चिरमदेव ने क्या किया?

  • गाँव जाकर रोटी ले आया
  • हिरन मारकर चकमक से आग जलाई, मांस भूना और राजा को भरपेट खिलाया
  • राजा को फल लाकर दिए
  • राजा से भूखे रहने को कहा
पूरी कथा पढ़िए — भूख का सहारा

उसने कहा था कि यहाँ रोटी नहीं मिलेगी।

राजा ने बदले में उसे नौकरी और वस्त्र-आभूषण दिए।

पहेली

स्वामी और सेवक में बड़ा गुण किसका था, विक्रम के अनुसार?

  • स्वामी का
  • दोनों का बराबर
  • सेवक का
  • किसी का भी नहीं
पूरी कथा पढ़िए — दो में से एक

बेताल ने पूछा कि क्या राजा का गुण बड़ा नहीं, जिसने पाई हुई सुंदरी सेवक को दे दी।

विक्रम ने कहा कि स्वामी का काम ही सेवक का भला करना है।

ऐसा क्यों?

विक्रम ने सेवक का गुण बड़ा क्यों कहा?

  • क्योंकि सेवक उम्र में छोटा था
  • क्योंकि सेवक ने राजा की जान बचाई
  • क्योंकि सेवक ने राजा से ज़्यादा धन कमाया
  • क्योंकि जो अपने ही हित का काम होते हुए भी दूसरे का हित करता है, वही बड़ा है
पूरी कथा पढ़िए — अपने काम के बीच दूसरे का काम

राजा का काम ही सेवक का भला करना था।

सेवक ने भूखे राजा के लिए जंगल में भोजन जुटाया।

व्याख्या

इन दोनों कहानियों में 'वचन निभाने' का क्या स्थान है, हमारे पठन में?

  • पहली में वचन तोड़ने की क़ीमत तीन जानें हैं, दूसरी में राजा सेवक को दिए अपने वचन से पहले एक वचन का हवाला देकर उसे निभवाता है
  • दोनों में वचन का कोई स्थान नहीं
  • दोनों में वचन तोड़ने वाले की जीत होती है
  • दोनों में केवल देवी की इच्छा चलती है
पूरी कथा पढ़िए — एक पठन

पहली में धोबी ने देवी से वचन तोड़ा, दूसरी में कन्या ने राजा से वचन दिया।

यह आज के पाठक का पठन है, पाठ का स्वयं का दावा नहीं।

बदले हुए सिर, राजा का सेवक के बारे में सवाल

बदले हुए सिर, राजा का सेवक (विक्रम और बेताल) में क्या होता है?

देवी के सामने किया वचन तोड़ने से तीन जानें गईं और जब देवी ने जिलाया तो जल्दबाज़ी में सिर आपस में बदल गए — और एक राजा ने अपनी भूखी रात का क़र्ज़ अनोखे ढंग से चुकाया। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: छठी कहानी: देवी के सामने किया वचन; आठवीं कहानी: राजा और उसका सेवक।

विक्रम और बेताल में बदले हुए सिर, राजा का सेवक के बाद क्या आता है?

आगे चोर की मर्यादा, नाज़ुक रानियाँ: आधी रात अकेली निकली एक नई ब्याहता को तीन आदमी मिले — पति, प्रेमी और चोर — और तीनों में से जिसके पास रोकने का सबसे कम कारण था, वही उसे छोड़ गया।

बदले हुए सिर, राजा का सेवक का स्रोत क्या है?

बैताल पच्चीसी, कथा 6 और 8।