
अध्याय ८
जीमूतवाहन और साँप
एक राजकुमार दूसरे के बदले गरुड़ का भोजन बनने चला, और जिसका भोजन बनना था वह भी लौट आया — बेताल ने पूछा, सबसे बड़ा त्याग किसका?
जीमूतवाहन और साँप — विक्रम और बेताल का अध्याय ८। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 15। इसमें १ दृश्य हैं — पंद्रहवीं कहानी: जीमूतवाहन — और अंत में १० सवाल।
पंद्रहवीं कहानी: जीमूतवाहन
विक्रम बेताल को फिर पेड़ से उतारकर कंधे पर रखकर चला, तो बेताल बोला, 'राजन्, पंद्रहवीं कहानी सुन।'
हिमाचल पर्वत पर गंधर्वों का एक नगर था, और वहाँ राजा जीमूतकेतु राज करता था। पुत्र की चाह में उसने कल्पवृक्ष की बहुत सेवा की। कल्पवृक्ष प्रसन्न हुआ और बोला, 'जो चाहिए माँग लो।' राजा ने कहा, 'मुझे एक पुत्र दीजिए, जिससे मेरा राज और मेरा नाम बना रहे।' कल्पवृक्ष ने कहा, 'ऐसा ही होगा।' कुछ समय बाद राजा को पुत्र हुआ। उसने उत्सव कराया, दान दिए, और पुरोहितों को बुलाकर नाम रखवाया: जीमूतवाहन।
बारह बरस का होते-होते जीमूतवाहन शिव की पूजा करने लगा। सब शास्त्र पढ़कर वह समझदार, धीर और निडर बना; उन दिनों उसके बराबर कोई नहीं था। जवान हुआ तो उसने भी कल्पवृक्ष को मनाया। वृक्ष ने कहा, 'जो चाहो माँगो।' जीमूतवाहन ने कहा, 'मेरी प्रजा की सारी ग़रीबी मिटा दीजिए, और मेरे राज्य में सब लोग धन-संपत्ति में बराबर हो जाएँ।' कल्पवृक्ष ने वर दे दिया। लोग इतने संपन्न हो गए कि कोई किसी का हुक्म नहीं मानता था और कोई किसी के लिए काम नहीं करता था।
राजा के भाई और रिश्तेदारों ने आपस में कहा, 'बाप और बेटा दोनों धर्म के चक्कर में पड़े हैं, और प्रजा उनकी बात नहीं मानती। इन दोनों को पकड़कर क़ैद कर लें और राज्य छीन लें।' उन्होंने सलाह की और सेना लेकर राजमहल को घेर लिया। ख़बर पहुँची तो राजा ने बेटे से पूछा, 'अब क्या करें?' बेटा बोला, 'आप यहीं निश्चिंत रहिए, मैं अभी जाकर इन्हें मार भगाता हूँ।' राजा ने कहा, 'बेटा, यह देह नश्वर है और धन भी टिकता नहीं। जो जन्म लेता है, मृत्यु उसके साथ चलती है। राज के लिए और इस देह के लिए पाप करना ठीक नहीं; महाभारत के बाद तो युधिष्ठिर को भी पछतावा हुआ था। अब हमें राज छोड़कर धर्म का काम करना चाहिए।' जीमूतवाहन ने कहा, 'जैसी आपकी आज्ञा। राज अपने रिश्तेदारों को सौंपिए, और हम तप करें।'
राज रिश्तेदारों को सौंपकर पिता-पुत्र मलयाचल पर्वत पर गए, चोटी पर पहुँचे, एक कुटिया बनाई और रहने लगे। वहाँ जीमूतवाहन की एक ऋषि-पुत्र से मित्रता हो गई। एक दिन दोनों पर्वत की चोटी पर घूमने निकले तो भवानी का एक मंदिर दिखा। मंदिर में एक राजकन्या वीणा हाथ में लिए देवी के सामने गा रही थी। दोनों की आँखें मिलीं और दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए। राजकन्या ने लाज से अपने को सँभाला और घर की ओर मुड़ गई; जीमूतवाहन भी मित्र के सामने सकुचाकर अपनी कुटिया लौट आया। वह रात दोनों की बेचैनी में कटी।
