सूली से पहले हँसी — विक्रम और बेताल, चित्र

अध्याय ७

सूली से पहले हँसी

जिस चोर को राजा ने रात में पकड़ा था, वह सूली के पास पहुँचकर पहले ज़ोर से हँसा, फिर फूट-फूटकर रोया — बेताल ने पूछा, ऐसा क्यों?

सूली से पहले हँसी — विक्रम और बेताल का अध्याय ७। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 13। इसमें १ दृश्य हैं — तेरहवीं कहानी: रात के चोर और राजा — और अंत में १० सवाल।

तेरहवीं कहानी: रात के चोर और राजा

बेताल को पेड़ से उतारकर कंधे पर रखकर विक्रम चला, तो बेताल बोला, 'राजन्, तेरहवीं कहानी सुन।'

चंद्रहृदय नाम के नगर में राजा रणधीर राज करता था। उसी नगर में धर्मध्वज नाम का एक व्यापारी था, जिसकी बेटी शोभनी बहुत सुंदर थी और जिसकी जवानी और रूप दिन-दिन निखर रहा था। उन दिनों नगर में रात-रात चोरी होने लगी। व्यापारी परेशान हुए तो सब मिलकर राजा के पास गए और बोले, 'महाराज, नगर में चोरों ने बड़ा उत्पात मचाया है। हम अब यहाँ नहीं रह सकते।' राजा ने कहा, 'जो हो गया सो हो गया, अब से तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं होगी। मैं चोरों के लिए कड़े उपाय करूँगा।' उसने पहरेदारों को बुलाकर नगर की रखवाली पर लगाया और हुक्म दिया कि चोर जहाँ मिले, बिना पूछे पकड़ लिया जाए।

रात को पहरा लगने लगा, फिर भी चोरियाँ होती रहीं। व्यापारी फिर राजा के पास पहुँचे, 'महाराज, आपने पहरेदार तो लगा दिए, पर चोर कम नहीं हुए, रोज़ चोरी हो रही है।' राजा ने कहा, 'अब आप जाइए। आज रात से मैं ख़ुद नगर की रखवाली करूँगा।' रात हुई तो राजा तलवार और ढाल लेकर अकेला पैदल नगर में घूमने निकला। कुछ दूर जाकर उसने देखा कि एक चोर सामने से आ रहा है। राजा ने पूछा, 'कौन है तू?' उसने कहा, 'मैं चोर हूँ, तू कौन है?' राजा बोला, 'मैं भी चोर हूँ।' वह खुश हुआ और बोला, 'तो चलो, साथ मिलकर चोरी करें।'

दोनों बातें करते हुए नगर के एक मोहल्ले में घुसे, कई घरों से माल चुराया और माल लेकर नगर के बाहर एक कुएँ पर आए। कुएँ में उतरकर वे पाताल के एक बड़े नगर में पहुँचे। चोर ने राजा को द्वार पर बिठाया और माल लेकर अपने घर चला गया। इतने में उसके घर से एक दासी निकली और राजा को देखकर बोली, 'महाराज, आप इस दुष्ट के साथ यहाँ कैसे आ गए? भला इसी में है कि वह लौटे, इससे पहले आप जितनी जल्दी हो यहाँ से निकल जाइए, वरना वह आते ही आपको मार डालेगा।' राजा ने कहा, 'मुझे रास्ता नहीं मालूम, किधर जाऊँ?' तब दासी ने उसे रास्ता दिखाया और राजा अपने महल लौट आया।

अगले दिन राजा अपनी सारी सेना लेकर उसी कुएँ के रास्ते पाताल के नगर पहुँचा और चोर के पूरे घर को घेर लिया। पर चोर किसी और रास्ते से निकलकर उस नगर के राजा, एक दानव, के पास पहुँचा और बोला, 'एक राजा ने मेरे घर पर चढ़ाई की है, मुझे मारने के लिए। आप मेरी मदद कीजिए, नहीं तो मैं आपका नगर छोड़कर कहीं और चला जाऊँगा।' दानव ने कहा, 'तूने मुझे भोजन दिया है, मैं तुझसे प्रसन्न हूँ।' यह कहकर दानव वहाँ पहुँचा जहाँ राजा की सेना घर को घेरे खड़ी थी, और सैनिकों और घोड़ों को खाने लगा। दानव का रूप देखकर राजा भाग खड़ा हुआ, और जो भाग सके वे बच गए, बाक़ी सब दानव के पेट में गए।

