
अध्याय २
कमल के इशारे, राख का बिस्तर
एक राजकुमारी ने बिना बोले कमल से अपना पता बता दिया — और तीन ब्राह्मण-युवक एक ही कन्या पर ऐसे झगड़े कि बेताल ने राजा से पूछा, वह किसकी पत्नी हो?
कमल के इशारे, राख का बिस्तर — विक्रम और बेताल का अध्याय २। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 1 और 2। इसमें २ दृश्य हैं — पहली कहानी: कमल का इशारा; दूसरी कहानी: तीन युवक और एक कन्या — और अंत में १० सवाल।
पहली कहानी: कमल का इशारा
बनारस के राजा प्रतापमुकुट का बेटा वज्रमुकुट एक दिन मंत्री के बेटे के साथ शिकार को निकला और घने जंगल में बहुत दूर निकल गया। वहाँ उसे एक सुंदर तालाब मिला, जिसके किनारे हंस, बत्तख और सारस खेल रहे थे, चारों ओर पक्के घाट थे, पानी में कमल खिले थे और पेड़ों की घनी छाँव में ठंडी हवा बह रही थी। दोनों ने हाथ-मुँह धोया और ऊपर आए। वहीं महादेव का एक मंदिर था। घोड़े बाँधकर उन्होंने मंदिर में जाकर प्रणाम किया।
जब वे पूजा कर रहे थे, तभी किसी राजा की बेटी अपनी सखियों के साथ तालाब के दूसरे घाट पर नहाने आई। स्नान और पूजा के बाद वह सखियों के साथ पेड़ों की छाँव में टहलने लगी। इधर मंत्री का बेटा बैठा था और राजकुमार टहल रहा था कि अचानक उसकी आँखें और राजकुमारी की आँखें मिल गईं। राजकुमार उसे देखते ही मोहित हो गया। राजकुमारी ने सिर पर रखा कमल का फूल हाथ में लिया, उसे कान से लगाया, दाँत से काटा, पैर के नीचे दबाया, फिर उठाकर छाती से लगाया, और सखियों के साथ रथ पर बैठकर चली गई।
राजकुमार उदास होकर मंत्री के बेटे के पास आया और लज्जा से सारा हाल बताया, 'मित्र, मैंने एक बहुत सुंदर कन्या देखी है। न उसका नाम जानता हूँ, न ठिकाना। अगर वह न मिली तो मैं प्राण दे दूँगा।' मंत्री का बेटा उसे घर ले आया, पर राजकुमार विरह में लिखना-पढ़ना, खाना-पीना, सोना और राज-काज सब भूल गया। वह उसका चित्र बनाता, उसे देखता और रोता, न बोलता, न किसी की सुनता।
मंत्री के बेटे ने उसकी हालत देखकर कहा, 'प्रेम की राह पर चलने वाला या तो बचता नहीं, या बचा भी तो बड़ा दुख पाता है। इसीलिए समझदार इस राह पर नहीं चलते।' राजकुमार बोला, 'मैं तो इस राह पर चल पड़ा हूँ, सुख मिले या दुख।' मंत्री के बेटे ने पूछा, 'चलते समय उसने कुछ कहा था, या आपने उससे?' राजकुमार ने कहा, 'न मैंने कुछ कहा, न उसने। पर उसने कुछ इशारे किए थे: कमल सिर से उतारकर कान से लगाया, दाँत से काटा, पैर के नीचे रखा, फिर छाती से लगा लिया।' यह सुनकर मंत्री के बेटे ने कहा, 'मैं इन इशारों का मतलब समझ गया। मुझे उसका नाम, गाँव और सब कुछ पता चल गया।'
उसने बताया, 'कमल को कान से लगाने का मतलब है कि वह कर्णाट देश की रहने वाली है। दाँत से काटने का मतलब है कि वह राजा दंतवट की बेटी है। पैर के नीचे दबाने का मतलब है कि उसका नाम पद्मावती है। और फिर छाती से लगाने का मतलब है कि आप उसके हृदय में बसे हैं।' राजकुमार ने कहा, 'तब मुझे वहीं ले चलो।' दोनों ने कपड़े पहने, हथियार बाँधे, कुछ गहने साथ लिए और घोड़ों पर उसी दिशा में चल पड़े।
