
अध्याय १०
सबसे गहरा प्रेम, बाघ में प्राण
तीन लोग एक ही चिता के पास पहुँचे और बेताल ने पूछा कि सबसे गहरा प्रेम किसका; फिर चार विद्वान भाइयों ने हड्डियों से बाघ खड़ा किया — सबसे बड़ा मूर्ख कौन?
सबसे गहरा प्रेम, बाघ में प्राण — विक्रम और बेताल का अध्याय १०। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 20 और 21। इसमें २ दृश्य हैं — बीसवीं कहानी: अनंगमंजरी और कमलाकर; इक्कीसवीं कहानी: बाघ को जिलाने वाला — और अंत में १० सवाल।
बीसवीं कहानी: अनंगमंजरी और कमलाकर
विक्रम बेताल को फिर पेड़ से उतारकर कंधे पर रखकर चला, तो बेताल बोला, 'राजन्, बीसवीं कहानी सुन।'
विशालपुर में राजा विपुलेश्वर राज करता था। उसके नगर में अर्थदत्त नाम का एक व्यापारी था, जिसकी बेटी का नाम अनंगमंजरी था। उसने उसका ब्याह कँवलपुर के व्यापारी मुन्नी से किया था। कुछ दिन बाद मुन्नी व्यापार के लिए समुद्र पार चला गया। इधर अनंगमंजरी जवान हुई। एक दिन वह मंडप में खड़ी रास्ते का दृश्य देख रही थी कि उधर से कमलाकर नाम का एक ब्राह्मण-पुत्र निकला। दोनों की आँखें मिलीं और पहली ही नज़र में दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए। कुछ देर बाद होश सँभालकर कमलाकर बेचैनी में अपने मित्र के घर चला गया। यहाँ अनंगमंजरी भी उसके बिना बहुत व्याकुल थी, तभी उसकी सहेली आई और उसे सँभाला; पर उसे अपनी सुध नहीं थी। सहेली ने गुलाबजल छिड़का और इत्र सुँघाया तो होश लौटा और वह कामदेव को उलाहने देने लगी।
साँझ हुई, चाँद निकला। चाँदनी देखकर वह बोली, 'चंद्रमा, मैं सुनती थी कि तुममें अमृत है, और तुम उसे बरसाते हो; आज तुम भी ज़हर बरसाने लगे।' उसने सहेली से कहा, 'मुझे यहाँ से उठाकर ले चल, चाँदनी मुझे जला रही है।' सहेली उसे मंडप में ले गई और बोली, 'तुझे ऐसी बातें कहते शर्म नहीं आती?' उसने कहा, 'सखी, मैं सब जानती हूँ, पर कामदेव ने मुझे बेशर्म कर दिया है। धीरज धरने की कितनी भी कोशिश करती हूँ, बिछोह की आग में जितना जलती हूँ, उतना ही घर ज़हर-सा लगता है।' सहेली ने कहा, 'मन शांत रख, मैं तेरा सारा दुख दूर करूँगी।'
सहेली घर गई तो अनंगमंजरी ने मन में ठान लिया कि वह इस देह को छोड़ देगी, ताकि अगले जन्म में उसी के साथ सुख पाए। सहेली ठीक उसी समय लौट आई, उसे रोक लिया और बोली, 'जीते रहने से सब कुछ मिलता है, मरने से कुछ नहीं।' उसने कहा, 'ऐसे दुख से तो मर जाना अच्छा है।' सहेली बोली, 'तू ज़रा ठहर, मैं उसे ही ले आती हूँ।'
सहेली कमलाकर के पास पहुँची और छिपकर देखा कि वह भी बिछोह में बहुत बेचैन है। उसका मित्र गुलाबजल में चंदन घिसकर उसकी देह पर लगा रहा था और केले के कोमल पत्तों से हवा कर रहा था। फिर भी वह जलता हुआ कह रहा था, 'मुझे ज़हर ला दो, मैं प्राण दे दूँगा, तभी इस दुख से छूटूँगा।' उसकी हालत देखकर सहेली ने मन में सोचा, 'आदमी कितना भी बहादुर, पढ़ा-लिखा, चतुर और धीर हो, कामदेव उसे बावला बना देता है।' फिर उसने कहा, 'कमलाकर, अनंगमंजरी ने तुम्हें बुलाया है, चलकर उसे जीवन दो।' उसने कहा, 'उसने तो मुझे जीवन दिया है।'
