
अध्याय ३
सेवक का सौदा, राक्षस का पहाड़
रोज़ हज़ार तोला सोना माँगने वाला एक सेवक, और एक रात श्मशान में रोती हुई 'राजलक्ष्मी' — फिर एक कन्या, तीन वर, और विंध्य के पहाड़ पर बैठा राक्षस
सेवक का सौदा, राक्षस का पहाड़ — विक्रम और बेताल का अध्याय ३। स्रोत: बैताल पच्चीसी, कथा 3 और 5। इसमें २ दृश्य हैं — तीसरी कहानी: वीरबर और राजा का भाग्य; पाँचवीं कहानी: एक कन्या, तीन वर और राक्षस — और अंत में १० सवाल।
तीसरी कहानी: वीरबर और राजा का भाग्य
अगली बार राजा ने बेताल को पेड़ से उतारकर कंधे पर लादा और चला, तो बेताल बोला, 'राजन्, सुन, तीसरी कहानी।'
बर्दवान नाम का नगर था, जहाँ राजा रूपसेन राज करता था। एक दिन राजा फाटक के पास वाले कमरे में बैठा था कि बाहर से लोगों का शोर सुनाई दिया। उसने पूछा, 'फाटक पर कौन है, और यह कैसा शोर है?' द्वारपाल बोला, 'महाराज, यह धनी आदमी का फाटक है, इसलिए धन की आस में तरह-तरह के लोग आकर यहाँ बैठते हैं और बातें करते हैं। यह उन्हीं का शोर है।' राजा चुप हो गया।
इसी बीच दक्षिण से वीरबर नाम का एक राजपूत नौकरी की आस में फाटक पर आया। द्वारपाल ने उसका हाल पूछकर राजा से कहा, 'महाराज, एक हथियारबंद आदमी नौकरी चाहता है, दरवाज़े पर खड़ा है। आज्ञा हो तो हाज़िर करूँ।' राजा ने बुलवाया और पूछा, 'राजपूत, रोज़ का ख़र्च कितना लोगे?' वीरबर बोला, 'रोज़ हज़ार तोला सोना दीजिए, तो मेरा गुज़ारा हो जाएगा।' राजा ने पूछा, 'तुम्हारे साथ कितने लोग हैं?' उसने कहा, 'पहली मेरी पत्नी, दूसरा बेटा, तीसरी बेटी और चौथा मैं। पाँचवाँ कोई नहीं।' यह सुनकर दरबारी मुँह फेरकर हँसने लगे। पर राजा सोचने लगा कि इसने इतनी बड़ी रक़म क्यों माँगी, और आख़िर इस नतीजे पर पहुँचा कि बहुत-सा धन लुटाने से कभी न कभी लाभ ही होता है। उसने ख़ज़ांची से कहा, 'वीरबर को रोज़ मेरे ख़ज़ाने से हज़ार तोला सोना दिया जाए।'
वीरबर रोज़ का सोना लेकर अपने डेरे पर जाता और उसके दो हिस्से करता। आधा ब्राह्मणों को बाँट देता। बचे आधे के फिर दो हिस्से करता, एक हिस्सा तीर्थयात्रियों, साधुओं, वैष्णवों और भिक्षुओं को देता, और बचे हिस्से से रसोई बनवाकर ग़रीबों को खिलाता, और जो कुछ बचता, उसी में पत्नी-बच्चों समेत ख़ुद गुज़ारा करता। हर रात वह तलवार और ढाल लेकर राजा के पलंग के पास पहरा देता। राजा नींद से जागकर पुकारता, 'कोई है?' तो वह तुरंत कहता, 'महाराज, वीरबर हाज़िर है, क्या आज्ञा है?' राजा जो हुक्म देता, वह उसे पूरा करता।