कई दिन बाद कर्णाट देश पहुँचकर वे राजमहल के नीचे नगर में घूम रहे थे कि एक बुढ़िया अपने दरवाज़े पर चरखा कात रही थी। उन्होंने घोड़ों से उतरकर कहा, 'माँ, हम परदेसी सौदागर हैं, माल पीछे आ रहा है। हम ठिकाना ढूँढ़ने आगे आ गए। जगह दें तो ठहर जाएँ।' बुढ़िया ने उनके चेहरे और बातें देखकर दया की, 'यह घर तुम्हारा है, जब तक चाहो रहो।' उन्होंने डेरा डाल लिया और बातों-बातों में मंत्री के बेटे ने पूछा, 'माँ, आपके कौन-कौन हैं और गुज़र कैसे होती है?' बुढ़िया ने कहा, 'मेरा बेटा राजा की नौकरी में सुखी है, और मैं राजकुमारी पद्मावती की दाई थी। बुढ़ापे के कारण घर पर रहती हूँ, राजा मेरा गुज़ारा देता है। रोज़ एक बार उस बच्ची को देखने जाती हूँ।'
यह सुनकर राजकुमार खिल उठा। उसने कहा, 'कल जाओ तो मेरी ओर से भी एक संदेश ले जाना।' बुढ़िया ने कहा, 'बेटा, कल की क्या बात, अभी ले जाऊँगी।' उसने कहा, 'राजकुमारी से कहना कि जेठ की शुक्ल पंचमी को तालाब के किनारे जिस राजकुमार को तुमने देखा था, वह आ गया है।' बुढ़िया लाठी लेकर महल गई। राजकुमारी अकेली बैठी थी। उसने बुढ़िया को प्रणाम किया। बुढ़िया ने आशीर्वाद दिया और बोली, 'बेटी, बचपन में मैंने तुझे दूध पिलाया है। अब मेरे मन में यही आस है कि तू ब्याहकर सुखी हो। जिस राजकुमार का मन तूने जेठ की शुक्ल पंचमी को तालाब पर चुरा लिया था, वह मेरे घर आया है और कहलवाया है कि तूने जो वचन दिया था, उसे निभा। मैं भी कहती हूँ, वह तेरे योग्य है।'
यह सुनते ही पद्मावती ने हाथों में चंदन लगाया और बुढ़िया के गाल पर थप्पड़ मार दिया, 'चल, निकल मेरे घर से!' बुढ़िया दुखी होकर सीधे राजकुमार के पास लौटी और सब बता दिया। राजकुमार हक्का-बक्का रह गया। मंत्री के बेटे ने कहा, 'चिंता मत कीजिए, यह बात आपकी समझ में नहीं आई। चंदन लगे दसों उँगलियों से थप्पड़ मारने का मतलब है कि जब चाँदनी की दस रातें बीत जाएँगी, तब वह अँधेरी रात में आपसे मिलेगी।' दस दिन बाद बुढ़िया फिर गई तो पद्मावती ने तीन उँगलियों पर केसर लगाकर फिर वही कहा, 'निकल जा मेरे घर से!' बुढ़िया फिर निराश लौटी, तो मंत्री के बेटे ने कहा, 'इसका मतलब है कि वह तीन दिन और माँग रही है; चौथे दिन बुलावा भेजेगी।' तीन दिन बाद जब बुढ़िया पूछने गई तो पद्मावती उसे ग़ुस्से का दिखावा करते हुए पश्चिम की खिड़की से निकाल आई। मंत्री के बेटे ने कहा, 'यानी आज रात आपको उसी खिड़की से बुलाया है।'
आधी रात बीती तो दोनों ने भूरे कपड़े पहने, पगड़ियाँ कसीं, हथियार सजाए और चुपचाप चल पड़े। खिड़की के पास पहुँचकर मंत्री का बेटा बाहर रुका और राजकुमार भीतर गया। वहाँ पद्मावती ख़ुद उसकी प्रतीक्षा में खड़ी थी। दोनों की आँखें मिलीं तो वह हँस दी और खिड़की बंद करके उसे भीतर के कक्ष में ले गई, जहाँ धूप-इत्र जल रहे थे, फूलों का बिस्तर बिछा था और सेविकाएँ हाथ जोड़े खड़ी थीं। वह राजकुमार का स्वागत करने में लगी रही। कई दिन ऐसे ही बीत गए, और जब भी राजकुमार जाना चाहता, पद्मावती रोक लेती।
