
अध्याय ६
मंत्री की चिंता, साँप का ज़हर
समुद्र से निकले सोने के पेड़ पर बैठी एक गायिका, और राजा जो उसे पाकर राज भूल गया — तब मंत्री क्यों मर गया? और दूध की खीर में ज़हर किसने डाला?
मंत्री की चिंता, साँप का ज़हर — विक्रम और बेताल का अध्याय ६। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 11 और 12। इसमें २ दृश्य हैं — ग्यारहवीं कहानी: सोने का पेड़ और मंत्री; बारहवीं कहानी: दूध की खीर में ज़हर — और अंत में १० सवाल।
ग्यारहवीं कहानी: सोने का पेड़ और मंत्री
विक्रम ने बेताल को फिर पेड़ से उतारा और चला तो बेताल बोला, 'राजन्, ग्यारहवीं कहानी सुन।'
पुण्यपुर नाम के नगर में राजा वल्लभ राज करता था और उसका मंत्री सत्यप्रकाश था, जिसकी पत्नी का नाम लक्ष्मी था। एक दिन राजा ने मंत्री से कहा, 'जो राजा होकर सुंदर स्त्रियों के साथ आनंद न करे, उसका राज करना बेकार है।' यह कहकर उसने राज्य का सारा भार मंत्री को सौंपा और ख़ुद दिन-रात भोग-विलास में डूब गया।
एक दिन मंत्री उदास बैठा था कि पत्नी ने पूछा, 'स्वामी, आप बहुत कमज़ोर लग रहे हैं।' उसने कहा, 'रात-दिन राज्य की चिंता मुझे घुलाती है, और राजा सारा दिन अपने भोग में लगा रहता है।' पत्नी ने कहा, 'आपने बहुत समय तक राज सँभाला है। अब राजा से छुट्टी लेकर कुछ दिन तीर्थ कर आइए।' मंत्री चुप रहा। फिर दरबार के समय राजा के पास जाकर उसने आज्ञा ली और तीर्थ को चल दिया। चलते-चलते वह समुद्र के किनारे सेतुबंध रामेश्वर पहुँचा। वहाँ महादेव के दर्शन करके जब वह मंदिर से बाहर आया, तब उसकी नज़र समुद्र की ओर गई। उसने देखा कि समुद्र से एक सोने का पेड़ निकला है, जिसके पत्ते पन्ने के, फूल पुखराज के और फल मूँगे के हैं। उस पर एक बहुत सुंदर स्त्री हाथ में वीणा लिए बड़ी मीठी तान में गा रही है। कुछ देर बाद वह पेड़ समुद्र में डूब गया।
यह देखकर मंत्री लौटा और अपने नगर आकर राजा के पास पहुँचा। उसने हाथ जोड़कर कहा, 'महाराज, मैंने एक अनोखी चीज़ देखी है।' राजा ने कहा, 'बताओ।' मंत्री बोला, 'महाराज, पुराने लोग कहते हैं कि ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए जो किसी की समझ से बाहर हो और जिस पर कोई यक़ीन न करे। पर मैंने इसे अपनी आँखों से साफ़ देखा है, इसलिए कहता हूँ। जहाँ भगवान रघुनाथ ने समुद्र पर पुल बाँधा था, वहाँ समुद्र से एक सोने का पेड़ निकला, जिस पर पन्ने के पत्ते, पुखराज के फूल और मूँगे के फल थे, और उस पर एक बहुत सुंदर स्त्री वीणा लेकर गा रही थी। कुछ देर बाद वह पेड़ समुद्र में डूब गया।'
यह सुनकर राजा ने सारा राज मंत्री को सौंपा और अकेला समुद्र की ओर चल पड़ा। कई दिन बाद वहाँ पहुँचकर उसने महादेव की पूजा की और मंदिर से निकला तो वही पेड़ और वही स्त्री समुद्र से ऊपर उठे। राजा समुद्र में कूदकर उसी पेड़ पर जा बैठा। वह स्त्री राजा को लिए पाताल में उतर गई और उसकी ओर देखकर बोली, 'वीर, तुम यहाँ क्यों आए हो?' राजा ने कहा, 'तुम्हारी सुंदरता से खिंचकर।' वह बोली, 'अगर तुम अँधेरे पखवाड़े में मुझसे दूर रहो, तो मैं तुमसे ब्याह करूँगी।' राजा ने मान लिया। फिर भी उसने राजा से पक्का वचन लिया और ब्याह किया।
