नया शरीर, तीन नाज़ुक ब्राह्मण — विक्रम और बेताल, चित्र

अध्याय ११

नया शरीर, तीन नाज़ुक ब्राह्मण

एक बूढ़े ब्राह्मण ने जवान शरीर में घुसने से पहले रोकर, फिर हँसकर, सबको चौंकाया; और तीन भाइयों ने राजा के सामने अपने-अपने नख़रों की परीक्षा दी — बेताल ने पूछा, सबसे नाज़ुक कौन?

नया शरीर, तीन नाज़ुक ब्राह्मण — विक्रम और बेताल का अध्याय ११। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 22 और 23। इसमें २ दृश्य हैं — बाईसवीं कहानी: नारायण का नया शरीर; तेईसवीं कहानी: तीन नाज़ुक ब्राह्मण — और अंत में १० सवाल।

बाईसवीं कहानी: नारायण का नया शरीर

विक्रम बेताल को फिर पेड़ से उतारकर कंधे पर रखकर चला, तो बेताल बोला, 'राजन्, बाईसवीं कहानी सुन।'

विश्वपुर नगर में राजा विदग्ध राज करता था। उसके नगर में नारायण नाम का एक ब्राह्मण रहता था। एक दिन उसने सोचा, 'मेरा शरीर बूढ़ा हो गया है, और मैं दूसरे के शरीर में घुसने की विद्या जानता हूँ। इसलिए इस बूढ़े शरीर को छोड़कर किसी जवान के शरीर में घुस जाऊँ और जीवन का आनंद लूँ।' यह ठानकर उसने जवान शरीर में प्रवेश किया; पर घुसने से पहले वह पहले रोया और फिर हँसा, और तब जाकर नए शरीर में आकर घर लौटा। घर के लोग सब जान गए थे। तब उसने उनसे कहा, 'अब मैं संन्यासी हो गया हूँ।'

यह कहकर वह समझाने लगा कि जो तपस्या की आग से आशा का सोता सुखा देता है, वही सच्चा संन्यासी है। संसार के लोग तो बूढ़े होकर, देह सूखकर, दाँत झड़कर, लाठी लेकर चलने लगते हैं, फिर भी उनकी इच्छा नहीं बुझती। दिन आता है, रात आती है, महीना बीतता है, साल पूरा होता है; आदमी बच्चा रहता है, फिर बूढ़ा हो जाता है, और उसे पता नहीं चलता कि मैं कौन हूँ और दूसरे कौन हैं। एक आता है, दूसरा जाता है, अंत में सब जाते हैं। यह संसार सपने जैसा है, केले के भीतर के नए पत्ते-सा खोखला। जो धन, जवानी या विद्या का घमंड करते हैं, वे नासमझ हैं। यह कहकर वह बोला, 'अब मैं तीर्थ पर जाऊँगा।' यह सुनकर रिश्तेदार बहुत प्रसन्न हुए।

कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, वह पहले क्यों रोया और फिर क्यों हँसा?' राजा ने कहा, 'बचपन में माँ का प्यार, जवानी के सुख, और इतने दिन उसी शरीर में रहने से जो लगाव हो गया था, इन सबको याद करके वह रोया। और अपनी विद्या में सफल होकर नए शरीर में घुस गया, इसलिए ख़ुशी से हँसा।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा उसे उतारकर बाँधकर कंधे पर रखकर चल पड़ा।

तेईसवीं कहानी: तीन नाज़ुक ब्राह्मण

चलते-चलते बेताल ने कहा, 'राजन्, तेईसवीं कहानी सुन।'

धर्मपुर नगर में राजा धर्मज राज करता था। उसके नगर में गोविंद नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जो चारों वेद और छहों शास्त्र जानता था और अपने सब धर्म-कर्म निभाता था। उसके चार बेटे थे: हरिदत्त, सोमदत्त, यज्ञदत्त और ब्रह्मदत्त। चारों विद्वान, चतुर और पिता के आज्ञाकारी थे। कुछ समय बाद बड़ा बेटा मर गया, और गोविंद भी शोक में मरने को हो आया।