एक महीना बीत गया तो राजकुमार बेचैन हो उठा। रात को अकेले बैठा वह सोचने लगा, 'देश, राज, कुटुंब सब पहले ही छूट गए, पर जिस मित्र के कारण यह सुख मिला, उसकी एक महीने से कोई ख़बर नहीं।' तभी पद्मावती वहाँ आ गई और पूछा, 'महाराज, उदास क्यों हैं?' उसने बताया, 'मेरा एक प्रिय मित्र है, मंत्री का बेटा, जिसकी बुद्धि से मैंने तुम्हें पाया और जिसने तुम्हारे सब इशारे समझाए।' पद्मावती बोली, 'तुम्हारा मन तो वहीं है। मैं मिठाइयाँ बनवाकर भिजवाती हूँ, तुम भी जाकर उसे खिलाओ और मन हल्का करके लौट आओ।'
राजकुमार ख़ुशी-ख़ुशी उठा और मित्र के पास पहुँचा। पीछे-पीछे मिठाइयाँ भी आ गईं, जिनमें पद्मावती ने ज़हर मिलवा दिया था। मंत्री के बेटे ने पूछा, 'ये मिठाइयाँ यहाँ कैसे आईं?' राजकुमार ने बताया कि राजकुमारी ने भिजवाई हैं। मंत्री का बेटा बोला, 'तुम मेरे लिए ज़हर लाए हो। अच्छा हुआ कि तुमने ख़ुद नहीं खाई। स्त्री अपने प्रेमी के मित्र से स्नेह नहीं रखती, तुमने वहाँ मेरा नाम लेकर ठीक नहीं किया।' राजकुमार को यक़ीन न हुआ, 'ऐसा कौन करेगा? आदमी आदमी से न डरे तो कम से कम ईश्वर से तो डरता है।' मंत्री के बेटे ने एक गोल मिठाई कुत्ते की ओर फेंकी। कुत्ता खाते ही तड़पकर मर गया। यह देखकर राजकुमार का मन उसकी ओर से फिर गया।
मंत्री के बेटे ने कहा, 'जो हो गया सो हो गया। अब ऐसा कीजिए कि उसे अपने देश ले चल सकें। आज रात उसके पास जाइए, ख़ूब स्नेह दिखाइए और जब वह सो जाए, तो उसके गहने उतारकर चुपचाप लौट आइए।' राजकुमार वैसा ही करके, गहनों के साथ लौटा। फिर मंत्री का बेटा साधु बन गया, राजकुमार को चेला बनाया और श्मशान में जा बैठा। उसने कहा, 'तुम ये गहने बाज़ार में बेचने ले जाओ। अगर कोई पकड़े तो उसे मेरे पास ले आना।'
राजकुमार ने गहने राजमहल के फाटक के पास एक सुनार को दिखाए। सुनार ने तुरंत पहचान लिया, 'ये तो राजकुमारी के गहने हैं, सच बताओ, कहाँ से मिले?' तब तक दस-बीस लोग इकट्ठे हो गए। कोतवाल ने राजकुमार और सुनार को गहनों समेत पकड़वाकर मँगवाया। राजकुमार ने कहा, 'ये गहने मेरे गुरु ने बेचने को दिए हैं, मुझे नहीं पता कहाँ से आए।' कोतवाल ने गुरु को भी पकड़ मँगवाया और सबको राजा के सामने ले गया।
राजा ने साधु से पूछा, 'गुरुदेव, ये गहने आपको कहाँ से मिले?' साधु ने कहा, 'महाराज, कृष्ण पक्ष की चौदस की रात मैं श्मशान में एक डायन को वश में करने का मंत्र सिद्ध कर रहा था। जब वह आई तो मैंने उसके गहने उतार लिए। इस तरह ये मेरे पास आए।' राजा ने महल में जाकर रानी से पूछताछ करवाई तो पता चला कि राजकुमारी के गहने सचमुच ग़ायब थे। राजा ने कोतवाल को भेजकर साधु को फिर बुलवाया और अकेले में पूछा, 'गुरुदेव, शास्त्र में ऐसी स्त्री के लिए क्या दंड है?' साधु ने कहा, 'महाराज, ब्राह्मण, गाय, पत्नी, बच्चा या कोई भी आश्रित अगर कोई नीच काम करे, तो उसे देश निकाला देने का विधान है।'