राजा अकेला भाग रहा था कि चोर ने पुकारकर कहा, 'तू राजपूत होकर लड़ाई से भागता है?' यह सुनते ही राजा रुक गया और दोनों आमने-सामने भिड़ गए। आख़िर राजा ने उसे हरा दिया, उसके हाथ पीछे बाँध दिए और नगर में ले आया। फिर उसे नहलाया-धुलाया, अच्छे कपड़े पहनाए, ऊँट पर बिठाया और मुनादी करने वाले के साथ पूरे नगर में घुमवाया, और उसके लिए सूली खड़ी करवाने का आदेश दिया। नगर के लोग उसे देखकर कहते, 'यही चोर है जिसने पूरे नगर को लूटा है, अब राजा इसे सूली पर चढ़ाएगा।'

जब चोर व्यापारी धर्मध्वज के घर के पास पहुँचा तो नगाड़े की आवाज़ सुनकर व्यापारी की बेटी शोभनी ने अपनी सेविका से पूछा, 'यह कैसी मुनादी है?' सेविका बोली, 'राजा उस चोर को पकड़ लाया है जो नगर में चोरी करता था। अब उसे सूली पर चढ़ाया जाएगा।' यह सुनकर वह भी दौड़कर खिड़की पर आई, और जैसे ही उसने चोर का सुंदर रूप और पुरुषार्थ देखा, उस पर मोहित हो गई। वह पिता के पास आकर बोली, 'आप अभी राजा के पास जाइए और उस चोर को छुड़ाकर लाइए।' व्यापारी बोला, 'जिसने राजा का पूरा नगर लूटा और जिसके कारण उसकी पूरी सेना मर गई, उसे राजा मेरे कहने से कैसे छोड़ देगा?' वह फिर बोली, 'चाहे आपको अपना सब कुछ राजा को देना पड़े, उसे छुड़ा लाइए। और अगर वह नहीं आया, तो मैं भी अपने प्राण दे दूँगी।'

यह सुनकर व्यापारी राजा के पास गया और बोला, 'महाराज, मुझसे पाँच लाख रुपये ले लीजिए और चोर को छोड़ दीजिए।' राजा ने कहा, 'इसने पूरा नगर लूटा और मेरी पूरी सेना इसके कारण मारी गई। मैं इसे किसी भी हाल में नहीं छोड़ूँगा।' जब राजा ने उसकी बात नहीं मानी तो वह निराश होकर घर लौटा और बेटी से बोला, 'मैंने जो कहना ठीक था, कह दिया, पर राजा नहीं माना।'

इसी बीच चोर को नगर में घुमाकर सूली के पास ला खड़ा किया गया। वहाँ पहुँचकर चोर ने व्यापारी की बेटी की हालत के बारे में सुना। वह पहले ज़ोर से हँसा, और फिर फूट-फूटकर रोया। लोगों ने उसे सूली पर चढ़ा दिया। जब शोभनी को चोर की मृत्यु की ख़बर मिली तो वह उसी स्थान पर उसके लिए प्राण देने आई। उसने चिता बनवाई, चोर को सूली से उतरवाया, उसका सिर अपनी गोद में रखा और चुपचाप जलने को बैठ गई। उसमें आग लगने ही वाली थी कि पास के देवी के मंदिर से देवी स्वयं निकलकर आई और बोली, 'बेटी, मैं तेरे साहस से प्रसन्न हूँ, कोई वर माँग।' उसने कहा, 'माता, अगर प्रसन्न हो तो इस चोर को जीवित कर दो।' देवी ने कहा, 'ऐसा ही होगा', और पाताल से अमृत लाकर उसे जिला दिया।