तब राजा का पुरोहित विष्णुशर्मा उसे समझाने आया। उसने कहा, 'मनुष्य माँ के पेट में दुख पाता है, जवानी में प्रेम के कारण बिछोह का दुख पाता है, और बुढ़ापे में निर्बल देह का। जन्म के साथ दुख बहुत हैं, सुख थोड़े; संसार दुख की जड़ है। चाहे आदमी पेड़ की चोटी पर चढ़ जाए, पर्वत पर बैठ जाए, पानी में छिप जाए या पाताल में जा बैठे, मृत्यु उसे नहीं छोड़ती। ज्ञानी हो या मूर्ख, धनी हो या निर्धन, बलवान हो या निर्बल, मृत्यु सबको ले जाती है। सतयुग में मांधाता जैसे बड़े राजा हुए, त्रेता में रामचंद्र, जिन्होंने समुद्र पर पुल बाँधकर लंका जीती और रावण को मारा, और द्वापर में युधिष्ठिर, जिनका यश लोग आज भी गाते हैं; मृत्यु ने इनको भी नहीं छोड़ा। इसलिए शोक करना व्यर्थ है। धर्म का काम करना ही ठीक है।'

विष्णुशर्मा की बातों से ब्राह्मण के मन में आया कि अब वह पुण्य और धर्म के काम करेगा। उसने बेटों से कहा, 'मैं एक यज्ञ करने बैठूँगा; तुम जाकर समुद्र से एक कछुआ ले आओ।' पिता की आज्ञा पाकर वे एक मछुए के पास गए और बोले, 'यह एक रुपया लो और हमें एक कछुआ पकड़ दो।' उसने पकड़कर दे दिया। फिर बड़े भाई ने मँझले से कहा, 'तू इसे उठा।' मँझले ने सबसे छोटे से कहा, 'भाई, तू उठा।' छोटे ने कहा, 'मैं नहीं छुऊँगा, इसकी बदबू मेरे हाथों में बस जाएगी, मैं खाने-पीने में बहुत नाज़ुक हूँ।' मँझला बोला, 'मैं स्त्रियों के मामले में बहुत नाज़ुक हूँ।' बड़े ने कहा, 'मैं बिस्तर के मामले में नाज़ुक हूँ।'

तीनों इसी तरह झगड़ते रहे। कछुए को वहीं छोड़कर वे झगड़ते-झगड़ते राजा के फाटक पर पहुँचे और द्वारपाल से बोले, 'तीन ब्राह्मण न्याय माँगने आए हैं, राजा को ख़बर दो।' द्वारपाल ने राजा को बताया। राजा ने उन्हें बुलाकर पूछा, 'तुम आपस में क्यों झगड़ रहे हो?' सबसे छोटा बोला, 'महाराज, मैं भोजन में बहुत नाज़ुक हूँ।' मँझला बोला, 'पृथ्वीपति, मैं स्त्रियों में बहुत नाज़ुक हूँ।' बड़ा बोला, 'न्याय के अवतार, मैं बिस्तर में नाज़ुक हूँ।'