वह उठा और सहेली उसे साथ लेकर अनंगमंजरी के पास गई। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि वह मरी पड़ी है। वह भी एक चीख़ मारकर गिर पड़ा और उसके प्राण निकल गए। सवेरा हुआ तो घर वाले दोनों को श्मशान ले गए और चिता सजाकर रख दिया। उसी बीच अनंगमंजरी का पति परदेस से लौटा। श्मशान में लोगों के रोने की आवाज़ सुनकर वह वहाँ गया और देखा कि उसकी पत्नी एक पराए आदमी के साथ चिता पर रखी है। वह भी प्रेम के आवेश में उसी चिता पर प्राण दे बैठा। नगर के लोग यह सुनकर कहने लगे, 'ऐसी अनोखी बात न कभी आँख ने देखी, न कान ने सुनी।'
कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, इन तीनों में किसका प्रेम सबसे गहरा था?' राजा ने कहा, 'पति का।' बेताल ने पूछा, 'क्यों?' राजा बोला, 'जिसने पत्नी को किसी और के लिए मरा हुआ देखकर भी क्रोध छोड़ दिया और प्रेम से उसके लिए हँसते-हँसते प्राण दे दिए, वही सबसे गहरा प्रेमी है।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा उसे उतारकर बाँधकर कंधे पर रखकर चल पड़ा।
इक्कीसवीं कहानी: बाघ को जिलाने वाला
चलते-चलते बेताल ने कहा, 'राजन्, इक्कीसवीं कहानी सुन।'
जयस्थल नगर में राजा वर्धमान राज करता था। उसी नगर में विष्णुस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसके चार बेटे थे। चारों में कोई न कोई ऐब था: एक जुआरी, एक विलासी, एक बुरी संगत में पड़ा रहने वाला, और चौथा नास्तिक। एक दिन ब्राह्मण ने बेटों को समझाया, 'जो जुआ खेलता है, उसके घर में धन नहीं टिकता। जो विलास में पड़ता है, वह अपना सब कुछ खो देता है और आख़िर चोरी करने लगता है। जो बचपन में विद्या नहीं सीखते और जवानी विलास में बिता देते हैं, वे बुढ़ापे में पछताते हैं।' यह सुनकर चारों ने आपस में तय किया कि अनपढ़ का मरना जीने से अच्छा है, इसलिए किसी दूसरे देश जाकर विद्या पढ़ें।
वे दूसरे नगर गए, कई बरस पढ़कर विद्वान बने, और घर लौटने के लिए चल पड़े। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक कंजर मरे हुए बाघ की खाल उतारकर और माँस काटकर उसकी हड्डियों की गठरी बाँध रहा था और उसे ले जाने वाला था। चारों ने एक-दूसरे से कहा, 'चलो, हम सब अपनी विद्या की परीक्षा करें।' एक ने कंजर को कुछ देकर गठरी ले ली और उसे भेज दिया। फिर चारों रास्ते से हटकर बैठे और गठरी खोली। एक ने मंत्र पढ़कर सारी हड्डियाँ अपनी जगह जोड़ दीं। दूसरे ने उसी तरह हड्डियों पर माँस चढ़ा दिया। तीसरे ने माँस पर खाल जमा दी। चौथे ने उसमें प्राण डाल दिए। बाघ उठा और उसने चारों को खा लिया।
कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, इन चारों में सबसे बड़ा मूर्ख कौन था?' राजा ने कहा, 'जिसने उसमें प्राण डाले। कहा गया है कि बिना बुद्धि की विद्या किसी काम की नहीं; विद्या से बुद्धि बड़ी है। जिनमें बुद्धि नहीं होती, वे उसी तरह मरते हैं जैसे बाघ को जिलाने वाला मरा।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा उसे उतारकर बाँधकर कंधे पर रखकर चल पड़ा।
टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अनुवाद) की कथा 20 और 21 से लिखा गया है। कथा 20 में प्रेम की व्याकुलता, आत्म-हत्या का विचार और चिता पर पति के प्राण देने का वर्णन पाठ में है; यहाँ उसे संयत ढंग से, बिना किसी विधि के ब्योरे के, केवल कथा-क्रम के लिए कहा गया है। कथा 21 में पिता की लंबी फटकार को छोटा किया गया है। नाम पाठ के रूप में हैं: विपुलेश्वर, अर्थदत्त, अनंगमंजरी, कमलाकर, मुन्नी, वर्धमान, विष्णुस्वामी।
स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, सबसे गहरा प्रेम, बाघ में प्राण