यह सुनकर राजा ने पद्मावती को पालकी में बिठवाकर जंगल में छुड़वा दिया। राजकुमार और मंत्री का बेटा अपने डेरे से घोड़ों पर उसी जंगल गए, राजकुमारी को साथ लिया और अपने देश लौट चले। कई दिन बाद दोनों पिता के घर पहुँचे। सब छोटे-बड़ों में बड़ी ख़ुशी हुई, और राजकुमार-राजकुमारी सुख से रहने लगे।
कहानी पूरी करके बेताल ने विक्रम से पूछा, 'इन चारों में से, अपराध किसका है? अगर तू इसका फ़ैसला नहीं करेगा तो नरक में जाएगा।' राजा विक्रम ने कहा, 'अपराध राजा का है।' बेताल ने पूछा, 'राजा का कैसे?' विक्रम बोला, 'मंत्री के बेटे ने अपने स्वामी के प्रति अपना कर्तव्य निभाया। कोतवाल ने राजा की आज्ञा मानी। राजकुमारी को उसका मनचाहा मिल गया। राजा ने बिना सोचे-समझे, एक साधु की बात पर अपनी ही बेटी को देश से निकाल दिया, इसलिए दोष राजा का है।' यह सुनते ही बेताल कंधे से ग़ायब होकर फिर उसी पेड़ पर जा लटका।
दूसरी कहानी: तीन युवक और एक कन्या
राजा को पीछे अपने कंधे पर बेताल नहीं मिला तो वह सीधे लौटा, पेड़ पर चढ़ा, शव को बाँधकर कंधे पर रखा और फिर चल पड़ा। बेताल बोला, 'राजन्, अब दूसरी कहानी सुन।'
यमुना के किनारे धर्मस्थल नाम का नगर था, जहाँ गुणाधिप राजा था। वहाँ केशव नाम का एक ब्राह्मण यमुना किनारे पूजा-पाठ करता था। उसकी बेटी मधुमावती बहुत सुंदर थी। जब वह ब्याह के योग्य हुई तो माँ, पिता और भाई, तीनों उसके ब्याह की चिंता में लगे। एक दिन पिता किसी विवाह में गए थे और भाई गाँव में गुरु के यहाँ पढ़ने। उसी बीच एक ब्राह्मण का बेटा घर आया। माँ ने उसका रूप और गुण देखकर कह दिया, 'मैं तुझे अपनी बेटी दूँगी।' उधर पिता ने किसी और ब्राह्मण-युवक को कन्या देने का वचन दे दिया था, और भाई ने अपने गुरु के यहाँ एक तीसरे ब्राह्मण को अपनी बहन देने का वचन दे दिया था।
कुछ दिन बाद पिता और भाई दोनों अपने-अपने युवक को साथ लेकर आए, और तीसरा युवक पहले से ही घर पर था। उनके नाम थे त्रिविक्रम, वामन और मधुसूदन, और तीनों रूप, गुण, विद्या और उम्र में बराबर थे। यह देखकर ब्राह्मण सोचने लगा, 'एक कन्या और तीन वर! किसे दूँ और किसे नहीं? हम तीनों ने तीनों को वचन दे रखा है। कैसी अजीब बात हो गई!' वह यही सोच रहा था कि उसी बीच कन्या को साँप ने डस लिया और वह मर गई।
यह सुनकर पिता, भाई और तीनों युवक दौड़े, और झाड़-फूँक वालों, सपेरों और ज़हर उतारने वालों को जितने भी मिले, सबको बुला लाए। सबने कन्या को देखकर कहा कि अब यह नहीं बचेगी। किसी ने कहा कि जिसे पंचमी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी या चौदस को साँप डसे, वह नहीं बचता। किसी ने कहा कि शनि या मंगल के दिन डसे हुए का बचना कठिन है। किसी ने कहा कि अमुक नक्षत्रों में चढ़ा ज़हर नहीं उतरता, और किसी ने कहा कि होंठ, गाल, गर्दन, पेट या नाभि जैसे अंगों में डसा हुआ नहीं बचता। पाँचवें ने कहा, 'इसे तो ब्रह्मा भी नहीं जिला सकते, हमारी क्या बिसात। अब इसका क्रिया-कर्म कीजिए, हम चलते हैं।' झाड़-फूँक वाले चले गए और ब्राह्मण ने कन्या का शव ले जाकर विधि से अग्नि को सौंपा और लौट गया।