राजा ने कहा, 'तुममें से हर एक की परीक्षा होगी।' उन्होंने कहा, 'ठीक है।' राजा ने रसोइए से कहा, 'तरह-तरह के पकवान बनाकर इस ब्राह्मण को अच्छा भोजन कराओ।' रसोइया पकवान बनाकर उस भोजन-नाज़ुक ब्राह्मण को ले गया और थालियों के आगे बिठाया। वह कौर उठाकर मुँह में रखने ही वाला था कि खाने से बदबू आई। उसने कौर छोड़ दिया, हाथ धोए और राजा के पास आ गया। राजा ने पूछा, 'भोजन किया?' वह बोला, 'महाराज, खाने में बदबू थी, मैंने नहीं खाया।' राजा ने पूछा, 'बदबू किस बात की थी?' उसने कहा, 'महाराज, यह चावल श्मशान की ज़मीन में उगा था, उसमें मुर्दों की गंध थी, इसलिए मैंने नहीं खाया।' राजा ने भंडारी से पूछा, 'यह चावल किस गाँव का है?' उसने कहा, 'शिवपुर का, महाराज।' राजा ने उस गाँव के ज़मींदार को बुलवाकर पूछा, 'यह चावल किस ज़मीन पर उगा था?' उसने कहा, 'श्मशान पर, महाराज।' यह सुनकर राजा ने ब्राह्मण से कहा, 'तू सचमुच भोजन का पारखी है।'

फिर राजा ने उस ब्राह्मण को बुलाया जो स्त्रियों के मामले में नाज़ुक था। एक कमरे में सब सामान सजवाकर, एक सुंदर स्त्री को पास बिठाया, और दोनों बातें करने लगे। राजा जाली के पीछे से देख रहा था। कुछ देर में ब्राह्मण ने उसकी साँस की गंध सूँघी और मुँह फेरकर सो गया। राजा यह देखकर महल लौट गया और सो गया। सवेरे दरबार में आकर उसने ब्राह्मण को बुलाया और पूछा, 'रात आराम से कटी?' वह बोला, 'महाराज, मुझे कोई सुख नहीं मिला।' राजा ने पूछा, 'क्यों?' उसने कहा, 'उसके मुँह से बकरी के दूध की गंध आती थी, मेरा मन बहुत खिन्न हुआ।' यह सुनकर राजा ने उस स्त्री को लाने वाली बुढ़िया को बुलाया और पूछा, 'तूने इसे कहाँ से पाया? यह कौन है?' उसने कहा, 'यह मेरी बहन की बेटी है। इसकी माँ तीन महीने में ही मर गई थी, तो मैंने इसे बकरी का दूध पिलाकर पाला।' यह सुनकर राजा ने कहा, 'तू सचमुच स्त्रियों का पारखी है।'

फिर राजा ने एक बहुत बढ़िया बिस्तर बनवाया और बिस्तर-नाज़ुक ब्राह्मण को उस पर सुलाया। सवेरा हुआ तो राजा ने उसे बुलाकर पूछा, 'रात भर चैन से सोया?' वह बोला, 'महाराज, मैं रात भर नहीं सोया।' राजा ने पूछा, 'क्यों?' उसने कहा, 'बिस्तर की सातवीं तह में एक बाल था, जो मेरी पीठ में चुभता रहा, इसलिए नींद नहीं आई।' राजा ने बिस्तर की सातवीं तह देखी तो सचमुच एक बाल निकला। तब उसने कहा, 'तू सचमुच बिस्तर का पारखी है।'

कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, इन तीनों में सबसे बड़ा पारखी कौन था?' राजा ने कहा, 'बिस्तर वाला।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा उसे उतारकर बाँधकर कंधे पर रखकर चल पड़ा।

टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अनुवाद) की कथा 22 और 23 से लिखा गया है। कथा 22 में शरीर बदलने की विद्या पाठ के अनुसार है; पाठ में स्त्री वाली परीक्षा कुछ अधिक विस्तार से है; यहाँ उसे संयत और संक्षिप्त रखा गया है। कथा 23 में विष्णुशर्मा का लंबा उपदेश छोटा किया गया है। नाम पाठ के रूप में हैं: विदग्ध, नारायण, धर्मज, गोविंद, विष्णुशर्मा, हरिदत्त, सोमदत्त, यज्ञदत्त, ब्रह्मदत्त।

स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, नया शरीर, तीन नाज़ुक ब्राह्मण

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

नारायण ब्राह्मण ने नया शरीर पाने की क्यों सोची?