सवेरा होते ही राजकन्या देवी के मंदिर चली, और जीमूतवाहन भी पहुँचा, तो वह वहीं मिली। उसने उसकी सहेली से पूछा, 'यह किसकी बेटी है?' सहेली ने कहा, 'यह राजा मलयकेतु की बेटी है, इसका नाम मलयवती है और यह अभी कुँवारी है।' फिर सहेली ने पूछा, 'आप कौन हैं और कहाँ से आए हैं?' उसने कहा, 'मैं गंधर्वों के राजा जीमूतकेतु का बेटा जीमूतवाहन हूँ। हमारा राज छिन गया तो हम बाप-बेटे यहाँ आकर रहने लगे हैं।'
सहेली ने सारी बात राजकन्या को बताई। सुनकर वह दुखी हुई, घर लौटी और रात को चिंता में डूबी लेटी रही। सहेली ने उसकी हालत देखी तो रानी को बता दी। रानी ने राजा से कहा, 'महाराज, आपकी बेटी ब्याह के योग्य हो गई है, आप उसके लिए वर क्यों नहीं ढूँढ़ते?' राजा ने सोचा और उसी घड़ी अपने बेटे मित्रवसु को बुलाकर कहा, 'बेटा, बहन के लिए वर ढूँढ़कर लाओ। मैंने सुना है कि गंधर्वों के राजा जीमूतकेतु अपने बेटे जीमूतवाहन के साथ राज छोड़कर यहीं आ बसे हैं। मैं बेटी जीमूतवाहन को दूँगा।' मित्रवसु जीमूतकेतु के पास गया और बोला, 'मेरे पिता ने आपके बेटे को बुलाया है, वे अपनी बेटी का ब्याह उससे करना चाहते हैं।' जीमूतकेतु ने बेटे को उसके साथ भेज दिया। राजा मलयकेतु ने गंधर्व रीति से उनका ब्याह कर दिया। फिर तीनों ने जाकर राजा-रानी को प्रणाम किया और आशीर्वाद पाया। वह दिन इसी तरह बीता।
अगली सुबह दोनों राजकुमार, जीमूतवाहन और मित्रवसु, मलयगिरि पर घूमने निकले। एक जगह जीमूतवाहन ने सफ़ेद चीज़ का बहुत ऊँचा ढेर देखा और साले से पूछा, 'भाई, यह सफ़ेद ढेर कैसा है?' मित्रवसु ने कहा, 'पाताल से रोज़ करोड़ों नाग यहाँ आते हैं, गरुड़ आकर उन्हें खा जाता है। यह ढेर उन्हीं की हड्डियों का है।' यह सुनकर जीमूतवाहन ने कहा, 'मित्र, तुम घर जाकर भोजन करो। यह मेरे पूजा करने का समय है, मैं यहीं रुकूँगा।' मित्रवसु चला गया।
जीमूतवाहन आगे बढ़ा तो उसे किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ की ओर जाकर उसने एक बुढ़िया को दुख के बोझ से रोते देखा। पास जाकर पूछा, 'माँ, क्यों रोती हो?' वह बोली, 'आज मेरे बेटे शंखचूड़ नाग की बारी है। गरुड़ आएगा और उसे खा जाएगा। इसी दुख से रोती हूँ।' उसने कहा, 'माँ, मत रोओ। तुम्हारे बेटे के बदले मैं अपनी जान दूँगा।' बुढ़िया बोली, 'नहीं, ऐसा मत करो। तुम ही मेरे शंखचूड़ हो।'
वह यह कह ही रही थी कि शंखचूड़ वहाँ पहुँच गया और सुनकर बोला, 'महाराज, मुझ जैसे निकम्मे तो लाखों पैदा होते और मरते हैं, पर आप जैसा दयावान और धर्मात्मा रोज़ पैदा नहीं होता। मेरे लिए जान मत दीजिए। आप जीवित रहेंगे तो हज़ारों का भला होगा, मैं जिऊँ या मरूँ कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।' जीमूतवाहन ने कहा, 'सच्चे पुरुष कहकर पलटते नहीं। तू जहाँ से आया है, वहाँ लौट जा।'
यह सुनकर शंखचूड़ देवी के दर्शन करने चला गया, और आकाश से गरुड़ उतरा। राजकुमार ने देखा कि उसकी हर टाँग चार बाँस लंबी थी, चोंच ताड़ के पेड़ जितनी, पेट पर्वत जैसा, आँखें फाटक जैसी और पंख बादलों जैसे। वह चोंच खोले राजकुमार पर झपटा। पहली बार राजकुमार बच गया, पर दूसरी बार गरुड़ उसे चोंच में दबाकर उड़ा और ऊपर आकाश में चक्कर काटने लगा। इसी बीच जीमूतवाहन का वह कंगन, जिसके रत्न पर उसका नाम खुदा था, खुलकर खून से सना हुआ राजकन्या के सामने जा गिरा। उसे देखते ही वह बेहोश हो गई।