एक रात श्मशान की ओर से किसी स्त्री के रोने की आवाज़ आई। राजा ने कहा, 'कोई है?' वीरबर बोला, 'मैं हूँ, महाराज, आज्ञा दीजिए।' राजा ने कहा, 'उस ओर से रोने की आवाज़ आ रही है। जाओ, पता लगाओ कि कौन है और क्यों रोती है, और जल्दी लौटो।' राजा मन में सोच रहा था कि जो अपने सेवक को परखना चाहे, उसे बेवक़्त के काम बताने चाहिए। अगर वह करे तो काम का, न करे तो बेकार। यह सोचकर राजा ने काले कपड़े पहने और चुपके से उसके पीछे चल पड़ा, उसकी हिम्मत देखने।
श्मशान में वीरबर ने देखा कि एक सुंदर स्त्री सिर से पाँव तक गहनों से लदी, कभी नाचती, कभी कूदती, कभी दौड़ती, ज़मीन पर सिर पटक-पटककर 'हाय, हाय!' करती रो रही है, पर उसकी आँखों में एक आँसू नहीं है। वीरबर ने पूछा, 'तुम कौन हो और इतना क्यों रो रही हो?' वह बोली, 'मैं राजलक्ष्मी हूँ।' उसने पूछा, 'रोती क्यों हो?' वह बोली, 'राजा के घर में नीच काम हो रहे हैं, इसलिए वहाँ विपत्ति आएगी और मैं वहाँ से चली जाऊँगी। एक महीने के बाद राजा बहुत दुख पाकर मर जाएगा। यही दुख मुझे रुलाता है। इस घर में मैंने बहुत सुख भोगा है, इसलिए यह पछतावा है। और यह बात टलने वाली नहीं।'
वीरबर ने पूछा, 'क्या इसका कोई उपाय है कि राजा बच जाए और सौ बरस जिए?' वह बोली, 'पूरब की ओर चार कोस पर देवी का एक मंदिर है। अगर तू अपने हाथ से अपने बेटे का सिर देवी को चढ़ा दे, तो राजा सौ बरस उसी तरह राज करेगा और उस पर कोई विपत्ति नहीं आएगी।'
वीरबर घर गया और राजा भी चुपके से पीछे गया। वीरबर ने पत्नी को जगाकर सारी बात बताई। पत्नी ने बेटे को जगाया और बेटी भी जाग गई। माँ ने बेटे से कहा, 'बेटा, तेरे सिर के बलिदान से राजा की जान बचेगी और राज बना रहेगा।' बेटे ने कहा, 'माँ, एक तो आपकी आज्ञा है, दूसरे स्वामी की सेवा है, तीसरे यह देह देवी के काम आए तो इससे बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं। अब देर करना ठीक नहीं।' वीरबर ने पत्नी से पूछा, 'अगर तुम राज़ी-ख़ुशी बेटा देती हो तो मैं उसे ले जाऊँ।' पत्नी बोली, 'मुझे बेटे-बेटी, भाई-बंधु, माता-पिता से कोई वास्ता नहीं। मेरा सुख आपसे है, और नीति में लिखा है कि पत्नी का धर्म पति की सेवा है।' बेटे ने कहा, 'पिताजी, जिससे स्वामी का काम सधे, उसका जीना दोनों लोकों में लाभ है।' तब बेटी बोली, 'अगर माँ बेटी को ज़हर दे, पिता बेटे को बेच दे और राजा सब छीन ले, तो किसकी शरण जाएँ?'