तब उन तीन युवकों ने अलग-अलग राह ली। एक ने उसकी जली हुई हड्डियाँ चुनकर बाँधीं और साधु होकर वन-वन घूमने निकल पड़ा। दूसरे ने उसकी राख की गठरी बाँधी, वहीं कुटिया बनाई और रहने लगा। तीसरा भी साधु बन गया, कंधे पर झोली और गले में माला डालकर देस-देस घूमने लगा। एक दिन वह किसी देश में एक ब्राह्मण के घर भोजन माँगने गया। गृहस्वामी ने उसे आदर से बिठाया और भोजन परोसा जाने लगा, तब उस घर में एक दुखद घटना हुई, जिसे यहाँ छोड़ दिया गया है। उसे देखकर साधु बिना खाए उठ गया और बोला, 'जिस घर में ऐसा बुरा काम हुआ हो, वहाँ मैं भोजन कैसे करूँ?' गृहस्वामी भीतर गया, मरे हुए जीवों को जिलाने वाली विद्या की एक पोथी लाया, मंत्र पढ़ा और जो हुआ था, उसे उलट दिया।
यह चमत्कार देखकर साधु के मन में आया, 'अगर यह पोथी मेरे हाथ लग जाए, तो मैं भी अपनी प्रिया को जिला लूँ।' उसने भोजन किया और वहीं रुक गया। रात को सब सो गए तो वह चुपचाप उठा, कमरे में जाकर पोथी ले ली और भाग निकला। कई दिन चलते हुए वह उसी जगह पहुँचा जहाँ ब्राह्मण-कन्या को जलाया गया था। वहाँ उसे दोनों साथी बैठे मिले, जिन्होंने उसे पहचान लिया और पूछा, 'भाई, देस-देस भटके हो, कोई विद्या भी सीखी?' उसने कहा, 'मैंने मुर्दे को जीवित करने की विद्या सीखी है।' वे बोले, 'तो हमारी प्रिया को जिला दो।' उसने कहा, 'राख और हड्डियाँ इकट्ठी करो।' उन्होंने सब जमा किया। साधु ने पोथी से मंत्र पढ़ा और कन्या उठ बैठी। तब कामदेव ने तीनों को ऐसा अंधा किया कि वे आपस में झगड़ने लगे।
कहानी कहकर बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, वह स्त्री किसकी पत्नी हुई?' विक्रम ने कहा, 'जिसने कुटिया बनाकर राख के पास रहना सहा, उसकी।' बेताल बोला, 'अगर हड्डियाँ न सँभाली जातीं तो वह जिलाई कैसे जाती? और अगर तीसरा विद्या लेकर न लौटता तो कौन जिलाता?' राजा ने कहा, 'जिसने हड्डियाँ सँभालीं, वह उसके पुत्र की जगह है; और जिसने जीवन दिया, वह पिता की जगह है। इसलिए जो कुटिया बनाकर राख के पास टिका रहा, वही उसका पति कहलाएगा।' यह सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा उसके पीछे-पीछे पहुँचा, उसे बाँधा, कंधे पर रखा और फिर चल पड़ा।
टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अंग्रेज़ी अनुवाद) की कथा 1 और 2 से सीधे लिखा गया है। कथा 1 में राजकुमार-राजकुमारी का शयन-कक्ष का पूरा ब्योरा और राजकुमारी के शरीर पर चिह्न (त्रिशूल) से पहचान वाला हिस्सा छोड़ा गया है; गहनों के ग़ायब होने तक की बात रखी गई है। जिस घर में साधु ने भोजन छोड़ा, वहाँ की बच्चे वाली घटना भी छोड़ दी गई है। राजा का 'देश-निकाला' और साधु की 'स्त्री के लिए दंड' की बात पात्रों के विचार हैं, इस वेबसाइट के नहीं। मंत्री के बेटे की 'स्त्री प्रेमी के मित्र से स्नेह नहीं रखती' जैसी बात भी उसी पात्र की है। कथा 2 सोमदेव की कथासरित्सागर के अध्याय 8 की पहली कथा (मंदारवती) जैसी है, पर नाम और ब्योरे अलग हैं।
स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, कमल के इशारे, राख का बिस्तर