जब अँधेरी रातें आईं तो उसने कहा, 'महाराज, आज आप मेरे पास न रहें।' राजा तलवार लेकर चला गया और अलग जाकर छिपकर पहरा देने लगा। आधी रात को एक दानव आया और आते ही उसे बाँहों में भर लिया। यह देखते ही राजा तलवार लेकर दौड़ा और बोला, 'दुष्ट दैत्य, मेरी आँखों के सामने मेरी पत्नी पर हाथ मत लगा। पहले मुझसे लड़। मुझे डर तब तक था जब तक मैंने तुझे देखा नहीं था।' और उसने ऐसा वार किया कि दानव का सिर कटकर ज़मीन पर तड़पता रहा। यह देखकर वह स्त्री बोली, 'वीर, तुमने मुझ पर बड़ा उपकार किया।' फिर बोली, 'हर पहाड़ में रत्न नहीं होते, हर नगर में सच्चे वीर नहीं होते, हर वन में चंदन नहीं उगता, और हर हाथी के मस्तक में मोती नहीं होता।'
राजा ने पूछा, 'चौदस की रात यह दानव तुम्हारे पास क्यों आया?' वह बोली, 'मेरे पिता का नाम विद्याधर है, और मैं उनकी बेटी सुंदरी हूँ। मेरे पिता का नियम था कि वे मेरे बिना भोजन नहीं करते थे। एक दिन भोजन के समय मैं घर पर नहीं थी, तो पिता ने नाराज़ होकर शाप दिया कि हर अँधेरे पखवाड़े की चौदस को एक दैत्य आकर तुझे गले लगाएगा। मैंने कहा, "पिताजी, शाप तो दे दिया, पर अब दया कीजिए।" उन्होंने कहा, "जब कोई निडर पुरुष आकर उस दैत्य को मार देगा, तब तू इस शाप से छूटेगी।" अब मैं शाप से छूट गई। अब पिता के पास जाकर उनके चरण छूना चाहती हूँ।'
राजा ने कहा, 'अगर तुम मेरे उपकार को मानती हो, तो पहले मेरे राज्य चलकर उसे देख लो, फिर पिता के पास जाना।' वह मान गई और राजा उसे अपनी राजधानी ले आया। नगर में गाजे-बाजे बजे, घर-घर बधाई गाई गई। राजा ने बहुत दान-पुण्य किया। कुछ दिन बाद वह सुंदरी बोली, 'महाराज, अब मैं पिता के पास जाऊँगी।' राजा ने उदास होकर कहा, 'अच्छा, जाओ।' राजा को उदास देखकर वह बोली, 'महाराज, मैं नहीं जाऊँगी।' राजा ने पूछा, 'अब पिता के पास जाने का विचार क्यों छोड़ दिया?' वह बोली, 'मैं अब मनुष्य जाति की हो गई हूँ, और मेरे पिता देवता हैं। अब जाऊँगी तो वे मेरा आदर नहीं करेंगे।' यह सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने लाखों रुपये दान किए। यह सब सुनकर मंत्री दुख से मर गया।
कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, मंत्री क्यों मर गया?' राजा विक्रम ने कहा, 'मंत्री ने देखा कि राजा फिर भोग-विलास में डूब गया है, राज की चिंता उसके मन से निकल गई है, प्रजा ने अपना रक्षक खो दिया है, और अब कोई उसकी बात नहीं मानेगा। यही चिंता उसे ले डूबी।' यह सुनकर बेताल फिर पेड़ पर जा लटका। राजा उसे पहले की तरह उतारकर कंधे पर रखकर चला।
बारहवीं कहानी: दूध की खीर में ज़हर
बेताल बोला, 'राजा विक्रम, अब बारहवीं कहानी सुन।'
चूड़ापुर नाम के नगर में राजा चूड़ामन राज करता था। उसके कुलगुरु का नाम देवस्वामी था, और देवस्वामी का बेटा हरिस्वामी, जो कामदेव जैसा सुंदर, बृहस्पति जैसा विद्वान और कुबेर जैसा धनी था। वह एक ब्राह्मण की बेटी लावण्यवती को ब्याह लाया था।
एक रात गर्मी के दिनों में दोनों घर की छत पर गहरी नींद में सोए थे। स्त्री के चेहरे से घूँघट सरक गया, और उसी समय एक देवता रथ पर बैठा आकाश से कहीं जा रहा था। उसकी नज़र अचानक उस पर पड़ गई। उसने रथ नीचे उतारा और सोती हुई स्त्री को रथ पर रखकर उड़ गया। कुछ देर बाद हरिस्वामी की आँख खुली तो पत्नी नहीं थी। वह घबराकर नीचे उतरा, घर में ढूँढ़ा, फिर नगर की गली-गली में खोजा, पर वह नहीं मिली। वह मन में सोचता रहा, 'उसे कौन ले गया, कहाँ गई?'