होश आया तो उसने जो हुआ, वह अपने माता-पिता को कहला भेजा। वे आए, कंगन को खून से सना देखकर रो पड़े, और तीनों उसे खोजने निकले। रास्ते में शंखचूड़ भी उनके साथ हो लिया। वह उनसे आगे बढ़कर उस जगह पहुँचा जहाँ उसने राजकुमार को देखा था, और बार-बार पुकारने लगा, 'गरुड़, उसे छोड़ दो, छोड़ दो! वह तुम्हारा भोजन नहीं है। मेरा नाम शंखचूड़ है, मैं तुम्हारा भोजन हूँ।'
यह सुनकर गरुड़ घबराकर नीचे उतरा और सोचने लगा, 'मैंने किसी ब्राह्मण या क्षत्रिय को खा लिया है, यह मैंने क्या किया।' उसने राजकुमार से कहा, 'हे मनुष्य, सच-सच बता, तू जान क्यों दे रहा है?' राजकुमार ने कहा, 'गरुड़, पेड़ ख़ुद धूप में खड़े रहकर औरों को छाया देते हैं, फूलते-फलते भी औरों के लिए हैं। भले लोगों और पेड़ों का यही स्वभाव है। जो देह दूसरों के काम न आए, उसका क्या लाभ? जिनका जीना दूसरों के भले के लिए है, उनका जीना सफल है; केवल जीने के लिए तो कुत्ते-कौए भी जीते हैं। जो ब्राह्मण, गाय, मित्र या स्त्री के लिए, और परायों तक के लिए जान देते हैं, वे अवश्य स्वर्ग में सदा रहते हैं।'
गरुड़ ने कहा, 'संसार में हर कोई अपने प्राण प्यारे रखता है, और दूसरों के प्राण बचाने के लिए अपने प्राण देने वाले बहुत कम हैं।' फिर बोला, 'तेरे साहस से मैं प्रसन्न हूँ, वर माँग।' जीमूतवाहन ने कहा, 'देव, अगर प्रसन्न हैं तो आज से नागों को खाना छोड़ दीजिए, और जिन्हें खा चुके हैं उन्हें जिला दीजिए।' गरुड़ ने पाताल से अमृत लाकर नागों की हड्डियों पर छिड़का, और वे सब जी उठे। गरुड़ ने जीमूतवाहन से कहा, 'मेरी कृपा से तेरा खोया हुआ राज तुझे लौट मिलेगा।'
वर देकर गरुड़ अपने घर चला गया, शंखचूड़ भी घर गया, और जीमूतवाहन रास्ते में अपने ससुर, सास और पत्नी से मिला। सब साथ आकर पिता के पास पहुँचे। यह सब सुनकर उसके चाचा, चचेरे भाई और सब रिश्तेदार उससे मिलने आए, पैरों पर गिरकर क्षमा माँगी और उसे ले जाकर फिर सिंहासन पर बिठाया।
कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, इनमें सबसे बड़ा त्याग किसका था?' राजा ने कहा, 'शंखचूड़ का।' 'कैसे?' बेताल ने पूछा। राजा बोला, 'शंखचूड़ तो चला गया था और बच गया था, फिर भी लौट आया कि गरुड़ उसे खाए और राजकुमार बच जाए।' बेताल ने कहा, 'तो जिसने दूसरे के लिए जान दी, उसका त्याग बड़ा क्यों नहीं?' राजा बोला, 'जीमूतवाहन क्षत्रिय था। जान हथेली पर रखना उसका स्वभाव था, इसलिए उसके लिए प्राण देना कठिन नहीं था।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा उसे उतारकर बाँधकर कंधे पर रखकर चल पड़ा।
टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अनुवाद) की कथा 15 से लिखा गया है। जीमूतवाहन की यह कथा संस्कृत के नाटक नागानंद और कथासरित्सागर में भी मिलती है। यहाँ गरुड़ का नागों को खाना और हड्डियों का ढेर पाठ के अनुसार संक्षेप में कहा गया है; ब्योरे का वर्णन नहीं किया गया। नाम पाठ के रूप में हैं: जीमूतकेतु, जीमूतवाहन, मलयकेतु, मलयवती, मित्रवसु, शंखचूड़।
स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, जीमूतवाहन और साँप