कहानी पूरी करके बेताल ने पूछा, 'राजन्, बता, चोर पहले क्यों हँसा और फिर क्यों रोया?' राजा बोला, 'मैं हँसने का कारण भी जानता हूँ और रोने का भी। सुन, बेताल। चोर ने मन में सोचा कि यह कन्या मेरे लिए अपना सब कुछ राजा को देने को तैयार है, मैं इसका बदला कैसे चुकाऊँगा? यह सोचकर वह रोया। फिर उसने सोचा कि मरते वक़्त भी इसने मुझसे प्रेम किया। ईश्वर की माया अपरंपार है: वह अभागे को धन देता है, नीच कुल वाले को विद्या, मूर्ख को सुंदर पत्नी और पहाड़ों पर बरखा बरसाता है। यही सोचकर वह हँसा।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका, और राजा उसे उतारकर बाँधकर कंधे पर रखकर चल पड़ा।

टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अनुवाद) की कथा 13 से सीधे लिखा गया है। चोर को सूली पर चढ़ाने और शोभनी के चिता पर बैठने की बातें पाठ में हैं; इन्हें यहाँ संयत ढंग से, केवल कथा-क्रम के लिए, कहा गया है। राजा के चोरी-पहरे और सेना की हार के ब्योरे पाठ के हैं, कुछ संक्षेप में। नाम पाठ के रूप में हैं: रणधीर, धर्मध्वज, शोभनी, चंद्रहृदय।

स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, सूली से पहले हँसी

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

राजा रणधीर ने चोरी रोकने के लिए सबसे पहले क्या किया?

  • ख़ुद रात में पहरा देने निकला
  • व्यापारियों से धन माँगा
  • पहरेदार लगाए और हुक्म दिया कि चोर जहाँ मिले, पकड़ लिया जाए
  • नगर के फाटक बंद करवा दिए
पूरी कथा पढ़िए — पहरेदार, फिर राजा

फिर भी चोरियाँ होती रहीं।

तब राजा ने ख़ुद रात में पहरा देने की ठानी।

क्या हुआ?

रात में राजा की चोर से कैसे भेंट हुई?

  • राजा ने कहा कि मैं भी चोर हूँ, और चोर ने ख़ुश होकर साथ चोरी करने को कहा
  • राजा ने चोर को ज़ंजीरों में पाया
  • पहरेदार चोर को राजा के पास लाए
  • चोर ने राजा को पकड़ लिया
पूरी कथा पढ़िए — दो चोर

राजा तलवार और ढाल लेकर अकेला पैदल निकला था।

दोनों ने कई घरों से माल चुराया।

क्या हुआ?

कुएँ के रास्ते पाताल पहुँचकर राजा को किसने चेताया?

  • चोर की माँ ने
  • नगर के दानव ने
  • एक पहरेदार ने
  • चोर के घर की एक दासी ने, जिसने कहा कि चोर आने से पहले यहाँ से निकल जाइए, वरना वह आपको मार डालेगा
पूरी कथा पढ़िए — दासी की चेतावनी

चोर राजा को द्वार पर बिठाकर माल लेकर घर गया था।

राजा को रास्ता मालूम नहीं था, दासी ने दिखाया।

क्या हुआ?

राजा की सेना पाताल में क्यों हारी?

  • चोर की सेना बहुत बड़ी थी
  • चोर ने पाताल के दानव-राजा से मदद माँगी, और दानव सैनिकों और घोड़ों को खाने लगा
  • चोर ने ज़हर मिला दिया
  • राजा रास्ता भूल गया था
पूरी कथा पढ़िए — दानव की मदद

दानव ने कहा कि चोर ने उसे भोजन दिया है।

राजा भाग खड़ा हुआ।

ऐसा क्यों?

भागते हुए राजा ने फिर चोर से लड़ाई क्यों की?

  • क्योंकि चोर ने उसे ललकारा, 'तू राजपूत होकर लड़ाई से भागता है?'
  • क्योंकि दानव ने उसे ललकारा
  • क्योंकि उसे अपना ख़ज़ाना वापस चाहिए था
  • क्योंकि चोर ने उसे मारने की धमकी दी
पूरी कथा पढ़िए — राजपूत का मान

राजा ने चोर के हाथ पीछे बाँध दिए।

फिर उसे नहलाकर अच्छे कपड़े पहनाए और ऊँट पर घुमाया।

क्या हुआ?