जब सब कोशिशें बेकार गईं तो वह लाचार होकर लौटा और घर में फिर से उसे ढूँढ़ा, पर वह नहीं मिली। उसके बिना घर उसे सूना लगा और वह बेकल होकर पुकारने लगा, 'हाय मेरी प्राण-प्यारी, हाय मेरी प्राण-प्यारी!' विरह की पीड़ा से उसने गृहस्थी छोड़ दी, कमर में एक कौपीन बाँधी, देह पर गोबर की राख मली, गले में माला डाली, नगर छोड़ा और तीर्थ-यात्रा पर निकल पड़ा। गाँव-गाँव, नगर-नगर घूमता हुआ वह एक दिन दोपहर को किसी नगर में पहुँचा।
भूख से लाचार होकर उसने पलाश के पत्तों का दोना बनाया और एक ब्राह्मण के घर जाकर कहा, 'मुझे भिक्षा में थोड़ा भोजन दो।' (कहते हैं कि प्रेम में पड़ा आदमी न धर्म देखता है, न जाति, न भोजन; वह जहाँ मिले, वहीं खा लेता है।) ब्राह्मण ने उसके हाथ से दोना लिया और भीतर जाकर दूध में पकी खीर भरकर लौटा लाया। हरिस्वामी दोना लेकर तालाब के किनारे पहुँचा। वहाँ एक बड़ा बरगद था। उसने दोना उसकी जड़ के पास रखा और हाथ-मुँह धोने तालाब पर गया।
उसी समय बरगद की जड़ से एक काला साँप निकला, उसने दोने में मुँह डाला और चला गया, इस तरह सारी खीर में ज़हर घुल गया। जब हरिस्वामी हाथ-मुँह धोकर लौटा तो उसे इसका कुछ पता नहीं था, और भूख बहुत लगी थी। उसने खीर खा ली और ज़हर तुरंत उसकी देह में फैल गया। वह ब्राह्मण के पास गया और बोला, 'तूने मुझे ज़हर दिया, मैं मर रहा हूँ।' इतना कहकर वह लड़खड़ाया, गिरा और मर गया। ब्राह्मण ने उसे मरा देखा तो अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया, 'जा, तू ब्राह्मण की हत्यारी है!'
कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, ब्राह्मण की हत्या का पाप इनमें से किसे लगा?' राजा ने कहा, 'साँप के मुँह में ज़हर होना उसका स्वभाव है, इसलिए साँप को पाप नहीं। ब्राह्मण ने भूखा जानकर भिक्षा दी, इसलिए उसे भी नहीं। ब्राह्मण की पत्नी ने पति के कहने पर भिक्षा दी, उसे भी नहीं। और हरिस्वामी ने अनजाने में खीर खाई, इसलिए वह भी निर्दोष है। जो इनमें से किसी पर भी दोष लगाए, वही पापी है।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर लौट गया, और राजा उसे उतारकर बाँधकर वहाँ से ले चला।
टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अनुवाद) की कथा 11 और 12 से सीधे लिखा गया है। कथा 11 में राजा और सुंदरी का विवाह और 'अँधेरे पखवाड़े में दूर रहने' की शर्त का पाठ-ब्योरा बहुत संक्षेप में है; दानव का वध एक वाक्य में है, और दानव के गले लगाने का और कोई ब्योरा छोड़ा गया है। 'मेरे पिता देवता हैं और मैं अब मनुष्य हो गई' जैसी बातें पात्र की कही हैं। कथा 12 में पाठ की यह बात कि पत्नी को 'ब्राह्मण की हत्यारी' कहकर निकाला गया, पात्र के क्रोध की भाषा है, इस वेबसाइट की नहीं। नाम पाठ के रूप में हैं: वल्लभ, सत्यप्रकाश, सुंदरी, विद्याधर, चूड़ामन, देवस्वामी, हरिस्वामी, लावण्यवती।
स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, मंत्री की चिंता, साँप का ज़हर