इस तरह आपस में बातें करते हुए वे चारों देवी के मंदिर गए, और राजा भी चुपके से पीछे गया। वीरबर ने मंदिर में जाकर देवी को प्रणाम किया, हाथ जोड़कर प्रार्थना की, 'हे देवी, मेरे बेटे के बलिदान से राजा सौ बरस जिए।' और उसने बेटे को देवी को अर्पित कर दिया। (पाठ में आगे बेटी, पत्नी और स्वयं वीरबर के प्राण देने का ब्योरा है, जिसे यहाँ संयत रखा गया है।) इन चारों को गया देखकर राजा ने मन में कहा, 'मेरे लिए इसके पूरे परिवार की जान गई। जिस राज के लिए एक आदमी का पूरा कुटुंब मर जाए, ऐसा राज धिक्कार है।' और वह भी अपनी तलवार से प्राण देने को हुआ। उसी क्षण देवी ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, 'पुत्र, मैं तेरे साहस से प्रसन्न हूँ। जो चाहे वर माँग।' राजा ने कहा, 'माता, अगर प्रसन्न हो तो इन चारों को जीवित कर दो।' देवी ने कहा, 'ऐसा ही होगा', और भवानी ने पाताल से अमृत-जल लाकर चारों को जिला दिया। राजा ने फिर वीरबर को अपना आधा राज दे दिया।
कहानी कहकर बेताल ने कहा, 'धन्य है वह सेवक जिसने अपने स्वामी के लिए अपनी और अपने कुटुंब की जान की परवाह नहीं की, और धन्य है वह राजा जिसने राज और प्राण का मोह नहीं किया। राजन्, बता, इन पाँचों में सबसे ऊँचा गुण किसका था?' राजा विक्रम ने कहा, 'राजा का।' बेताल ने पूछा, 'क्यों?' राजा बोला, 'सेवक का तो धर्म ही है कि स्वामी के लिए प्राण दे। पर राजा ने अपने सेवक के लिए राज-पाट छोड़ दिया और अपने प्राण को तिनके के बराबर भी न गिना, इसलिए राजा का गुण सबसे बड़ा था।' यह सुनते ही बेताल फिर पेड़ पर जा लटका।
पाँचवीं कहानी: एक कन्या, तीन वर और राक्षस
(चौथी कहानी इस पुस्तक में छोड़ी गई है।) राजा ने फिर बेताल को उतारा तो बेताल बोला, 'राजन्, अब यह सुन।'
उज्जैन में महाबल नाम का राजा था और उसका दूत हरिदास। हरिदास की बेटी महादेवी बहुत सुंदर थी। जब वह ब्याह के योग्य हुई तो हरिदास को चिंता हुई। एक दिन बेटी ने पिता से कहा, 'पिताजी, मेरा ब्याह ऐसे पुरुष से कीजिए जिसमें सब गुण हों।' पिता ने कहा, 'मैं तुम्हें उसी को दूँगा जो सब विद्याएँ जानता हो।' कुछ दिन बाद राजा ने हरिदास को बुलाकर कहा, 'दक्षिण में हरिचंद नाम का राजा है। उसके यहाँ जाकर मेरी ओर से कुशल-मंगल पूछो और ख़बर लाओ।' हरिदास गया, संदेश पहुँचाकर वहीं टिक गया।
एक दिन वहाँ एक ब्राह्मण-पुत्र उसके पास आया और बोला, 'मैं आपसे कुछ माँगने आया हूँ।' हरिदास ने पूछा, 'क्या?' उसने कहा, 'अपनी बेटी का ब्याह मुझसे कर दीजिए।' हरिदास ने कहा, 'मैं उसे उसी को दूँगा जिसमें सब गुण हों।' उसने कहा, 'मैं सब विद्याएँ जानता हूँ।' हरिदास बोला, 'अपनी विद्या का कोई नमूना दिखाओ।' ब्राह्मण-पुत्र बोला, 'मैंने एक ऐसा रथ बनाया है जो पल भर में आपको जहाँ चाहें पहुँचा देगा।' हरिदास ने कहा, 'सुबह रथ लेकर आना।' सुबह वह रथ ले आया और दोनों उसी में बैठकर उज्जैन पहुँच गए।