  • उसका बेटा मर गया था
  • राजा ने उसे नए शरीर का वर दिया था
  • उसका शरीर बूढ़ा हो गया था, और वह दूसरे के शरीर में घुसने की विद्या जानता था
  • वह किसी शाप से मुक्त होना चाहता था
पूरी कथा पढ़िए — बूढ़ा शरीर, एक विद्या

वह जवान शरीर में आनंद लेना चाहता था।

विश्वपुर के राजा का नाम विदग्ध था।

क्या हुआ?

नया शरीर पाकर नारायण ने घरवालों से क्या कहा?

  • कि अब मैं संन्यासी हो गया हूँ, और तीर्थ पर जाऊँगा
  • कि मैं तुम्हारा बेटा हूँ
  • कि मैं राजा बन गया हूँ
  • कि मैंने नई विद्या सीख ली है
पूरी कथा पढ़िए — संन्यास की बात

घर के लोग उसके करतब को पहले ही जान गए थे।

रिश्तेदार उसकी बातों से प्रसन्न हुए।

किसने कहा?

'यह संसार सपने जैसा है, केले के भीतर के पत्ते-सा खोखला।' यह किसने कहा?

  • एक मछुए ने ब्राह्मणों से
  • विक्रम ने बेताल से
  • विष्णुशर्मा ने गोविंद से
  • नारायण ने, नया शरीर पाने के बाद संन्यास की बातें करते हुए
पूरी कथा पढ़िए — बदले शरीर की बातें

बोलने वाला जवान शरीर में था।

उसने कहा कि धन, जवानी और विद्या का घमंड नासमझी है।

पहेली

बेताल ने पूछा कि वह पहले क्यों रोया और फिर क्यों हँसा। विक्रम ने क्या कहा?

  • वह मौत से डर गया था, फिर बच जाने पर हँसा
  • माँ का प्यार, जवानी के सुख और पुराने शरीर का लगाव याद करके रोया, और विद्या में सफल होकर हँसा
  • वह अपनी भूख पर रोया, और रिश्तेदारों के भोजन पर हँसा
  • वह राजा पर रोया, और रिश्तेदारों पर हँसा
पूरी कथा पढ़िए — दो भाव

विक्रम ने बचपन और जवानी की यादों को गिना।

विद्या सफल हुई, इसलिए ख़ुशी हुई।

तथ्य

गोविंद ब्राह्मण के चार बेटों में से एक की मृत्यु के बाद पुरोहित विष्णुशर्मा ने क्या किया?

  • गोविंद को समझाया कि मृत्यु से कोई नहीं बचता, इसलिए शोक छोड़कर धर्म के काम करो
  • राजा से मदद माँगी
  • बेटे को जिलाने का मंत्र पढ़ा
  • गोविंद को नगर छोड़ने को कहा
पूरी कथा पढ़िए — पुरोहित की सीख

उसने मांधाता, राम और युधिष्ठिर का नाम लिया।

उन्हें भी मृत्यु ने नहीं छोड़ा।

क्या हुआ?

पिता ने यज्ञ के लिए बेटों से क्या मँगाया, और तीन बेटों ने क्या किया?

  • एक हिरन; तीनों उसका शिकार करने गए
  • एक पेड़; तीनों उसे काटने गए
  • एक घड़ा गंगाजल; तीनों उसे लेकर लौटे
  • समुद्र से कछुआ; पर तीनों उसे उठाने से इनकार करते हुए अपने-अपने नख़रों पर झगड़ पड़े
पूरी कथा पढ़िए — कछुए का झगड़ा

तीनों ने कछुआ वहीं छोड़ दिया।

फिर वे राजा के पास न्याय माँगने गए।

क्या हुआ?

भोजन-नाज़ुक ब्राह्मण ने खाना क्यों छोड़ा, और राजा ने कैसे जाँचा?