सेठ की बेटी शोभनी ने चोर को देखकर क्या किया?

  • घर के भीतर छिप गई
  • राजा से उसे दंड देने को कहा
  • चोर पर पत्थर फेंका
  • उसके रूप पर मोहित हो गई और पिता से कहा कि उसे छुड़ा लाओ, वरना वह भी प्राण दे देगी
पूरी कथा पढ़िए — खिड़की पर शोभनी

उसने मुनादी सुनकर पूछा कि यह कैसी घोषणा है।

सेविका ने बताया कि राजा चोर को पकड़ लाया है।

क्या हुआ?

राजा ने व्यापारी के पाँच लाख रुपये देने पर क्या कहा?

  • राजा ने चोर को छोड़ दिया
  • राजा ने कहा कि इसने पूरा नगर लूटा और सेना मरवाई, मैं इसे किसी भी हाल में नहीं छोड़ूँगा
  • राजा ने व्यापारी को भी पकड़वा लिया
  • राजा ने दस लाख माँगे
पूरी कथा पढ़िए — राजा का इनकार

व्यापारी निराश होकर घर लौटा।

उसने बेटी से कहा कि राजा नहीं माना।

पहेली

बेताल ने पूछा कि चोर पहले क्यों हँसा और फिर क्यों रोया। विक्रम ने क्या कहा?

  • वह मौत से डर गया था, इसलिए रोया, और राजा पर हँसा
  • वह शोभनी का मज़ाक उड़ा रहा था
  • वह सोचकर रोया कि शोभनी का बदला मैं कैसे चुकाऊँगा, और ईश्वर की लीला पर हँसा कि मरते समय भी उसने प्रेम पाया
  • वह पहले रोया और फिर हँसा
पूरी कथा पढ़िए — दो भाव

राजा ने कहा कि वह हँसने का भी कारण जानता है, रोने का भी।

बेताल जवाब सुनते ही पेड़ पर लौट गया।

ऐसा क्यों?

विक्रम के अनुसार 'ईश्वर की माया' का क्या उदाहरण चोर ने मन में सोचा?

  • कि राजा गधे पर घूमता है
  • कि चोर भी राजा बन जाता है
  • कि दानव मनुष्य को खाता है
  • कि ईश्वर अभागे को धन देता है, नीच कुल वाले को विद्या, मूर्ख को सुंदर पत्नी, और पहाड़ों पर बरखा बरसाता है
पूरी कथा पढ़िए — अटपटी दुनिया

चोर ने सोचा कि मरते समय भी उसे प्रेम मिला।

यही सोचकर वह हँसा।

व्याख्या

चोर की हँसी और रुलाई को कैसे पढ़ना ठीक है, हमारे पठन में?

  • एक ऐसे आदमी की तरह जो एक ही पल में कृतज्ञता का बोझ और क़िस्मत की विडंबना दोनों को महसूस करता है
  • एक पागल की तरह
  • एक ढोंगी की तरह
  • राजा का मज़ाक उड़ाने वाले की तरह
पूरी कथा पढ़िए — एक पठन

ग्रंथ में चोर के भाव को विक्रम ही खोलकर बताता है।

यह आज के पाठक का पठन है, पाठ का स्वयं का दावा नहीं।

सूली से पहले हँसी के बारे में सवाल

सूली से पहले हँसी (विक्रम और बेताल) में क्या होता है?

जिस चोर को राजा ने रात में पकड़ा था, वह सूली के पास पहुँचकर पहले ज़ोर से हँसा, फिर फूट-फूटकर रोया — बेताल ने पूछा, ऐसा क्यों? कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: तेरहवीं कहानी: रात के चोर और राजा।

विक्रम और बेताल में सूली से पहले हँसी के बाद क्या आता है?

आगे जीमूतवाहन और साँप: एक राजकुमार दूसरे के बदले गरुड़ का भोजन बनने चला, और जिसका भोजन बनना था वह भी लौट आया — बेताल ने पूछा, सबसे बड़ा त्याग किसका?

सूली से पहले हँसी का स्रोत क्या है?

बैताल पच्चीसी, कथा 13।