उधर उसके आने से पहले एक और ब्राह्मण-पुत्र हरिदास के बड़े बेटे के पास आया था और कहा था, 'अपनी बहन का ब्याह मुझसे कर दो।' बेटे ने भी यही कहा था कि जो सब विद्याओं में निपुण हो उसे दूँगा। उसने कहा, 'मैं सब विद्याएँ जानता हूँ।' बेटे ने उसे बहन देने का वचन दे दिया था। एक तीसरा ब्राह्मण-पुत्र कन्या की माँ के पास आया था और उसने भी वही उत्तर पाया था। उसने कहा था, 'मैंने सब शास्त्र पढ़े हैं और ऐसा बाण चला सकता हूँ जो सुनी हुई आवाज़ पर निशाना लगाए, बिना देखे।' माँ ने भी उसे कन्या देने का वचन दे दिया था।
इस तरह तीनों वर आ पहुँचे। हरिदास सोच में पड़ा, 'एक कन्या और तीन वर, किसे दूँ और किसे नहीं?' वह इसी चिंता में था कि रात को कोई राक्षस आया और कन्या को उठाकर विंध्य के पहाड़ की चोटी पर ले गया। (कहते हैं कि किसी बात की अति अच्छी नहीं होती। सीता बहुत सुंदर थीं तो रावण उन्हें उठा ले गया; राजा बलि ने बहुत दान दिया तो वह निर्धन हो गए; रावण ने अहंकार में अपना सारा कुल मिटा दिया।)
सुबह जब कन्या घर में कहीं नहीं मिली, सब तरह-तरह की बातें सोचने लगे। तीनों वर भी यह सुनकर वहाँ आ गए। उनमें से एक ज्ञानी था। हरिदास ने उससे पूछा, 'हे ज्ञानी, बताओ मेरी बेटी कहाँ गई?' उसने कुछ देर सोचकर कहा, 'एक राक्षस आपकी बेटी को उठाकर पहाड़ की चोटी पर रख आया है।' दूसरे ने कहा, 'मैं उस राक्षस को मारकर उसे लौटा लाऊँगा।' तब तीसरा बोला, 'मेरे रथ पर बैठकर जाओ और उसे ले आओ।' दूसरे ने तुरंत रथ पर बैठकर उसी जगह पहुँचकर राक्षस को मार डाला और कन्या को लौटा लाया। फिर तीनों आपस में झगड़ने लगे। हरिदास ने मन में कहा, 'तीनों ने मुझ पर उपकार किया है, किसे दूँ और किसे न दूँ?'
कहानी पूरी करके बेताल ने कहा, 'राजा विक्रम, अब बता, वह कन्या तीनों में से किसकी पत्नी हुई?' राजा ने कहा, 'जिसने राक्षस को मारकर उसे लौटा लाया, उसकी।' बेताल बोला, 'तीनों के गुण बराबर थे, तब वह उसकी कैसे हुई?' राजा ने कहा, 'बाक़ी दोनों ने तो केवल उपकार किया, जिसका बदला उन्हें मिल गया, पर इसने राक्षस से लड़कर, उसे मारकर कन्या को लौटाया, इसलिए वही उसका पति हुआ।' यह सुनते ही बेताल फिर उसी पेड़ पर जा लटका। राजा उसके पीछे गया, उसे बाँधा और कंधे पर रखकर पहले की तरह फिर ले चला।
टिप्पणी: यह अध्याय बैताल पच्चीसी की लोकप्रिय हिंदी परंपरा (लल्लू लाल का पाठ, जॉन प्लैट्स का 1871 का अनुवाद) की कथा 3 और 5 से सीधे लिखा गया है। कथा 3 में बेटे, बेटी, पत्नी और वीरबर के बलिदान का पाठ-ब्योरा छोड़ा गया है, केवल उतना दिया गया जितना कथा-क्रम के लिए ज़रूरी है। पत्नी और बेटे-बेटी की 'पति-सेवा' और 'स्वामी-सेवा' की बातें उनके पात्रों की हैं, इस वेबसाइट की नहीं। कथा 4 (जिसकी पहेली 'स्त्री का दोष बड़ा' जैसे नतीजे पर टिकी है) इस पुस्तक में नहीं ली गई। कथा 3 कथासरित्सागर के अध्याय 8 के वीरवर जैसी है, और कथा 5 वहीं की सोमप्रभा वाली कथा जैसी, पर नाम, क्रम और ब्योरे बदले हुए हैं। रावण और सीता का उदाहरण मूल कथा में उसी तरह आता है।
स्रोत: बैताल पच्चीसी — लल्लू लाल की हिंदी बैताल पच्चीसी (1805), डंकन फ़ोर्ब्स के पाठ से, सेवक का सौदा, राक्षस का पहाड़