  • उसने कहा कि खाना नमकीन है; राजा ने उसे दूसरा खाना दिया
  • उसने कहा कि चावल से मुर्दों की गंध आ रही है; राजा ने जाँचा तो चावल श्मशान की ज़मीन पर उगा निकला
  • उसने कहा कि रसोइया अशुद्ध है; राजा ने रसोइया बदल दिया
  • उसे भूख नहीं थी; राजा ने उसे जाने दिया
पूरी कथा पढ़िए — गंध की जाँच

राजा ने भंडारी से पूछा कि चावल किस गाँव का है।

फिर ज़मींदार से पूछा कि ज़मीन कौन-सी थी।

क्या हुआ?

स्त्रियों में नाज़ुक ब्राह्मण ने रात के बाद राजा से क्या कहा?

  • कि उसे कमरा पसंद नहीं आया
  • कि स्त्री ने उसका अपमान किया
  • कि उसे कोई सुख नहीं मिला, क्योंकि उस स्त्री के मुँह से बकरी के दूध की गंध आती थी
  • कि उसे डर लग रहा था
पूरी कथा पढ़िए — दूध की गंध

बुढ़िया ने बताया कि उसने उसे बकरी का दूध पिलाकर पाला था।

राजा ने उसे भी पारखी कहा।

पहेली

बेताल ने पूछा कि तीनों में सबसे बड़ा पारखी कौन था। विक्रम ने क्या कहा?

  • भोजन वाला
  • स्त्री वाला
  • तीनों बराबर
  • बिस्तर वाला, जिसे सातवीं तह के नीचे का एक बाल चुभ गया था
पूरी कथा पढ़िए — सबसे बारीक

तीसरी परीक्षा सोने की थी।

राजा को बिस्तर की सातवीं तह में सचमुच एक बाल मिला।

व्याख्या

तीन परीक्षाओं में 'नाज़ुक' का अंतर कैसे पढ़ना ठीक है, हमारे पठन में?

  • पहली परीक्षा में बदबू भाँपना, दूसरी में गंध का कारण बताना, तीसरी में एक बाल का चुभना; क्रम में संवेदनशीलता बारीक होती जाती है, इसीलिए विक्रम आख़िर वाले को चुनता है
  • तीनों में एक-सा स्तर था
  • भोजन वाला सबसे बारीक था
  • राजा ने तीनों को सज़ा दी
पूरी कथा पढ़िए — बारीकी की सीढ़ी

तीनों परीक्षाएँ क्रम से एक-एक कदम बारीक होती गईं।

यह आज के पाठक का पठन है, पाठ का स्वयं का दावा नहीं।

नया शरीर, तीन नाज़ुक ब्राह्मण के बारे में सवाल

नया शरीर, तीन नाज़ुक ब्राह्मण (विक्रम और बेताल) में क्या होता है?

एक बूढ़े ब्राह्मण ने जवान शरीर में घुसने से पहले रोकर, फिर हँसकर, सबको चौंकाया; और तीन भाइयों ने राजा के सामने अपने-अपने नख़रों की परीक्षा दी — बेताल ने पूछा, सबसे नाज़ुक कौन? कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: बाईसवीं कहानी: नारायण का नया शरीर; तेईसवीं कहानी: तीन नाज़ुक ब्राह्मण।

विक्रम और बेताल में नया शरीर, तीन नाज़ुक ब्राह्मण के बाद क्या आता है?

आगे अनुत्तरित पहेली, साधु का अंत: आख़िरी कहानी की पहेली का जवाब विक्रम को नहीं सूझा, और तभी बेताल ने उसे साधु शांतशील की असली चाल बता दी — श्मशान की रात कैसे ख़त्म हुई?

नया शरीर, तीन नाज़ुक ब्राह्मण का स्रोत क्या है?

बैताल पच्चीसी, कथा 22 और 23।